पढ़ें, कैसे 11वीं सदी में बना मोढेरा का सूर्य मंदिर आधुनिक वास्तुकला में आजकल की इमारतों को भी मात देता है। फिर चाहे वह मंदिर में पानी के लिए बनी स्टेप वेल हो या रौशनी के लिए की गई वास्तुकला।
गजियाबाद में रहनेवाली अंशु जैन, अपने घर से किसी भी प्लास्टिक की बोतल या खाली डिब्बे आदि को फेंकती नहीं, बल्कि अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल करके उसे नया रूप दे देती हैं। उनकी छोटी से बालकनी में रीसायकल करके बनाए गए प्लांटर ही ज्यादा हैं।
कोझीकोड के ई. बालकृष्णन की छत पर 500 से अधिक किस्मों के कैक्टस के पौधे हैं, जिसे उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ जापान, चीन, इंडोनेशिया, ब्राजील से इकट्ठा किया है।
भजन मण्डली में, हाथों में छोटा सा मंजीरा लिए कलाकार को जरूर देखा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि गुजरात के कच्छ में बना मंजीरा, आज देश ही नहीं, विदेशों में भी ख़रीदा जा रहा है।
धनबाद में कोल इंडिया के क्वार्टर में रहनेवाली नेहा कच्छप बचपन से ही पौधों के बीच पली-बढ़ीं। नेहा को शादी के बाद, हरियाली की कमी हमेशा खलती थी। लेकिन उन्होंने शिकायत करने के बजाय, माइनिंग एरिया में भी सैकड़ों पौधे लगाकर, कई लोगों को चौंका दिया।
78 वर्षीया राधा डागा, ‘त्रिगुणी ईज़ ईट्स’ नाम से पैकेज्ड फ़ूड कंपनी चलाती हैं। तक़रीबन 10 साल पहले रिटायरमेंट की उम्र में उन्होंने अपने खाना बनाने के शौक के कारण इस बिज़नेस की शुरुआत की थी।