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3×6 फीट बालकनी में उगाया फ़ूड फोरेस्ट, खुद अपना खाना उगा रही हैं यह मुम्बईकर!

सरस्वती की बालकनी में 130 से भी ज्यादा पेड़-पौधे हैं, जिनमें हरी पत्तेदार सब्जियां, बैंगन, टमाटर, हर्ब्स और ड्रैगन फ्रूट आदि शामिल हैं!

क्या हम सबको अपना खाना खुद उगाना चाहिए?

यह सवाल सरस्वती कुवलेकर के मन में तब आया जब व अपनी एक दोस्त के बेटे से मिलने के लिए अस्पताल गयीं। सरस्वती दूरदर्शन में न्यूज़ (IIS) विभाग की डिप्टी डायरेक्टर हैं!

“वह सिर्फ 28 साल का था और उसे कैंसर डिटेक्ट हुआ था। मैंने इस बारे में पढ़ना शुरू किया तो मुझे पता चला कि 30 साल से कम की उम्र के लोगों को यह बीमारी होने के ज्यादा चांस हैं। जेनेटिक्स और हमारा वातावरण तो ज़रूरी फैक्टर है हीं, लेकिन हम जो खाना खाते हैं वह भी उतना ही ज़रूरी है। अपने बच्चों को हर चीज़ बेस्ट देने का क्या फायदा, जब हम उन्हें केमिकल से मुक्त खाना ही नहीं दे सकते,” सरस्वती ने बताया।

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खाने-पीने के बारे में यह फैक्ट्स पता चलने पर सरस्वती ने अपने बागवानी के शौक से अपने परिवार की ज़िन्दगी में कुछ बदलाव लाने का फैसला किया। “मुझे सब्ज़ियाँ उगाने के बारे में कुछ नहीं पता था, मुझे बस कुछ बेसिक फूलों को उगाने की जानकारी थी। पर बात मेरे बच्चों और परिवार को अच्छी लाइफस्टाइल देने की थी तो मैं कुछ भी सीखने के लिए अपना वक़्त देने को तैयार थी,” उन्होंने आगे कहा।

इसके बाद एक और घटना हुई, जिसने उन्हें इस राह पर चलने के लिए प्रेरित किया।

“मेरे प्रोफेशन की वजह से में काफी यात्रा करती हूँ। मैंने महाराष्ट्र एक एक गाँव में एक किसान को देखा जो कि पेस्टिसाइड इस्तेमाल करके दूसरों के खाने के लिए फसलें उगाता है। पेस्टिसाइड की आइडियल मात्रा सिर्फ 3 प्रतिशत है जबकि वह 30% इस्तेमाल कर रहा था। वहीं एक दूसरी ज़मीन पर वह फसलें उगाने के लिए जैविक तरीकों का इस्तेमाल कर रहा था- यह खाना उसके अपने परिवार के लिए था।”

Saraswati Kuwalekar

इन घटनाओं से परेशान सरस्वती ने मुंबई यूनिवर्सिटी के एक फार्मिंग कोर्स के लिए अप्लाई किया और यहाँ पर उन्हें ऑर्गेनिक फार्मिंग और गार्डनिंग एक्सपर्ट, राजेंद्र बहत और नंदन कलबाग से मिलने का मौका मिला।

“मुझे कलबाग ने पौधों की ज़रूरतों के बारे में समझाया और भट ने जैविक खेती के गुर सिखाये। मैंने बहुत से ट्रायल और एरर वाले एक्सपेरिमेंट किये और फिर आखिरकार, मैं अपने केमिकल फ्री अर्बन किचन गार्डन मेथड में कामयाब रही,” उन्होंने कहा।

बालकनी में मिनी फारेस्ट:

उनके घर में तीन बालकनी है पर सरस्वती का गार्डन सबसे छोटी बालकनी में है। क्योंकि यहाँ धूप और हवा सही से आती हैं।

“मिट्टी से पौधों को सिर्फ 1.5% पोषण मिलता है बाकी सब सूरज की रौशनी से मिलता है। 3×6 फीट की बालकनी में सब्ज़ियाँ उगाना मुश्किल था पर मैंने यह किया। मैंने अपना एक्सपेरिमेंट फ्रेंच बीन, लेटिष और तुर्निप से किया। जितने भी बीज मैंने बोये थे, उनमें से 50% से भी कम कामयाब हुए। और फ्रेंच बीन्स को ग्रो करने में चार साल लगे, सरस्वती ने कहा।

उन्होंने अपने गार्डन ‘ओन ग्रोन’ में किसानी की तीनों तकनीक: मल्चिंग, मल्टी-क्रॉपिंग और माइक्रोफ्लोरा इस्तेमल की ताकि वे अपने छोटे से फारेस्ट को फलता-फूलता रख सकें।

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उन्होंने एक ही गमले में दो-दो, तीन-तीन बीज डाले हुए हैं और वे वर्टीकल गार्डनिंग भी करती हैं। ताकि जगह की दिक्कत ना हो।

“एक ही गमले में 3-4 तरह की फसल बोना फायदेमंद है क्योंकि इससे पेस्ट कंफ्यूज हो जाते हैं कि कौनसा पेड़ खाना है और वे दूर रहते हैं। इतने वक़्त में मैंने मल्टी-क्रॉपिंग के 12 कॉम्बिनेशन बना लिए हैं,” उन्होंने कहा। फिर वे मिट्टी को पत्तियों और टहनियों से ढक देती हैं ताकि मिट्टी में ज़रूरी माइक्रोओर्गनिज्म की एक्टिविटी होती रहे।

इससे खरपतवार भी नहीं लगती और मिट्टी में नमी भी बनी रहती है। माइक्रोफ्लोरा के लिए वह हर तरह के माइक्रोब्स जैसे कि फनजाई, बैक्टीरिया आदि की एक्टिविटी भी पेड़ों पर होने देती हैं।

“मइक्रोफ्लोरा मिट्टी के पोषक तत्वों को पेड़ों के लिए खाने के रूप में बदल देती है। इससे केमिकल इस्तेमाल करने की ज़रूरत नहीं रहती। लेडीबग, टरमाइट, केंचुआ से लेकर कैटेरपिलर्स तक, सभी माइक्रोब्स हमारी बालकनी में हैं। और इनके अलावा, मैं लहसुन पर निर्भर करती हूँ क्योंकि इसकी गंध से पेस्ट नहीं आते हैं,” उन्होंने कहा।

उन्होंने अपनी बालकनी में जिस तरह से इकोसिस्टम बनाया है, उसके चलते उन्हें अपने लगभग 130 पौधों के लिए भी 10 मिनट से ज़्यादा का समय नहीं देना पड़ता। वे पत्तेदार सब्ज़ियां, टमाटर, हर्ब्स, बैंगन, ड्रैगन फ्रूट आदि उगाती हैं।

गार्डनिंग के साथ-साथ, वे अपने किचन वेस्ट से खाद भी बनाती हैं।

अपने ज्ञान और अनुभव को लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने अपनी बेटी, प्राजक्ता के साथ मिलकर एक वेबसाइट और सोशल मीडिया पेज बनाया है।

“समय और जगह की कमी के चलते एक गार्डन को संभालना मुश्किल है लेकिन हम लोगों को प्रेरित करना चाहते हैं कि पेड़-पौधे लगाएं या फिर कम से कम खाद आदि बनाये। अपने पेज पर हम इस बारे में बात करते हैं, अपने तरीके साझा करते हैं और लोगों की समस्याओं का जवाब भी देते हैं,” प्राजक्ता ने बताया।

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मुंबई जैसे शहर में जगह की कमी की वजह से हरियाली दिन-प्रतिदिन कम हो रही है, ऐसे में सरस्वती के गार्डनिंग के तरीके इस समस्या का लॉन्ग-टर्म समाधान हो सकते हैं।

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मूल लेख: गोपी करेलिया

Summary: Saraswati Kuwalekar, the Deputy Director, News (IIS) at Doordarshan once went to visit a friend’s son, who was diagnosed with cancer. After that she realized that one of the major factor contributing to this disease is our food, which is full of chemicals and pesticides. Since then, she is growing her own food in her balcony and giving a healthy lifestyle to her family.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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