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वुडेन स्टोव, लेमन कटर से खेती की मशीनों तक, 10वीं पास ने किए 20 से भी ज्यादा इनोवेशन!

“हमें तो यह भी नहीं पता था कि जो काम हम कर रहे हैं वह इनोवेशन है।”

गुजरात के जूनागढ़ के पिखोर गाँव के रहने वाले भरत भाई अग्रावत को क्रियात्मक और रचनात्मक सोच अपने पिता अमृत भाई से विरासत में मिली। अमृत भाई की किसानी के साथ-साथ मशीनों से भी सांठ-गांठ थी। इसलिए अपनी रोज़मर्रा की परेशानियों को वे अपने जुगाड़ों से हल कर लेते थे।

भरत भाई को अगर हम एक सीरियल इनोवेटर भी कहें तो गलत नहीं होगा क्योंकि उन्होंने एक के बाद एक नए- नए इनोवेशन किये हैं। आज भी उनका इनोवेशन का सिलसिला बिना रुके जारी है।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए 53 वर्षीय भरत भाई ने बताया, “जब मैंन तीसरी कक्षा में था तब मेरे पिता जी ने अपना वर्कशॉप शुरू किया था। मैं भी स्कूल के बाद उनके पास पहुँच जाता। वे जो भी करते देखता रहता था और खुद मेरे दिमाग में भी तरह-तरह के आईडिया आते थे। पिताजी लोगों के लिए तरह-तरह की मशीन बनाकर देते थे और फिर उन्होंने एक बार खास तरह की बैलगाड़ी बनायी, जिसके लिए नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन से उन्हें सम्मान मिला।”

Bharatbhai Agrawat

भरत भाई हंसते हुए बताते हैं कि जब उनके पिता प्रोफेसर अनिल गुप्ता जी से मिले और उन्होंने उनसे कहा कि आप इनोवेशन कर रहे हैं। तब कहीं उन्हें पता चला चला कि वे इनोवेटर हैं और उनके इनोवेशन किसानों के लिए कितने हितकर हैं। अपने पिता की यह सराहना और सफलता भरत भाई के लिए प्रेरणा बनी।

भरत भाई को पढ़ाई में भले ही कम दिलचस्पी थी पर मशीनों से उनका रिश्ता हर दिन गहरा होता गया। स्कूल जाने से पहले वे वर्कशॉप खोलते, वहां धूप-अगरबत्ती करते और फिर दिन में क्या-क्या काम होगा यह भी एक बार देखते। फिर स्कूल से आकर देर रात तक अपने पिता के साथ काम करते।

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फिर दसवीं कक्षा के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और पूरा वक़्त वर्कशॉप में बिताने लगे। पिता की मदद करते-करते खुद उन्होंने कब इनोवेशन करना शुरू कर दिया, उन्हें पता भी नहीं चला। उन्होंने अब तक शायद 20 से भी ज्यादा इनोवेशन किये हैं, जिनमें से कुछ के लिए उन्हें दो बार राष्ट्रीय सम्मान मिला है।

सबसे पहले साल 1999 में उन्होंने विंडमिल पॉवर्ड वाटर पंप बनाया था, जिसके लिए उन्हें ज्ञान संस्था से काफी सराहना भी मिली। हालांकि, वे इस प्रोजेक्ट को बड़े स्तर पर नहीं कर पाए, लेकिन भरत का मनोबल कम नहीं हुआ। क्योंकि उन्हें पता था कि वे सही दिशा में काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने पास आने वाले किसानों की समस्याओं को हल करने पर ध्यान दिया।

Windmill Powered Water Pump

“हम गाँव में रहने वाले लोग हैं और गाँव की मुश्किलों को अच्छे से जानते हैं। इसलिए हमेशा यही कोशिश रही कि उनके लिए कुछ कर पाए। जब हमें यह हुनर मिला है तो गाँव के भले के लिए इस्तेमाल करें,” उन्होंने कहा।

साल 2000 में उन्होंने ‘रोलरमढ़’ नामक एक मशीन बनायीं जो कि भूमि को समतल करने के लिए है। अक्सर खेतों में मिट्टी के टीले होने से ज़मीन ऊँची-नीची रहती है और इस वजह से किसानों को बुवाई और सिंचाई करते समय काफी समस्या आती है। फिर बड़े वाला रोलर बुलाना हर एक किसान के लिए मुमकिन नहीं, इसलिए उन्होंने इसपर काम किया।

लेमन कटर:

इसके बाद उन्होंने निम्बू तोड़ने के लिए एक जुगाड़ बनाया। दरअसल, जब निम्बू के पेड़ पर कांटे होने की वजह से यह बहुत मुश्किल भरा काम हो जाता है। इसलिए भरत भाई ने ‘लेमन कटर’ बनाया- उन्होंने इसके लिए एक पीवीसी पाइप लिया जिसकी लम्बाई को कम-ज्यादा किया जा सकता है। इसके एक सिरे पर उन्होंने कैंची लगाई जाती है जो कि लीवर की मदद से काम करती है। दूसरे सिरे से जब लीवर को खींचते हैं तो कैंची काम करती है और वह निम्बू को टहनी से काट लेती है।

यह हमें भले ही छोटा-सा काम लगे पर निम्बू की खेती करने वाले किसानों के लिए यह बहुत ही कारगर यंत्र है। क्योंकि इससे न तो उनके हाथों को नुकसान पहुँचता है और न ही पेड़ को।

मल्टी-पर्पज वुडेन स्टोव:

“फिर गाँव में महिलाएं मिट्टी के चूल्हे पर काम करती हैं और इससे उनकी बहुत मेहनत लगती है। क्योंकि एक तो चूल्हा एक होने से वे एक साथ कई चीजें नहीं पका सकतीं। और दूसरा लकड़ी आदि भी काफी लग जाती हैं। इसलिए मैंने मल्टी-पर्पज वुडेन स्टोव बनाया,” उन्होंने आगे कहा।

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उनके बनाये स्टोव में दो कुकिंग चैम्बर और पानी गर्म करने के लिए एक गीजर सिस्टम है। दोनों कुकिंग चैम्बर का इस्तेमाल साथ में किया जा सकता है, इससे लकड़ी और समय- दोनों की बचत होती है। सभी कुकिंग और हीटिंग चैम्बर्स को अलग-अलग लेवल पर रखा गया है ताकि हीट एक समान मिले।

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स्टोव के अंदर की तरफ मिट्टी का इस्तेमाल किया गया क्योंकि इसमें काफी समय तक हीट को रिटेन करने की क्षमता होती है। साथ ही, एक चैम्बर के दोनों तरफ हवा पास होने के लिए छिद्र किये गये हैं ताकि स्टोव आसानी से ठंडा हो सके।

भरत भाई के मुताबिक उन्होंने अब तक लगभग 3000 वुडेन स्टोव गाँव की महिलाओं में बेचे हैं। इसके बाद उन्होंने छोटे किसानों की ज़रूरतों को समझा और अपने हुनर को उनकी मदद के लिए लगाया। किसानों के लिए उनके आविष्कारों में सबसे ज्यादा मशहूर हाथ से चलने वाली सीड ड्रिल, जिसमें कई बार उन्होंने किसानों की मांग पर संशोधन भी किये और सैकड़ों किसानों की मदद की।

हैंड ऑपरेटड सीड ड्रिल:

भरत भाई कहते हैं कि यह मशीन बीज की बुवाई में काफी काम आती है। इससे आप कई फसलों का बीज- तुअर, चना, मूंगफली आदि बो सकते हैं। यह मशीन कस्टमाइजेबल है और छोटे किसानों के लिए काफी हितकर है। उन्होंने अब तक लगभग 1200 सीड ड्रिल किसानों को बेचीं हैं। उनकी कुछ सीड ड्रिल तो ज्ञान फाउंडेशन के ज़रिये केन्या तक गयी हैं।

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“फिर कुछ किसानों की मांग आई कि सीड ड्रिल को मशीन से चलाया जाये। तो मैंने थोड़ा मॉडिफिकेशन करके बैटरी ऑपरेटड मशीन बनाई। इसकी कीमत 2500 रुपये है और यह किसानों के लिए काफी काम की चीज़ है। एक तो कम ज़मीन वाले किसानों के लिए अच्छा विकल्प है, दूसरा इससे मल्टी-क्रॉपिंग में काफी मदद मिलती है,” भरत भाई ने बताया।

सीड ड्रिल की ही तरह उन्होंने हाथ से काम करने वाला वीडर भी बनाया। किसानों के बीच उनकी सीड ड्रिल और वीडर- दोनों मशीन की काफी मांग है।

इसके अलावा उन्होंने ट्रेक्टर को मॉडिफाई करके भी 7-8 मॉडल बनाये हैं। “ये सभी मॉडल अलग-अलग ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनाये गये हैं। हमारे इलाके में बहुत से किसान हमारे बनाये हुए ट्रेक्टर ही इस्तेमाल सकते हैं। बड़े किसान जहां 35 हॉर्सपॉवर वाले सामान्य ट्रेक्टर इस्तेमाल करते हैं, तो छोटे किसानों को मैं 10 हॉर्स पॉवर तक के ट्रेक्टर बनाकर देता हूँ।”

किसी-किसी ट्रेक्टर में उन्होंने ऑटो-रिक्शा का इंजन इस्तेमाल किया है। इन ट्रेक्टर को इस तरह से मॉडिफाई किया गया है कि किसान इनसे आसानी से जुताई-बुवाई कर सके।

भरत भाई को उनके इनोवेशन के लिए दो बार राष्ट्रीय सम्मान से नवाज़ा गया है। उनके आविष्कारों का सिलसिला अभी भी बरकरार है और उनकी कोशिश है कि वे अपनी आखिरी सांस तक यह काम करते रहें। “ज्ञान संस्था की मदद से हमने अपने इलाके में एक कम्युनिटी वर्कशॉप शुरू की। यहाँ पर किसान अपने समस्याएं हमारे पास लेकर आते हैं और हम उनके आईडिया के मुताबिक मशीन बनाकर देते हैं,” उन्होंने कहा।

Different Models of Tractor

इस तरह से भरत भाई शायद अब तक सैकड़ों मशीन बना चुके हैं। उन्होंने जितनी मशीन बनाई हैं उनके सफर में चुनौतियाँ भी उतनी ही रही हैं। सबसे बड़ी चुनौती है सीधा बाज़ार न मिल पाना।

उनका कहना है कि बड़ी कंपनी मशीन बनाकर बाज़ारों में उतार देती हैं और फिर उन्हें कृषि विभागों से इसकी मार्केटिंग करने की अनुमति भी आसानी से मिल जाती है। पर उनके जैसे छोटे इनोवेटर कितने भी कारगर आईडिया दे दें, उनके प्रोडक्ट को उस तरह से मार्किट नहीं किया जाता, जिस तरह से होना चाहिए।

उनकी शिकायत है कृषि मंत्रालय और विभाग से कि जब वे किसानों के हित के लिए कम से कम लागत की मशीनें बना रहे हैं तो उन्हें कोई मदद क्यों नहीं मिलती? “मुझे बस यही लगता है कि एक किसान जब दूसरे किसानों के लिए काम करने को तैयार है तो सरकार और प्रशासन को उनके लिए कदम उठाने चाहिए। उन्हें हमारे बनाये इनोवेशन पर सब्सिडी देकर किसानों की मदद करनी चाहिए,” भरत भाई ने कहा।

हालांकि, प्रो. अनिल गुप्ता के मार्गदर्शन में वह काफी आगे बढ़ें हैं और उन्हें उम्मीद है कि उनके आविष्कार इसी तरह देश के किसानों के काम आते रहेंगे। फ़िलहाल, वह अपनी मशीनों को सोलर उर्जा से चलाने के लिए मॉडिफाई कर रहे हैं।

“आखिर में, मैं बस यही कहूँगा कि जो भी लोग यह कहानी पढ़ेंगे, वे अगर किसान हैं तो किसी भी तरह की मशीन बनाने के लिए हमें सम्पर्क करें। और अगर किसान भी नहीं हैं तो भी अपने आस-पास के किसानों को हमारे बारे में बताकर हमसे जोड़ें। हमें ख़ुशी होगी किसी की भी मदद करके।”

यदि आपको इस कहानी ने प्रभावित किया है और आप भरत भाई अग्रावत के बारे में अधिक जानना चाहते हैं या फिर कोई मशीन उनसे खरीदना चाहते हैं तो 09925932307 या 09624971215 पर कॉल कर सकते हैं!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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