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फिटनेस के साथ सफाई भी: जॉगिंग करते हुए इस युवक ने इकट्ठा किया 50,000 किलो कचरा!

इकट्ठे किए हुए कचरे को विवेक और उनकी टीम रिसायकलिंग के लिए भेज देती है।

हाराष्ट्र के पुणे में रहने वाले 24 वर्षीय विवेक गुरव पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और पैशन से एक पर्यावरण संरक्षक। कॉलेज के दिनों से ही पर्यावरण और प्रकृति को बचाने के लिए तत्पर रहे विवेक ने कॉर्पोरेट लाइफ में आकर भी अपना पैशन नहीं छोड़ा। पिछले छह सालों से वह लगातार पुणे में होने वाले स्वच्छता अभियानों से जुड़े हुए हैं।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने अपने सफ़र के बारे में बताया, “ग्रैजुएशन के दौरान ही मैं स्वच्छ भारत अभियान से जुड़ गया था। पुणे में या फिर दूसरे शहरों में, जहाँ भी मौका मिलता मैं हर क्लीन-अप ड्राइव में हिस्सा लेता और खुद भी बहुत-सी ड्राइव मैंने की है। लेकिन एक बात जो बहुत ही निराशाजनक लगती थी, वह थी लोगों का रेग्युलर तौर पर स्वच्छता ड्राइव्स में न आना।”

विवेक ऐसा कुछ करना चाहते, जो थोड़ा अलग हो, थोड़ा क्रियात्मक और रचनात्मक। जिससे कि ज्यादा से ज्यादा लोग इससे जुड़ें और पुणे को रहने के लिए प्लास्टिक-फ्री व सस्टेनेबल जगह बनाया जा सके। उन्हें ऐसा करने का तरीका ‘प्लाॉगिंग’ में नज़र आया।

‘प्लाॉगिंग’ दो अलग-अलग शब्दों से जुड़कर बना है-  जॉगिंग और प्लॉका अप (Jogging and Plocka upp)। अंग्रेजी शब्द पिक अप (pick up) को स्वीडिश भाषा में प्लॉका अप कहते हैं। प्लॉगिंग तेजी से उभरता हुआ अंतरराष्ट्रीय ट्रेंड है जिसमें लोग जॉगिंग करते हुए या तेजी से चलते हुए रास्ते पर पड़ा कूड़ा उठाते हैं। इससे एक साथ दो काम हो जाते हैं- फिटनेस और सफाई।

“मुझे लगा कि इस तरीके से शायद काम बन जाए। आजकल लोगों में फिटनेस के प्रति काफी जागरूकता है, चाहे फिर उम्र कोई भी हो। अक्सर शनिवार-रविवार को हम दोस्तों का मिलना होता था और मैंने इसी दौरान उनसे इस विषय पर बात की,” उन्होंने आगे कहा।

VIvek Gurav who started 'Pune Ploggers'
VIvek Gurav who started ‘Pune Ploggers’

जून 2019 से उन्होंने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर शहर में लगभग 10 पायलट प्लाॉगिंग ड्राइव्स कीं। वे जिस भी रास्ते से जॉगिंग करते हुए गुजरते, वहां रास्ते में पड़ा हुआ कचरा जैसे प्लास्टिक की बोतल, कांच की बोतल, पॉलिथीन, रैपर पैक आदि इकट्ठा करते। इस दौरान, वह अपने साथ और 20 लोगों को जोड़ने में सफल रहे।

इसके बाद, उन्होंने अपने इस अभियान को शहर के हर भाग में फैलाने की सोची और जिसके लिए उन्होंने ‘पुणे प्लाॉगर्स’ नाम से अपनी पहल शुरू की!

उनका उद्देश्य था कि वह हर एक इलाके में एक टीम बनाए जो लगातार उस इलाके में प्लाॉगिंग करे और नए लोगों को भी अपने साथ जोड़े। इसके लिए, उन्होंने तय किया कि वह हर वीकेंड अलग-अलग इलाकों में जाकर कैंपेन करेंगे। पार्कों में जाकर लोगों को जागरूक करेंगे और उन्हें बताएंगे कि कैसे प्लाॉगिंग के ज़रिए वे अपनी सेहत के साथ अपने आस-पास के वातावरण का ध्यान भी रख सकते हैं।

पिछले साल शुरू हुए उनके इस अभियान से आज 500 से भी ज्यादा लोग जुड़ गए हैं।

स्कूल में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं से लेकर सीनियर सिटीजन तक, सभी उम्र के लोग उनके इस अभियान का हिस्सा हैं। हर शनिवार को ये लोग साथ में मिलकर टीम बनाते हैं और लगभग 6 जगहों पर प्लाॉगिंग ड्राइव करते हैं। रविवार को वे एक मुख्य जगह चुनते हैं जहाँ ज्यादा वक़्त और ध्यान की ज़रूरत है।

विवेक बताते है फ़िलहाल हर रविवार को वे मुठा नदी पर ड्राइव कर रहे हैं। अब तक, उन्होंने 100 से भी ज्यादा प्लाॉगिंग ड्राइव की हैं और लगभग 50 हज़ार किलोग्राम प्लास्टिक कचरा इकट्ठा किया है।

‘पुणे प्लाॉगर्स’ के काम को देखते हुए, पुणे नगर निगम ने भी उनका समर्थन किया है। 28 दिसंबर 2019 को नगर निगम ने विवेक और उनकी टीम के साथ मिलकर प्लाॉगिंग करने के लिए एक बड़ा इवेंट किया था। इसमें विवेक ने नगर निगम के कर्मचारियों को प्लाॉगिंग के बारे में जागरूक किया। इसके बाद सभी ने मिलकर प्लाॉगिंग ड्राइव की।

विवेक के मुताबिक उनका अंदाज़ा था कि इस इवेंट के लिए कोई 25-30 हज़ार लोग ही आएंगे। लेकिन इस इवेंट में 1 लाख 5 हज़ार लोग शामिल हुए और उन्होंने एक दिन में ही लगभग 36 हज़ार किलोग्राम कचरा इकट्ठा किया। साथ ही, सबकी अच्छी कसरत भी हो गई।

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प्लाॉगिंग ड्राइव्स में जितने भी लोग आते हैं उनके स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जाता है। सभी वॉलंटियर्स को पूरे कपड़े और जूते पहनकर आने की हिदायत दी जाती है। सभी के लिए हाथों के दस्ताने, मास्क और कचरा इकट्ठा करने के लिए बैग, विवेक उपलब्ध कराते हैं। इसके लिए फंडिंग वह ज़्यादातर अपनी जेब से ही करते हैं।

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अच्छी बात यह है कि उनका काम सिर्फ कचरा इकट्ठा करने तक ही सीमित नहीं है। उनका उद्देश्य सही तरीके से कचरा-प्रबंधन है। उनकी टीम कचरे को इकट्ठा करने के बाद अलग-अलग कैटेगरी में बांटती है। बाद में इस कचरे को रिसायकलर्स को पहुँचाया जाता हैं।

जो कचरा रिसायकल नहीं हो सकता जैसे कि कांच की बोतल, उसे वे एक स्वयं सहायता समूह, सारथी को देते हैं। इस समूह से 100 महिलाएँ जुड़ी हुई हैं और ये महिलाएँ कांच की बोतलों से खूबसूरत हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स बनाती हैं। इन प्रोडक्ट्स को बेचकर वे अच्छा मुनाफा कमा रही हैं।

“इस तरह की ड्राइव्स से एक फायदा यह भी हुआ है कि जितने भी लोग हमारे साथ ड्राइव्स के लिए आते हैं, वे अपने घर का रिसायकलेबल कचरा फेंकने की बजाय इकट्ठा करके रिसायक्लिंग के लिए देते हैं। इस तरह से हम लोगों में एक व्यवहारिक बदलाव लाने में भी सफल हुए हैं,” उन्होंने बताया।

अपने इस काम में विवेक और उनकी टीम बहुत से खतरे भी उठा रही है। वह बताते हैं कि हर एक ड्राइव में उन्हें ढेर सारा बायोमेडिकल वेस्ट जैसे सेनेटरी नैपकिन या इस्तेमाल की हुईं सिरींज आदि भी मिलते हैं। यदि वे जरा-सी भी लापरवाही बरतें तो उन्हें इन्फेक्शन हो सकता है।

विवेक कहते हैं कि इस तरह के हालातों के लिए हम सिर्फ सरकार को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं। यह हम नागरिकों की भी ज़िम्मेदारी है कि हम अपने पर्यावरण को स्वस्थ और स्वच्छ रखें। खासकर कि छोटे शहरों में प्रशासन और नागरिक, दोनों के सहयोग की बहुत आवश्यकता है।

“बड़े शहरों में तो फिर भी आपको साधन मिल जाते हैं लेकिन छोटे शहरों में तो एक रिसायकलर ढूँढना भी मुश्किल है। इसलिए ज़रूरी है कि जो लोग कुछ अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें सबका साथ मिले। आगे हमारी कोशिश यही है कि हम अपनी पहल को छोटे शहरों तक लेकर जाएं,” उन्होंने कहा।

साथ ही, एक ज़रूरत यह भी है कि सरकार आगे आकर इन बदलाव करने वालों को सराहे और सम्मानित करे। इससे न सिर्फ इनका हौसला बढ़ेगा बल्कि और भी लोगों को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।

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यदि आपको विवेक गुरव की सोच ने प्रभावित किया है और आप किसी भी तरीके से उनकी मदद करना चाहते हैं तो 9021848315 पर कॉल करें!

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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