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‘न किसी की शिक्षा रुके, न किसी की ज़मीन बिके,’ स्कॉलरशिप्स के ज़रिए बदलाव की पहल!

साल 2016 में शुरू हुआ यह संगठन अब तक 5 राज्यों में 5, 500 बच्चों को ढाई करोड़ रुपये की स्कॉलरशिप्स दिलवा चूका है।

“हमारे देश में हर साल लगभग डेढ़ करोड़ छात्रों के लिए लगभग 1500 स्कीम्स के अंतर्गत 18 हज़ार करोड़ रुपये की स्कॉलरशिप्स का वितरण होना होता है। जिसमें 10, 000 करोड़ रुपये की स्कॉलरशिप सरकारी योजनाओं के तहत आती हैं। लेकिन सवाल यह है कि इनमें कितनी स्कॉलरशिप छात्रों को वाकई मिलती हैं,” 31 वर्षीय सौरभ मेहरोत्रा ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए बताया।

सौरभ मेहरोत्रा, ‘युथ ड्रीमर्स फाउंडेशन’ के संस्थापक हैं, जिसके ज़रिये वे ज़रूरतमंद और हक़दार बच्चों को स्कूल से लेकर कॉलेज-यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप उपलब्ध कराते हैं। सौरभ का कहना है कि उनका उद्देश्य सिर्फ यही है कि किसी भी बच्चों को पैसे के अभाव में अपनी पढ़ाई न छोड़नी पड़े और हर एक बच्चे को अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त करने का मौका मिले।

उनके इस काम में उनका हर कदम पर साथ दिया है, इस संस्थान के को-फाउंडर मनीष शर्मा ने। मनीष का बैकग्राउंड इंजीनियरिंग से है और वे इस संगठन के स्ट्रेटेजी और टेक्निकल जिम्मेदारियों को पिछले तीन सालों से बहुत अच्छे से सम्भाल रहे हैं।

खुद झेली परेशानियाँ: 

एक बहुत ही साधारण से परिवार से संबंध रखने वाले सौरभ ने अपने स्कूल के समय से ही आर्थिक तंगी के चलते बहुत-सी परेशानियों को झेला है। उत्तर-प्रदेश के सीतापुर जिले के बिसवां तहसील के रहने वाले सौरभ के पिता यूपी हैंडलूम कॉर्पोरेशन में काम करते थे। लेकिन जैसे-जैसे देश में पॉवरलूम बढ़ता गया, तो हैंडलूम में काम करने वाले सभी कर्मचारियों के लिए नौकरियां जैसे खत्म ही हो गयीं।

“हमारे पापा के साथ भी यही समस्या हुई, कई-कई महीनों तक उनकी सैलरी नहीं आती थी। इसके चलते हम कभी सरकारी स्कूल में जाते तो कभी प्राइवेट स्कूल। फिर जब हम 12वीं में थे तो पापा की नौकरी छूट गयी और घर की स्थिति और खराब होने लगी,” उन्होंने आगे बताया।

उन्होंने लखनऊ यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन में दाखिला लिया, लेकिन वहां रहने के, खाने के पैसे जुटाने के लिए उन्हें पार्ट टाइम जॉब करनी पड़ती। कभी वे फोटोकॉपी की दूकान में काम करते तो कभी कहीं पर डाटा एंट्री की जॉब। सौरभ को कभी भी बहुत ज़्यादा नहीं चाहिए था, वे बस अच्छा पढ़ना चाहते थे। इसलिए जहां उन्हें कोई काम करने का मौका मिलता, वे पहुँच जाते ताकि उनकी ग्रेजुएशन बिना किसी रूकावट के पूरी हो जाये।

Saurabh Mehrotra (Left) and Manish Sharma (Right)

ग्रेजुएशन के दौरान ही उन्होंने एमबीए करने का मन बनाया और तैयारी शुरू कर दी। साल 2008 में उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की और उसी साल उनका MAT टेस्ट क्लियर हुआ। उन्हें अच्छे से अच्छे कॉलेज में दाखिला मिला, लेकिन अब उनके पास कोर्स की फीस भरने के पैसे नहीं थे।

“पापा ने कहा कि ज़मीन है थोड़ी अपनी, उसे बेच देते हैं या फिर उस पर लोन ले लेते हैं। ये बात मुझे नहीं सही लगी क्योंकि मुझे लगा कि अगर वह एक ज़मीन भी अपने पास नहीं रहेगी तो कैसे होगा। इसलिए मैंने उस साल दाखिला छोड़ दिया और फिर से एक-दो जगह नौकरी में जुट गये,” सौरभ ने बताया।

उन्होंने आगे कहा कि साथ में उन्होंने CAT की तैयारी भी शुरू की और साथ ही, असे कॉलेज और यूनिवर्सिटी की लिस्ट बनायी, जहां एमबीए के कोर्स की फीस सिर्फ़ एक लाख रुपये तक हो। साल 2009 में उन्हें लखनऊ यूनिवर्सिटी में ही एमबीए में दाखिला मिल गया और यहाँ फीस भी एक लाख रुपये ही थी।

सौरभ को यहाँ पढ़ते हुए किसी से पता चला कि कोर्स में टॉप करने वाले छात्र को यूनिवर्सिटी फुल कोर्स स्कॉलरशिप देती है। यह जानकर उन्होंने अपनी मेहनत दुगुनी कर दी ताकि उन्हें अपने पापा को पैसों के लिए न कहना पड़े। लेकिन उनके टॉप करने के बावजूद प्रशासन ने उन्हें स्कॉलरशिप देने से मना कर दिया, क्योंकि वे जनरल केटेगरी से थे।

“लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैं शहर के एसडीएम, डीएम के पास गया और उनसे अपनी स्कॉलरशिप के लिए लिखवाकर लाया। तब जाकर कहीं उस क्लर्क ने मुझे स्कॉलरशिप दी। पर उस एक स्कॉलरशिप ने बहुत-सी मुश्किलें आसान कर दीं। तब मुझे लगा कि अगर इस तरह की स्कॉलरशिप हैं देश में, तो हम बच्चों को इस बारे में बताया क्यूँ नहीं जाता,” सौरभ ने आगे कहा।

 

गाँधी फ़ेलोशिप से मिली राह:

एमबीए के बाद उन्हें गाँधी फ़ेलोशिप के ज़रिए राजस्थान के झुनझुनु इलाके के एक छोटे से गाँव में काम करने का मौका मिला। यहाँ भाना वालों की ढाणी में सौरभ काम कर रहे थे। इस दौरान उन्हें गाँव के ही परिवारों के यहाँ रहना था और उनकी समस्याओं को समझते हुए, उनके हल ढूंढने का प्रयास करना था।

“जिस परिवार के साथ मैं रह रहा था, वे चाहते थे कि उनका बेटा पॉलिटेक्निक करे। लेकिन उनके पास पैसे नहीं थे और उसकी फीस भरने के लिए वे अपनी कुछ बीघे ज़मीन को बेचने के लिए तैयार थे। उनकी स्थिति को देखकर मुझे अपने जीवन का संघर्ष याद आया और मुझे लगा कि नहीं, मैं तो आगे बढ़ जाऊँगा पर न जाने और कितने बच्चे हैं मेरे जैसे, जो आर्थिक कमियों के चलते पीछे रहते जाएंगे।”

He started with creating an awareness in schools and colleges

इस घटना के बाद सौरभ के मन में गरीब और ज़रूरतमंद बच्चों के लिए कुछ करने की भावना ने जन्म लिया। इसलिए जब उन्हें अपनी फ़ेलोशिप में एक ड्रीम आईडिया देना था तो उन्होंने अपनी पूरी स्ट्रेटेजी इसी विषय पर डिजाईन की कि कैसे बच्चों तक उनके लिए उपलब्ध स्कॉलरशिप्स की जानकारी पहुंचाई जाये और उनसे अप्लाई करवाया जाये।

साल 2012 में उन्होंने अपने इस आईडिया के लिए पायलट रिसर्च करना शुरू किया। इस दौरान उन्होंने राजस्थान के 20-25 सरकारी स्कूल और समाज कल्याण विभाग के दफ़्तर का दौरा किया।

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“आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन मुझे अपनी रिसर्च के दौरान पता चला कि यहाँ पर किसी को यह तक नहीं पता है कि हमारे देश में एक ‘पोस्ट मेट्रिक स्कॉलरशिप’ भी दी जाती है।” स्थिति की गंभीरता को समझते हुए सौरभ ने स्कूलों से शुरुआत की।

उन्होंने स्कूलों में जा-जाकर सेमीनार देना शुरू किया, जिसमें वे बच्चों को अलग-अलग स्कॉलरशिप के बारे में बताते थे। उन्होंने जागरूकता से शुरुआत की। फिर जब साल 2013 में उन्हें एशियन पेंट्स के सीएसआर विभाग में नौकरी मिली, तो उन्होंने यहाँ भी इसी विषय पर प्रोग्राम डिजाईन किया।

 

स्कूलों में बनवाई स्कॉलरशिप सेल:

एशियन पेंट्स के ज़रिए उन्हें गुजरात में 14 शिक्षण संस्थानों के साथ काम करने का मौका मिला। उन्होंने स्कूल लेवल पर स्कॉलरशिप सेल बनवाना शुरू किया। इन स्कॉलरशिप सेल में बच्चों को सभी स्कॉलरशिप प्रोग्राम- सरकारी हो या फिर प्राइवेट- के बारे में बताया जाता है। जागरूकता के साथ-साथ बच्चों की एप्लीकेशन भरने में भी मदद की जाती है और उसके बाद की प्रक्रिया में भी स्कूल पूरी भागीदारी निभाता है।

सौरभ बताते हैं कि उनके प्रयास रंग लाये और जहां पहले 10 हज़ार बच्चों में से सिर्फ़ 550 बच्चों को 3 लाख रुपये की स्कॉलरशिप मिली थीं, तो वहीं उनकी पहली स्कॉलरशिप सेल के ज़रिए ही लगभग 1600 बच्चों को 32 लाख रुपये की स्कॉलरशिप्स मिलीं। इस प्रोग्राम की सफलता के बाद सौरभ ने एक ऐसा संगठन खड़ा करने पर काम किया जो कि पूरे देश में एक सेतु का काम करे।

Founded ‘Scholarship Cell’ in government schools

“हमारे यहाँ इतनी स्कीम हैं, इतनी फंडिंग है कि अगर चाहें तो देश का हर बच्चा अच्छी से अच्छी शिक्षा पा सकता है। लेकिन पहले तो जागरूकता की कमी, फिर साधनों की और फिर कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के चलते यह सम्भव नहीं हो पाता। वैसे तो साल 2014 से ‘नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल‘ बनाकर सरकार ने प्रक्रिया को पारदर्शी करने की कोशिश की है। पर सवाल वहीं है कि देश की डिजिटल लिटरेसी अभी भी बहुत कम है।”

नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल पर भी छात्र-छात्राओं को बहुत-सी केन्द्रीय, राज्य स्तरीय और अन्य सरकारी स्कॉलरशिप्स के बारे में जानकारी मिल जाएगी। साथ ही, छात्र यहाँ पर सीधा स्कॉलरशिप के लिए अप्लाई कर सकते हैं!

 

यूथ ड्रीमर्स फाउंडेशन:

ऐसे में, सौरभ की ‘यूथ ड्रीमर्स फाउंडेशन’ देश के बच्चों के लिए इस खाई को पाटने की कोशिश कर रही है। साल 2016 में शुरू हुआ यह संगठन अब तक 5 राज्यों में 5, 500 बच्चों को ढाई करोड़ रुपये की स्कॉलरशिप्स दिलवा चूका है।राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, के अलावा दिल्ली और चेन्नई में भी उनकी मुहिम जारी है।

सौरभ बताते हैं कि उन्होंने स्कूल, कॉलेज के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे बहुत से सामाजिक सगठनों के साथ टाई-अप किया है। इनके माध्यम से उनकी टीम बच्चों को सबसे पहले जागरूक करती है। फिर सभी बच्चों की प्रोफाइलिंग की जाती है और देखा जाता है कि कौन-सा छात्र, किस स्कॉलरशिप के मानकों को पूरा कर रहा है।

इसके बाद, बच्चों से अप्लाई करवाया जाता है और फिर रेग्युलर फॉलो-अप भी होता है ताकि पता चलता रहे कि बच्चे को स्कॉलरशिप वक़्त पर मिल रही है या फिर नहीं। यूथ ड्रीमर्स फाउंडेशन अब तक 80 हज़ार बच्चों को स्कॉलरशिप्स पर सेमिनार देकर जागरूक कर चुकी है।

 

They also helps students in filling applications for scholarship in both, online and offline mode

सरकारी स्कीम के अलावा, देश में प्राइवेट सेक्टर की स्कॉलरशिप्स भी हैं जैसे कि एचसीएल का ‘माय स्कॉलर्स प्रोग्राम’ आदि। इसके अलावा, यदि कोई और कॉर्पोरेट या फिर प्राइवेट फण्डर, निजी तौर पर भी छात्रों के लिए अपना स्कॉलरशिप प्रोग्राम शुरू करवाना चाहते हैं, तो यूथ ड्रीमर्स फाउंडेशन से संपर्क कर सकते हैं।

सौरभ कहते हैं कि उनका यह सफ़र आसान नहीं है क्योंकि फंडिंग मिलना बहुत बार एक चुनौती की तरह लगता है।

“फ़िलहाल सबसे ज़्यादा परेशानी बिहार में हो रही है। क्योंकि बिहार सरकार की जो योजनाएं हैं, उन्हें तो हम जैसे-तैसे बच्चों तक पहुंचा रहे हैं लेकिन प्राइवेट फंडिंग यहाँ बहुत कम है। पता नहीं क्यों, लेकिन कॉर्पोरेट सेक्टर बिहार में स्कॉलरशिप प्रोग्राम फण्ड करने के लिए तैयार नहीं हैं।”

इसलिए, सौरभ सभी से अपील करते हैं कि यदि कोई भी प्राइवेट सेक्टर उन्हें बिहार के स्कॉलरशिप प्रोग्राम के लिए फंड कर सकता है तो बहुत अच्छा रहेगा। क्योंकि बिहार में टैलेंट की कोई कमी नहीं है, सिर्फ़ साधन और सुविधाओं की है।

“ऐसे में, हमारी कोशिश सिर्फ़ इतनी है कि पैसों की कमी के चलते किसी बच्चे की पढ़ाई न रुके या फिर किसी के पिता को अपना घर-ज़मीन न बेचना पड़े। अच्छी शिक्षा हर एक बच्चे का हक़ है और वह उसे बिना किसी भी भेदभाव के मिलना चाहिए।”

अगर आप किसी भी तरह से सौरभ की मदद कर सकते हैं या फिर आपको लगता है कि सौरभ आपकी मदद कर सकते हैं तो आप उनसे 9198999989 पर संपर्क कर सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए आप उनकी वेबसाइट या फिर फेसबुक पेज देख सकते हैं!

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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