मिलिए राजकोट की संगीता हरेश शाह से, जिनके नेक काम के कारण आज शहर के कई ज़रूरतमंद मरीजों को फ्री में एम्बुलेंस सेवा मिल रही है। पढ़ें उनकी कहानी और जानिए क्यों और कैसे हुई इस काम की शुरुआत।
एक गरीब माँ को अपने दिव्यांग बच्चे के साथ देखकर, आगरा के अनिल जोसेफ को ऐसे और बच्चों की मदद करने का ख्याल आया। उन्होंने ऐसे गरीब और बेसहारा दिव्यांग बच्चों के लिए एक एनजीओ शुरू करके एक शेल्टर होम बनाया, जो आज 75 विशेष बच्चों का घर बन चुका है।
गोरखपुर की रहने वाली यशी कुमारी के पिता ऑटो ड्राइवर हैं और यशी को बचपन से सेलेब्रल पाल्सी जैसी गंभीर बीमारी थी। लेकिन इन सब मुश्किलों से लड़कर उन्होंने पहले ही प्रयास में नीट के ज़रिए एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लिया।
हमारे भोजन में स्वाद और रंग लाने के अलावा, हल्दी का उपयोग इसके औषधीय गुणों के लिए भी किया जाता है। इम्युनिटी बढ़ाने से लेकर डैंड्रफ से लड़ने तक, उठा सकते हैं इसके कई सारे फ़ायदे।
घरेलू काम करते हुए बिहार की रश्मि कुमारी ने एक दिन सरकारी परीक्षा देने की सोची और अपने बच्चों के साथ पढ़ाई करके बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की परीक्षा पास कर ली। है न कमाल की बात!
मिलिए बिसलपुर के रहने वाले काना राम मेवाड़ा से, जो एक चाय की दुकान चलाने के साथ अपने गांव को प्लास्टिक फ्री भी बना रहे हैं। पढ़ें, उनकी स्पेशल मुहिम के बारे में, जिसके कारण आज हजारों किलो प्लास्टिक लैंडफिल में जाने से बच गया।
कोयम्बटूर (तमिलनाडु) की 23 वर्षीया राधिका जेए को हड्डियों की एक दुर्लभ बीमारी है, जिस वजह से वह ज़्यादा बाहर आ-जा नहीं सकतीं। लेकिन अपने हुनर के दम पर अब वह घर बैठे, महीने के 8-10 हज़ार रुपये कमा लेती हैं।
अपनी माँ और सास से गार्डनिंग के गुण सीखने के बाद, गाज़ियाबाद की रुचि गोयल को कोरोना काल में गार्डन सजाने का ऐसा जुनून सवार हुआ कि उन्होंने अपने घर के कबाड़ से ज़ीरो बजट में, गार्डन में चार चाँद लगा दिए, जिसकी तारीफ़ आज हर कोई करता है।
मिलिए उत्तर प्रदेश के चिरोड़ी गांव के 25 वर्षीय मास्टर सचिन बैंसला से, जिन्हें एक समय पर स्टार्टअप शुरू करने के लिए ढेरों ताने सुनने पड़े थे। लेकिन आज उनका पूरा गांव उन्हीं के नाम से जाना जाता है। पढ़ें, इस युवा के सफलता की कहानी।