पिछले 11 सालों से जैविक खेती कर रहे राजू राम राठौड़ कहते हैं कि जिन लोगों के पास ज़मीन कम है या फिर बिल्कुल नहीं है, वे इस विधि से सब्ज़ियाँ उगा सकते हैं!
लॉकडाउन में पशुओं का चारा की सबसे अधिक दिक्कत हो रही है। गांव में पशुओं को परेशानी न हो इसके लिए वह गेंहू की फसल का भूसा आदि बांट रहे हैं। इस काम में उनका अबतक करीब ढाई लाख रुपया खर्च हो चुका है।
“11 साल हो गए होंगे, जब मुझे कैंसर हो गया था, पीजीआई के डॉक्टरों ने आधा गाल काटकर निकाल दिया, जान तो बच गई, पैसे भी बहुत खर्च हुए लेकिन उसके बाद संभलना बहुत मुश्किल हो गया था। आपरेशन के बाद जब मैं ठीक हुआ तो सबसे पहले ये काम किया कि ऐसी खेती करनी है जिसमें नुकसान न हो।"
डॉ. विक्रम कॉफी के अलावा निचले क्षेत्रों में उगाया जाने वाला सेब, कीवी, ऐवाकाडो, पीस्ता और हींग की खेती को बढ़ावा देने के लिए विदेशों से मंहगे दामों में बीज मंगवाकर पहले तो इनकी पौधे अपने यहां तैयार करते हैं और इसके बाद इसे किसान-बागवानों में बांट देते हैं।