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सातवीं पास शख्स ने बनाई अनोखी तकनीक, बढ़ा सकते हैं ट्रैक्टर की लम्बाई

ज्यादा लम्बे ट्रैक्टर की ज़रूरत दो-तीन महीने के लिए ही होती है, जिसके बाद किसान हाइट-अटैचमेंट हटाकर फिर से इसे छोटे ट्रैक्टर की तरह इस्तेमाल कर सकता है।

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कॉटन, तुअर, और गन्ना जैसी फसलें एक वक़्त के बाद जब काफी बड़ी हो जाती हैं तो खेतों में से खरपतवार निकालना, या फिर उनमें कीट-प्रतिरोधक का छिड़काव करना काफी मुश्किल हो जाता है। रिले क्रॉपिंग के लिए अगर आप दो क्यारियों के बीच खाली पड़ी जगह को इस्तेमाल भी करना चाहें तो जुताई की समस्या खड़ी हो जाती है।

पहले लोग यह सब काम बैलों की मदद से कर लिया करते थे या फिर ज़्यादातर लोग खुद ही अपने खेतों में मजदूरों की सहायता से यह काम कर लेते थे। निराई-गुड़ाई के लिए काफी तरह के यंत्र बाज़ार में उपलब्ध हैं लेकिन जिन फसलों की लंबाई अधिक होती है, उनमें इन यंत्रों से काम करना भी मुश्किल हो जाता है।

लेकिन अगर किसान ट्रैक्टर पर बैठकर ये सभी कार्य करे तो? जी हाँ, ट्रैक्टर पर। लेकिन फिर सवाल आता है कि ट्रैक्टर के नीचे दबकर सारी फसल खराब हो जाएगी। बिल्कुल, यह समस्या तो है कि आप खड़ी फसल के बीच में सामान्य ट्रैक्टर इस्तेमाल नहीं कर सकते। लेकिन उसी ट्रैक्टर में जरा-सा बदलाव कर उसे ऊपर उठा दिया जाए तो?

जी हाँ, यह कारनामा किया है गुजरात के जतिन राठौर ने। बोताड जिला के 49 वर्षीय जतिन ने ऐसा सिस्टम बनाया है जिससे आप अपने छोटे ट्रैक्टर की लंबाई बढ़ा सकते हैं और फिर इसे खड़ी फसल के बीचों-बीच भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

Jatin Rathore, Botad, Gujarat

जतिन ने द बेटर इंडिया को बताया कि उन्होंने जो सिस्टम बनाया है वह छोटे ट्रैक्टरों में काफी कारगर साबित हो रहा है। अगर आपके पास किसी भी कंपनी का छोटा ट्रैक्टर है तो आप उनके यहाँ से इसकी लंबाई बढ़ावा सकते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि जब आपका काम पूरा हो जाए, उसके बाद आप यह सिस्टम निकाल दीजिए और इसे फिर से छोटे ट्रैक्टर की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।

अपने सफ़र के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया, “मेरे पिताजी तिपहिया टैम्पो बनाने का काम करते थे। उनकी वर्कशॉप थी पर जब मैं सातवीं कक्षा में था तो पिता जी की तबियत काफी खराब रहने लगी। इसलिए मैंने पढ़ाई छोड़कर उनकी वर्कशॉप पर काम सीखना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे सभी काम मैं संभालने लगा और कुछ समय बाद पिताजी का देहांत भी हो गया तो सभी ज़िम्मेदारियाँ मुझ पर आ गईं।”

जतिन ने अपने पिताजी के शुरू किए काम को और आगे बढ़ाया। उन्होंने टैम्पो से हटकर छोटे ट्रैक्टर बनाने की शुरूआत की। वह कहते हैं कि साल 1995 में उन्होंने पहला ट्रैक्टर बनाया था। लेकिन उसी समय के आसपास राजकोट की एक फर्म फील्ड मार्शल ने भी एक छोटा ट्रैक्टर लॉन्च किया और देखते ही देखते उनका ट्रैक्टर बाज़ार में छा गया। छोटा ट्रैक्टर छोटे किसानों से लेकर बड़े किसनों तक सभी के काम का था। इसलिए महिंद्रा कंपनी ने भी इसमें इन्वेस्ट किया और फील्ड मार्शल के साथ मिलकर ही महिंद्रा युवराज निकाला।

“मेरे पास इतने साधन नहीं थे कि मैं इतनी बड़ी कम्पनियों का मुकाबला कर पाता। इसलिए मैंने ट्रैक्टर बनाने का काम बंद कर दिया और बाकी कृषि यंत्र आदि बनाने पर ही जोर दिया,” उन्होंने आगे कहा।

लेकिन कुछ अलग और नया करने का उनका जोश खत्म नहीं हुआ था। जतिन अपनी वर्कशॉप पर आने वाले किसानों से बात करते, उनकी परेशानियाँ सुनते और समझते। इस सबके दौरान उन्हें समझ में आया कि किसानों के पास ऐसा कुछ यंत्र भी होना चाहिए जो फसल के बड़े होने के बाद भी खेतों में इस्तेमाल हो सके। तब उन्हें आइडिया आया कि क्यों न ट्रैक्टर की लम्बाई बढ़ाने पर काम किया जाए। उन्होंने कई सारे एक्सपेरिमेंट करके ऐसा सिस्टम बनाया जिससे आप अपने छोटे ट्रैक्टर की लम्बाई बढ़ा सकते हैं और काम होने के बाद इसे फिर से छोटे रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

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उन्होंने कहा, “किसानों को इस लम्बे ट्रैक्टर की ज़रूरत मौसम में दो-तीन महीनों के लिए हो होती है। उसके बाद उपज की हार्वेस्टिंग होने लगती है। इसलिए कोई मतलब नहीं था कि सिर्फ लम्बा ट्रैक्टर ही रखा जाए। इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैंने ऐसा ही सिस्टम बनाया कि इसे छोटे और लम्बे दोनों रूप में इस्तेमाल किया जा सके।”

उन्होंने शुरुआत में सिर्फ अपने इलाके के किसानों के लिए यह काम किया। फिर धीरे-धीरे पूरे गुजरात से उनके पास किसान आने लगे और उनका यह सिस्टम चल गया। जतिन के ट्रैक्टर की एक वीडियो देखकर बेंगलुरु की विटीएस मित्सुबिशी कंपनी ने उन्हें संपर्क किया और उनके लिए काम करने का आग्रह किया। तब से उनका यह सिस्टम कर्नाटक, आंध्र-प्रदेश, तेलांगना और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी जा रहा है।

अगर ट्रैक्टर 15 एचपी से 20 एचपी के बीच का है तो सिस्टम की लागत 45 हज़ार रुपये आती है। लेकिन अगर ट्रैक्टर ज्यादा एचपी का है तो 65 से 75 हज़ार रुपये तक का खर्च आता है।

इससे किसान अपनी खड़ी फसल के बीच भी खेत की जुताई-बुवाई कर सकता है। साथ ही, अगर आपको कोई फ़र्टिलाइज़र स्प्रे आदि करना है तो भी यह ट्रैक्टर बहुत काम आता है। जतिन ने इस ट्रैक्टर के हिसाब से कल्टीवेटर, स्प्रेयर जैसे कृषि यंत्र भी डिज़ाइन किए हैं। बाकी किसान अपने यंत्रों को थोड़ा-सा मोडिफाई करके भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

जतिन कहते हैं कि जब दूसरे राज्यों से उन्हें ऑर्डर मिलने लगे तब उन्हें लगा कि उन्होंने कुछ अलग और बड़ा किया है। पर उन्हें ख़ुशी है कि वह किसानों की समस्यायों के हिसाब से कुछ बना पाएं। अब वह इस मॉडल को हाइड्रोलिक सिस्टम पर करने की योजना पर काम कर रहे हैं।

“हम ऐसा डिज़ाइन बना रहे हैं जिससे ट्रैक्टर को खेत में ही छोटा या फिर लम्बा किया जा सके। किसान को अलग से इसके लिए कारीगर न बुलाना पड़े या फिर उसे खुद मेहनत न करनी पड़े। आने वाले कुछ महीनों में उम्मीद है कि हमारा यह मॉडल भी तैयार हो जाएगा,” उन्होंने अंत में कहा।

अगर आप इस ट्रैक्टर के बारे में अधिक जानना चाहते हैं तो आप जतिन राठौर से 9574692007,9879041242 पर बात कर सकते हैं!


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