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कभी करते थे साइकिल मरम्मत का काम, आज हैं आईएएस अफ़सर!

“आज से बारह साल पहले मैं सोच भी नहीं सकता कि मैं कभी भी जीवन में इस मुकाम पर पहुंचूंगा। मुझे यह तक नहीं पता था कि मैं कभी हाई स्कूल में भी दाखिला ले पाऊंगा। फिर भी आज मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा विभाग का एक प्रतिष्ठित सदस्य हूँ।

साल 2006 में मेरे पिता की मृत्यु के बाद घर में सबसे बड़ा बेटा होने के नाते घर की ज़िम्मेदारी मेरे कन्धों पर आ गयी थी। मैंने मन बना लिया था कि अब मुझे पढाई छोड़नी है और मैंने अपने पिता की साइकिल मरम्मत की दुकान को संभालने का फैसला किया। मैंने अपनी कक्षा 10 की परीक्षा दी और मुझे लगा कि बस इतना ही है मेरे लिए। लेकिन परीक्षा का परिणाम आने पर सब बदल गया। मेरे पुरे गांव में मैंने सबसे ज्यादा अंक प्राप्त किये थे। मैं अपने गांव में टॉपर था। पढाई में मेरी दिलचस्पी को समझते हुए मेरी माँ ने पास के हाई स्कूल में मेरा दाखिला करवा दिया और खुद घर पर हमारी देखभाल करते हुए दूकान की भी ज़िम्मेदारी उठा ली।

मेरे पिता के डॉक्टर ने वर्दी, किताबें आदि खरीदने और शुरुआती फीस भरने में हमारी आर्थिक मदद की। क्रिकेट मैदान पर मेरा एक दोस्त बना जिसने मुझे अपने कोचिंग संस्थान में 1500 रूपये वेतन के साथ पार्ट-टाइम नौकरी दी। जब मैं कई महीनों तक स्कूल की फीस चुकाने में असमर्थ था तो मेरे शिक्षकों ने पुरे दो साल पैसे इकट्ठे करके मेरी स्कूल की फीस भरी।

बहुत से दयालु लोगों ने मेरे सफर में मेरी मदद की। हाई स्कूल के बाद में इंजीनियरिंग के लिए परीक्षा दी। जिसे मैंने पास कर लिया था। लेकिन मेरी एक गलती के चलते पुणे का एमआईटी कॉलेज ही मेरे लिए एकमात्र विकल्प रह गया था। लेकिन, बाद में मुझे समझ आया कि अच्छा हुआ जो मुझसे वह गलती हुई।

मेरे पिता के डॉक्टर ने एक स्थानीय होटल के मालिक के साथ मिलकर इंजीनियरिंग प्रथम वर्ष में मेरे दाखिले के लिए हर संभव मदद की। कॉलेज में आने के बाद मैंने दृढ़ संकल्प लिया कि जैसे भी हो मै आने वाले सालों के स्कॉलरशिप पाकर ही रहूंगा। पहले वर्ष में, मैं पूरे पुणे विश्वविद्यालय में दूसरे स्थान पर रहा। बाकी तीन वर्षों में, मैं विश्वविद्यालय का टॉपर बना रहा। मेरे सभी शिक्षकों ने ट्रस्टी कमिटी को एक संवेदनशील पत्र लिखकर मुझे स्कॉलरशिप देने की अपील की। मेरी अकादमिक मेरिट को देखकर मुझे स्कॉलरशिप मिल गयी। इसके अलावा, हर एक सेमेस्टर में मेरे सभी शिक्षक मुझे इकट्ठा करके 20-25 हज़ार रूपये देते ताकि पुरे छह महीने मेरा बाकी खर्च चल सके। मेरे सभी दोस्त मेरी महंगी किताबों को खरीदने में मदद करते। इस सबके चलते मेरे घर पर बोझ कम हो गया था। मेरे छोटे भाई ने भी माँ के साथ दूकान पर काम करना शुरू कर दिया था, जिससे मेरी पढाई में कोई रुकावट न आये।

हालांकि, साल 2011 में चीजें बदल गयीं। मैं अन्ना हजारे के जन लोकपाल आंदोलन से प्रेरित था। मैंने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर फैसला किया कि हम प्राइवेट सेक्टर में नौकरी नहीं करेंगें (जहां मुझे पहले से ही एक प्लेसमेंट मिल चुकी थी)। इसकी जगह हमने अपने देश में बदलाव की मुहीम शुरू करने वाले एजेंट बनने के बारे में सोचा। और उस समय, मेरे एक दोस्त के पापा ने मुझे सुझाव दिया कि मैं आईएएस के लिए तैयारी करूं। लेकिन मेरे परिवार की अपेक्षाएं थी कि मुझे कमाना चाहिए न कि ऐसे चीज़ के पीछे भागना चाहिए जिसमें सफलता मिलने के मौके 1% से भी कम हैं। हालांकि, मेरे कहने पर मुझे घर से एक साल का समय दिया गया। मेरे पास सिर्फ यही एक मौका था।

मुझे मार्गदर्शन की जरूरत थी लेकिन किसी भी कोचिंग संस्थान में दाखिला लेने के लिए पैसे नहीं थे। मेरे दोस्तों में से एक ने मुझे अविनाश धर्मधिकारी सर के बारे में बताया, जो कि एक कोचिंग इंस्टिट्यूट चलाते हैं। और उनके अपने शब्दों में कहा जाये तो वे राष्ट्रीय सेवा के लिए बेहतरीन लोगों का निर्माण कर रहे हैं। हाँ, वे फीस तो लेते हैं लेकिन अगर उन्हें मना लिया जाये तो कोई भी उनके मार्गदर्शन के रास्ते में नहीं आ सकता। मैं उनसे मिला। कुछ महीनों बाद उन्होंने मुझे न केवल फ्री में कोचिंग दी बल्कि अपने इंस्टिट्यूट में मुझे एक पार्ट-टाइम नौकरी दी। जिसके लिए वे मुझे वेतन भी देते थे, जिसमें से मैं कुछ पैसे अपने परिवार को घर पर भेज देता। उन्होंने मुझे सिखाया कि अनुभवों से कैसे सीखा जाता है। उन्होंने हमें जमीनी स्तर पर जाकर पर्यावरणीय मुद्दों को समझने के लिए वन गार्ड के सहयोगियों के रूप में काम करने के लिए एक सप्ताह के लिए मेलघाट टाइगर रिजर्व भेजा। उन्होंने हमें अलग-अलग समूह में बांटा और हमें विभिन्न मुद्दों का अध्ययन करने के लिए देश भर में भेजा – जम्मू-कश्मीर में एक टीम, लाल गलियारे के लिए दो टीम, उत्तर-पूर्व में दो टीम, तेलंगाना के लिए एक टीम।

अगर ऐसा नहीं होता तो मुझमे कभी भी यह बदलाव ना आता जिसकी मदद से मैं परीक्षा एक ही बार में पास कर पाया और मेरी माँ से किये हुए वादे को पूरा किया। जब भी मैं काम करता हूँ तो हर उस सबक को याद करने की कोशिश करता हूँ जो मैंने अपने सफर में सीखा। यकीन मानिये, इससे मैं और भी बेहतर तरीके से सेवा कर पता हूँ और साथ ही हमारे देश के बदलाव में एक सक्रिय एजेंट की भूमिका निभा रहा हूँ।”

वरुणकुमार बरनवाल
आईएएस 2014 बैच
गुजरात कैडर

"Twelve years ago I could not have imagined even in my wildest dreams that I would be where I am today. Heck, I wasn’t…

Posted by Humans of Lbsnaa on Saturday, September 22, 2018


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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