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20 साल से खराब ट्यूबलाइट्स को ठीक कर गाँवों को रौशन कर रहा है यह इनोवेटर!

चारी अब तक 10 लाख से भी ज्यादा खराब ट्यूबलाइट ठीक कर चुके हैं!

तेलंगाना के निज़ामाबाद में नवीपेट के रहने वाले 39 वर्षीय नरसिम्हा चारी को बचपन से ही विज्ञान और तकनीक में काफी दिलचस्पी रही। उनके मामा की एक रेडियो रिपेयरिंग की दुकान थी और स्कूल के बाद उनका ज़्यादातर समय वहीं पर बीतता। वह कुछ न कुछ आइडिया सोचते रहते और एक्सपेरिमेंट करते रहते।

उनकी इस रूचि के चलते उन्हें स्कूल में भी काफी सराहना और प्रोत्साहन मिलता था। द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया, “मुझे स्कूल में मेरे साइंस प्रोजेक्ट्स के लिए कई बार सम्मान भी मिला। मेरी रूचि साइंस में देखकर मेरे घरवालों ने भी मुझे हमेशा आगे बढ़ने का हौसला दिया। मुझे कोई किताब चाहिए होती, लाइब्रेरी जाना होता, हर चीज़ के लिए घरवालों और स्कूल के शिक्षकों से मदद मिलती थी।”

चारी शायद 8वीं कक्षा में रहे होंगे जब एक बार उन्हें उनकी माँ ने किसी काम से पंचायत ऑफिस भेजा। वहां पर उन्होंने एक कमरे में बहुत सारी ट्यूबलाइट्स देखी जो खराब पड़ी थीं। उन ट्यूबलाइट्स को देखकर उनके मन में विचार आया कि इन्हें ठीक करके पूरे गाँव में बांटा जा सकता है।

उन्होंने बहुत उत्सुकता से  इस बारे में पंचायत ऑफिस में बात की, लेकिन उन्हें सबने टाल दिया। उनसे कहा कि इन्हें ठीक कराने का खर्च बहुत ज्यादा है। पंचायत ऑफिस के लोगों की अनदेखी ने चारी के मन में कुछ करने की प्रेरणा को जन्म दिया। उन्होंने ठान लिया कि वे ऐसा कुछ बनाएंगे कि इन ट्यूबलाइट्स को सस्ते में ठीक किया जा सके।

इसके बाद उन्होंने अलग-अलग साधनों से ट्यूबलाइट्स के बारे में पढ़ना शुरू किया। उन्होंने ट्यूबलाइट बनाने से लेकर, वह खराब कैसे होती है और किन-किन तरीकों से इन्हें ठीक किया जाए, इस सबके बारे में पढ़ा। वह बताते हैं कि उन्होंने अपने गाँव की लाइब्रेरी में हर उस किताब को पढ़ा जिसमें ट्यूबलाइट्स और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज के बारे में था।

गाँव की लाइब्रेरी के अलावा उन्होंने जिले की लाइब्रेरी में कुछ समय बिताया। चारी बताते हैं, “स्कूल के दिनों में मेरे एक्सपेरिमेंट्स का सफ़र शुरू हुआ था और स्कूल के बाद मैं अपने एक्सपेरिमेंट पर पूरा फोकस रखूं, इसलिए मैंने  ठान लिया कि मैं डिस्टेंस से पढ़ाई करूंगा। आखिरकार, साल 2000 में मेरा एक्सपेरिमेंट सफल हुआ,” उन्होंने कहा।

7-8 साल के संघर्ष के बाद उनका एक्सपेरिमेंट सफल हुआ। वह बताते हैं,

“ट्यूबलाइट के अंदर के फिलामेंट जब खुल जाते हैं, तब वह खराब हो जाती है, क्योंकि इसकी ज़रूरी वोल्टेज उत्पन्न करने की क्षमता खत्म हो जाती है। लेकिन इस ख़राब ट्यूबलाइट में भी लगभग 5 मिलीग्राम मरकरी बचा हुआ होता है। इसलिए मैंने रेसिस्टर, कैपासिटर, निक्रोम स्प्रिंग आदि का इस्तेमाल करके एक इंटीग्रेटेड सर्किट बनाया, जो इस बचे हुए मरकरी का इस्तेमाल करके इलेक्ट्रिसिटी बना पाए। इस प्रक्रिया के लिए आपको किसी इंडक्शन कॉइल, चोक या स्टार्टर की ज़रूरत नहीं है।”

चारी के इस एक्सपेरिमेंट को आज ‘चारी फार्मूला’ के नाम से जाना जाता है और उन्हें इसका पेटेंट भी प्राप्त है। उनके फार्मूला की ख़ास बात यह है कि इससे न सिर्फ ट्यूबलाइट ठीक होती है बल्कि बिजली की खपत भी कम हो जाती है। साथ ही, ट्यूबलाइट की लाइफ और 3-4 साल बढ़ जाती है और इसे कोई खास रख-रखाव की भी ज़रूरत नहीं होती। उनके इस इनोवेशन की कीमत मात्र 99 रुपये है।

उनका इनोवेशन खराब ट्यूबलाइट्स को ठीक करके पैसे और ऊर्जा की बचत तो कर ही रहा है साथ ही, यह पर्यावरण को भी बहुत बड़े खतरे से बचा रहा है। वह बताते हैं कि ट्यूबलाइट के खराब होने से भी ज्यादा हानिकारक इसका लैंडफिल या फिर पानी के स्त्रोतों में जाना है।

“ट्यूबलाइट्स में मरकरी होता है, जो कि हमारे प्राकृतिक संसाधन जैसे कि पानी, हवा और मिट्टी, सभी के लिए हानिकारक है। अगर एक खराब ट्यूबलाइट भी गलती से टूट जाए तो यह 22,712 लीटर पानी को प्रदूषित कर सकती है। सिर्फ पानी ही नहीं बल्कि यह हवा और मिट्टी के लिए भी बहुत खतरनाक है,” उन्होंने कहा।

लेकिन चारी के फार्मूला से ट्यूबलाइट के ठीक होने के साथ-साथ मरकरी भी पूरी तरह से इस्तेमाल हो जाता है। जिसके बाद ट्यूबलाइट को डिस्पोज करना आसान होता है।

नरसिम्हा चारी के इस एक्सपेरिमेंट की खबर सबसे पहले एक तेलुगु मैगज़ीन, इनाडू में छपी थी। इस एक खबर के बाद उनके नाम लगभग साढ़े 5 लाख पत्र आये। वह बताते हैं कि साल 2000 के फरवरी महीने में उनके बारे में छपा था और उसी साल, मार्च के पहले हफ्ते में उनके घर ढ़ेरों पत्र आए।

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सभी में उनके लिए बधाई और सराहना की बात थी, लेकिन एक पत्र जो आज तक उनके जहन में ज्यों का त्यों है, वह आया था काकीनाडा से।

“जिसने मुझे वह पोस्ट कार्ड लिखा उसकी उम्र शायद 50 के लगभग रही होगी। उसने लिखा था कि वह छोटा-मोटा मैकेनिक का काम करता है और उसकी कमाई इतनी कम है कि वह अपने घर का खर्च भी नहीं चला पा रहा। इसलिए उसने अपने परिवार के साथ मिलकर जान देने की ठानी थी लेकिन मेरी कहानी पढ़कर उसे एक उम्मीद मिली। उसने मुझसे पूछा था कि अगर मैं उसे अपना फार्मूला इस्तेमाल करने की इजाजत दे दूँ तो शायद वह आमदनी कर पाए,” उन्होंने बताया।

चारी कहते हैं कि उनकी आँखों में पत्र पढ़ते समय आंसू आने लगे थे। उन्होंने अपना हर काम छोड़कर सबसे पहले उस आदमी को जवाब लिखा और उसे बिना किसी संकोच के अपना फार्मूला इस्तेमाल करने की अनुमति दी।

इस सबके दौरान चारी को विजय रूरल इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने का मौका मिला। उन्होंने लगभग 5 साल तक यहाँ पर पढ़ाया। वह बताते हैं कि उन्हें 2005 में ‘यंग साइंटिस्ट’ नाम के एक इवेंट में जाने का मौका मिला। इस इवेंट में आंध्र-प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री भी आए थे, जिन्होंने उस समय घर-घर में सीएफएल(CFL) बल्ब देने की योजना का एलान किया था।

मुख्यमंत्रीजी को जब इवेंट में चारी के इनोवेशन का पता चला तो उन्होंने निज़ामाबाद के नगर निगम विभाग में उन्हें प्रोजेक्ट अफसर बनाया। उन्हें ज़िम्मेदारी दी गयी कि नगर निगम द्वारा इकट्ठी की गयी खराब ट्यूबलाइट्स को वह ठीक करें।

चारी बताते हैं कि उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर सिर्फ 9 महीने में कई लाख ट्यूबलाइट ठीक किये और नगर निगम के 12 लाख 45 हज़ार रुपये की बचत करवाई। उनके इस प्रोजेक्ट को ‘बिजली बचाने और पैसा बचाने’ के लिए बेस्ट प्रोजेक्ट का ख़िताब मिला।

इसके बाद, जिला पंचायत अफसर ने उन्हें 1200 गाँवों का प्रोजेक्ट दिया। “जब वह मेरे पास आये तो मैंने बिना कुछ सोचे हाँ कर दी और उन्हें कहा कि मैं यह काम नवीपेट से ही करूँगा क्योंकि वहीं से मेरे मन में इस इनोवेशन के बीज पड़े थे। मैंने अपने गाँव की 36 महिलाओं को ट्रेनिंग दी और उन्हें अपनी टीम में लिया। हमारा यह प्रोजेक्ट भी बहुत सफल रहा,” उन्होंने बताया।

इन 1200 गाँवों के प्रोजेक्ट के बाद, हैदराबाद के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ रूरल डेवलपमेंट ने उन्हें पूरे भारत में अपनी इस पहल को पहुँचाने का काम सौंपा। अब तक चारी 10 लाख से भी ज्यादा खराब ट्यूबलाइट्स को सही कर चुके हैं और आगे भी उनकी यह कवायद जारी है।

इसके अलावा, उनके इस काम से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 800 लोगों को रोज़गार मिला रहा है। उनके एक इनोवेशन का प्रभाव इतना अधिक है कि सीमन्स कंपनी ने उनके इस इनोवेशन को अपने ‘ग्रेट माइंडस, लॉन्ग माइल्स’ प्रोग्राम का हिस्सा बनाया और ऊर्जा के क्षेत्र में उन्हें बेस्ट इनोवेशन का अवॉर्ड मिला।

इससे पहले भी उन्हें राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से सम्मानों और खिताबों से नवाज़ा गया है। चारी कहते हैं कि बहुत सी कंपनियों ने उनसे उनका पेटेंट खरीदने की कोशिश की है। “पर मेरा उद्देश्य लोगों के लिए कुछ करना है। मुझे पैसा कभी से नहीं कमाना था। मेरा सपना हमेशा से अपने लोगों के लिए कुछ करने का था। मुझे ख़ुशी है कि मैं कर पाया और आगे भी कर रहा हूँ,” उन्होंने अंत में कहा।

नरसिम्हा चारी का इनोवेशन आम नागरिकों और देश हित में है और हमें उम्मीद है कि उनका इनोवेशन भारत के हर गाँव- शहर में बदलाव ला सके। यदि आप नरसिम्हा चारी से सम्पर्क करना चाहते हैं तो +91-9550376767 पर कॉल करें या फिर mnchary1122@gmail.com पर ईमेल करें!

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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