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प्रोफेसर बना कृषि इनोवेटर, सौर ऊर्जा से किया किसानों का काम आसान!

“मैंने अपनी पढ़ाई के दौरान एक विषय पढ़ा था ‘एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग’ यानी कि ‘कृषि अभियांत्रिकी’ और मुझे उस विषय में बहुत दिलचस्पी रहती थी। इसलिए, जब मुझे मशीन नहीं मिली तो मैंने सोचा कि क्यों न अपने अनुभव को इस्तेमाल करके किसानों की ज़रूरत के हिसाब से मशीन तैयार की जाए।”

त्तर-प्रदेश के बागपत जिले के बड़ौत शहर निवासी डॉ. धर्मपाल सिंह दुहूँ, लगभग पिछले 25 वर्षों से कृषि के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। एक किसान परिवार में जन्में डॉ. सिंह ने कृषि विषय में ही अपनी पढ़ाई की और पीएचडी करने के बाद, शहर के जनता वैदिक कॉलेज के कृषि विभाग में शिक्षक की नौकरी ले ली।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए डॉ. सिंह ने बताया, “बचपन से ही मुझे खेती-बाड़ी के साथ-साथ कुछ न कुछ इनोवेटिव करते रहने का भी शौक रहा है। इसलिए मैं जो कुछ भी पढ़ता या सीखता, उसे अपने खेतों पर आज़माने की कोशिश करता था।”

आज 50 की उम्र पार कर चुके डॉ. सिंह कॉलेज में पढ़ाने के साथ-साथ किसानों को विभिन्न फसलों और खेती के तरीकों के बारे में कंसल्टेंसी भी देते हैं। उनका मानना है कि उनका अनुभव जब तक ज़मीनी स्तर पर किसानों के काम नहीं आएगा तब तक इसका कोई फायदा नहीं होगा। इसलिए उन्होंने अपने प्रोफेशन के साथ-साथ सोशल वर्क के लिए कृषि एवं हर्बल गार्डन कल्याण ट्रस्ट भी शुरू किया।

” लगभग 8-9 साल पहले से मुझे गले में काफी परेशानी होने लगी, बोलने में दिक्कत होती थी। डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि वोकल कॉर्ड में समस्या हो रही है। उन्होंने सलाह दी कि बेहतर होगा अगर मैं बहुत ज्यादा समय तक बोलता न रहूँ और गले को ज्यादा से ज्यादा आराम दूँ,” उन्होंने आगे कहा।

Dr, D. P. Singh Duhoon

लेकिन कॉलेज में हर रोज़ पढ़ाते वक़्त उन्हें लगातार बोलना ही पड़ता था, इसलिए उन्होंने अपनी टीचिंग की जॉब से इस्तीफ़ा दे दिया। कॉलेज छोड़ने के बाद, डॉ. सिंह के पास काफी समय रहता था और उन्होंने अपने इस समय को किसानों की भलाई के लिए लगाने का फैसला किया।

“जो भी किसान मेरे पास आते थे, उन्हें मैं पारम्परिक खेती के साथ-साथ कमर्शियल खेती करने की सलाह भी देता था। क्योंकि कमर्शियल फसलों में किसान को ज्यादा आय मिलती है और इन्हें वह सामान्य फसलों के साथ आसानी से उगा सकता है।” – डॉ. सिंह

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डॉ. सिंह आगे बताते हैं कि वह किसानों को औषधीय फसलें जैसे कि सफ़ेद मुसली, शतावरी और एरोमेटिक फसलें, जैसे कि हल्दी, पचौली, दवना आदि उगाने की सलाह देते हैं। औषधीय फसलों का इस्तेमाल कुछ दवाइयां बनाने में होता है तो एरोमेटिक फसलें, रसोई के लिए मसाले और ब्यूटी इंडस्ट्री के कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स बनाने के लिए इस्तेमाल होती हैं। यदि कोई भी किसान तरीके से इनकी खेती करे और फिर अच्छी तरह से मार्केटिंग करे तो उन्हें काफी फायदा हो सकता है।

भारत में ज़्यादातर किसानों को कृषि के इन क्षेत्रों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है। बीज कहाँ से लेना है, कैसे खेती करनी है और फिर कहाँ बेचना है जैसे सवाल लिए बहुत से किसानों का मार्गदर्शन, डॉ. सिंह कर रहे हैं। अपनी थोड़ी-बहुत पुश्तैनी ज़मीन पर वह खुद सफेद मुसली और शतावरी जैसी फसलों की खेती करते हैं।

“मैं किसानों को ये सारी फसलें उगाने की सलाह तो बहुत वक़्त से दे रहा था, लेकिन जब मैंने खुद इन फसलों को उगाना शुरू किया तो मुझे बहुत से ऐसे कारणों का पता चला, जिस वजह से ये किसान फसल उगाने से कतराते थे। मैं अपने अनुभव से आपको कह रहा हूँ कि एक एकड़ में सफ़ेद मुसली या फिर शतावरी की खेती से किसान को 5 लाख रुपये तक की आय हो सकती है, लेकिन इनकी प्रोसेसिंग में एक लाख रुपये तक का खर्च आ जाता है,” उन्होंने आगे कहा।

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सफ़ेद मुसली और शतावरी की प्रोसेसिंग में बहुत मेहनत है और लागत भी, क्योंकि दोनों फसलों में ज़्यादातर काम लेबर से करवाना पड़ता है। इन सभी समस्याओं को देखते हुए, डॉ. सिंह ने समाधानों पर विचार करना शुरू किया। कहते हैं न कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है, बस ऐसा ही कुछ उनके साथ हुआ।

वह बताते हैं कि उन्होंने बाज़ार में इन दोनों फसलों की प्रोसेसिंग के लिए मशीन ढूंढने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। उनके मुताबिक अभी भी कृषि से संबंधित मशीन बनाने वाली कोई भी कंपनी, इन दोनों फसलों की प्रोसेसिंग मशीन नहीं बना रही है।

“मैंने अपनी पढ़ाई के दौरान एक विषय पढ़ा था ‘एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग’ यानी कि ‘कृषि अभियांत्रिकी’ और मुझे उस विषय में बहुत दिलचस्पी रहती थी। इसलिए जब मुझे मशीन नहीं मिली तो मैंने सोचा कि क्यों न अपने अनुभव को इस्तेमाल करके किसानों की ज़रूरत के हिसाब से मशीन तैयार की जाये।”

डॉ. सिंह बताते हैं कि उन्होंने सबसे पहले परेशानियों को समझा, फिर मशीनों की ड्राइंग, डिज़ाइन और ब्लू प्रिंट तैयार किया। उन्होंने साल 2014 में अपनी रिसर्च शुरू की और साल 2018 तक तीन मशीनें तैयार कीं – सफेद मुसली पीलिंग एंड वाशिंग मशीन, शतावरी पीलिंग एंड वाशिंग मशीन, और सोलर पॉवर्ड वीडर मशीन फॉर मल्टीक्रॉप!

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Processing Machine for Safed Musli

एक बार जब उन्होंने रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर काम खत्म कर लिया तो एक स्थानीय फेब्रिकेटर को मशीन बनवाने के लिए सम्पर्क किया। वह जैसे-जैसे बताते गए, मैकेनिक ने वैसे ही मशीनों को तैयार किया। मशीन बनने के बाद, सबसे पहले उन्होंने खुद अपने खेत में ही मशीनों को टेस्ट किया। इसके बाद, उन्होंने एक-दो किसानों को भी मशीन इस्तेमाल करके देखने के लिए कहा। डॉ. सिंह के मुताबिक सफेद मुसली और शतावरी के लिए उनकी दोनों मशीन ज़मीनी स्तर पर भी एकदम सफल हैं।

“सफ़ेद मुसली और शतावरी की फसलों की हार्वेस्टिंग के बाद इनकी जड़ों/फिंगर्स का छिलका  उतारना होता है और इस काम में काफी मेहनत-मजदूरी लगती है। मेरा उद्देश्य यही था कि एक तो मेहनत कम लगे और साथ ही, किसान की लागत को कम किया जाए। इस काम में मेहनत तो बहुत लगी पर मुझे ख़ुशी है कि मैं सफल हो पाया,” डॉ. सिंह ने कहा।

उन्होंने आगे कहा कि अगर किसान इन फसलों की धुलाई और छिलके उतारने के लिए उनकी पीलिंग एंड वाशिंग मशीन का इस्तेमाल करे तो मुश्किल से 5 हज़ार रुपये का खर्च आएगा। ये मशीनें लगभग 200 किलोग्राम फसल को एक घंटे में वॉश और पील कर देती हैं। इससे किसानों का समय भी बचेगा और लागत भी साथ ही आय में भी इजाफा होगा।

शतावरी पीलिंग एंड वॉशिंग मशीन का एक वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं:

अपनी तीसरी मशीन, ‘सोलर-पावर्ड वीडर मशीन फॉर मल्टीक्रॉप’ के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “खरपतवार की समस्या हमारे यहाँ बहुत ही सामान्य है और इसे खेतों से निकालने की प्रक्रिया को निराई-गुड़ाई कहते हैं। इसके लिए मार्केट में मशीन भी उपलब्ध हैं। अगर हम पूरे देश की बात करें तो 70 से ज्यादा फसलें हमारे यहाँ लाइन में बोई जाती हैं। उनकी निराई-गुड़ाई की मशीन एक तो पेट्रोल-डीजल से चलने वाली हैं और दूसरा, अलग-अलग फसलों के हिसाब से हैं। क्योंकि एक फसल के पौधों के बीच की दूरी दूसरी फसल से अलग होती है।”

ऐसे में, समस्या यह है कि पेट्रोल-डीजल, दोनों ही महंगे हैं और उनका काफी रख-रखाव होता है। ऐसे में हर फसल के लिए अलग-अलग मशीन खरीदना किसान के लिए मुमकिन नहीं। इसलिए डॉ. सिंह ने सौर ऊर्जा से चलने वाली वीडर मशीन बनाई जो सभी तरह की फसलों के लिए काम करे।

“आप इस मशीन को ज़ीरो लागत के साथ किसी भी फसल में इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके फीचर ऐसे ही रखे गये हैं कि किसान अपनी फसल के हिसाब से इसे कस्टमाइज कर सके। सोलर पैनल लगाने के कारण पेट्रोल-डीजल का तो कोई खर्च नहीं है।”- डॉ. सिंह

Solar Powered Weeder For Multi crop

डॉ. सिंह को उनकी मशीनों के लिए बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी की तरफ से एक ग्रांट और पेटेंट ऑफर मिला है, जिसके बारे में अभी उनकी बातचीत चल रही है। हालांकि, उनकी कोशिश यही है कि वह इस मशीन को ज़रूरतमंद किसानों तक पहुंचाए।

वह कहते हैं, “एक-दो किसान हैं जो इस्तेमाल कर रहे हैं यह मशीन। मुझे फ़ोन तो काफी आते हैं पर ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि एक बार मशीन की प्रक्रिया समझ लें तो खुद किसी से बनवा लेंगे। मैंने अभी ज्यादा कहीं मशीनों के बारे में बताया नहीं है क्योंकि अभी पेटेंट नहीं हुआ है। लेकिन अगर किसी भी किसान भाई को ज़रूरत है तो वे बेझिझक फ़ोन करें, मैं यथा संभव उनकी मदद करूँगा।”

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अंत में उनका संदेश सिर्फ इतना ही है कि अब किसानों को सामान्य पारम्परिक खेती से निकलकर इनोवेटिव, ऑर्गेनिक और कमर्शियल खेती की तरफ बढ़ने की ज़रूरत है। समय बदल रहा है तो ज़रूरी है कि कृषि के क्षेत्र में भी बदलाव हों, तभी किसान आधुनिक समय में मुनाफा कमा पाएंगे।

यदि कोई भी किसान खेती से संबंधित किसी भी तरह का मार्गदर्शन चाहता है या फिर उनकी मशीनों के बारे में अधिक जानना चाहता है तो उनसे 9917862313 पर कॉल करके पूछ सकते हैं!

संपादन- अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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