ऑफर सिर्फ पाठकों के लिए: पाएं रू. 200 की अतिरिक्त छूट ' द बेटर होम ' पावरफुल नेचुरल क्लीनर्स पे।अभी खरीदें
X
पिता से सीखा ऑर्गेनिक अचार बनाने का गुर, नौकरी छोड़ कर शुरू किया स्टार्टअप!

पिता से सीखा ऑर्गेनिक अचार बनाने का गुर, नौकरी छोड़ कर शुरू किया स्टार्टअप!

आज, उनके फार्म में 13 लोग काम करते हैं जिनमें से 10 महिलाएं हैं और ये सभी न सिर्फ जैविक खेती करना बल्कि अचार बनाना भी जानती हैं।

निहारिका भार्गव के लिए उनके बचपन की सबसे खूबसूरत याद है घर में ताजा संतरों से बनाये गए अचार की खुशबू। वैसे तो ज़्यादातर भारतीय घरों में औरतें अचार आदि बनाने का काम करती हैं, लेकिन निहारिका के यहाँ यह काम उनके पापा करते थे। उनके पापा खुद अपने हाथों से अचार बनाते थे और फिर उसे अच्छे से बोतलों में पैक कर नाते-रिश्तेदारों के यहाँ भिजवाते।

“यह सिर्फ़ स्वाद नहीं था जो उनके अचार को ख़ास बनाता था, बल्कि बात तो उस प्यार और प्रयास की थी जो अचार बनाने में लगता था। अचार के लिए इस्तेमाल होने वाले संतरे हमारे घर के बगीचे में ही उगते थे,” निहारिका ने द बेटर इंडिया को बताया।

26 वर्षीय निहारिका दिल्ली में पली-बढ़ी हैं और उन्होंने लंदन के एक बिज़नेस स्कूल से मार्केटिंग स्ट्रेटेजी एंड इनोवेशन में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है। किसी ने भी नहीं सोचा था कि निहारिका एक अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़कर अपने पापा के शौक को अपना व्यवसाय बना लेंगी।

निहारिका भार्गव

23 साल की उम्र में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और अपना खुद का स्टार्टअप, “द लिटिल फार्म कंपनी” शुरू किया। आज यह स्टार्टअप अचार से लेकर डिप्स, चटनी, सुपरफूड और मुरब्बा आदि बेच रहा है। ये सभी प्रोडक्ट्स ‘पारम्परिक’ रेसिपी से तैयार किये जाते हैं। साथ ही, उनके प्रोडक्ट्स पूरी तरह से ऑर्गेनिक और फार्म फ्रेश हैं। इनमें किसी भी तरह के आर्टिफिशियल प्रेजरवेटिव का इस्तेमाल नहीं होता।

द लिटिल फार्म के ऑर्गेनिक अचार और अन्य प्रोडक्ट्स खरीदने के लिए यहाँ पर क्लिक करें!

इन प्रोडक्ट्स की खास बात यह है कि इन्हें बनाने के लिए सब्ज़ियाँ, फल, तेल और मसाले आदि मध्य-प्रदेश के पहाड़ापूर्वा गाँव में स्थित उनके फार्म में उगाया जाता है। इस फार्म को उनके पिता ने ख़रीदा था। 400 एकड़ के इस फार्म में 100 एकड़ पर खेती होती है। इस फार्म के दो तरफ सरकारी ज़मीन है और तीसरे किनारे पर नदी बहती है, जो कि प्राकृतिक स्त्रोत है पानी का।

यह भी पढ़ें: आपका यह छोटा सा कदम बचा सकता है हमारी झीलों को!

निहारिका ने अपनी नौकरी छोड़ने के बाद सभी चीज़ों पर काम करना शुरू किया, जिसमें रिसर्च और डेवलपमेंट, रेसिपी बनाना, ब्रांडिंग करना और कंपनी का रजिस्ट्रेशन शामिल था। फिर उन्होंने मार्किट को समझने के लिए घर पर बने प्रेजरवेटिव-फ्री अचार के छोटे-छोटे सेट तैयार किए।

Little Farm Co -Mandarin Orange Pickle

“मैं संदेह में थी कि अचार काम करेगा या नहीं। क्योंकि ज़्यादातर भारतीय घरों में अचार बनाने की परम्परा है। लेकिन मार्केट रिसर्च से पता चला कि टियर 1 और 2 शहरों में लोगों को भले ही घर पर बना अचार खाना पसंद है पर उनके पास इसे बनाने का वक़्त नहीं होता है। साथ ही बाज़ार में भी जो अचार उपलब्ध है उनमें आर्टिफिशियल प्रेजरवेटिव और एडीटिव्स की मात्रा बहुत अधिक होती है, जिससे उनकी शेल्फ-लाइफ कम हो जाती है और साथ ही, स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। जब मैं और मेरे पापा अपने प्रोडक्ट्स के साथ एक प्रदर्शनी में गए और वहां स्टॉल लगाया तो लोगों की प्रतिक्रिया बहुत अच्छी थी। क्योंकि सभी लोग ऐसा कुछ चाहते हैं जो कि आर्टिफिशियल प्रेजरवेटिव से मुक्त हो। हमारा स्टॉक कभी भी नहीं बचा और इससे हमारा आत्म-विश्वास काफी बढ़ा है,” निहारिका ने बताया।

उन्हें पता था कि उन्हें इस काम के लिए दिल्ली और पहाड़ापूर्वा की बार-बार यात्रा करनी पड़ेगी, इसलिए उन्होंने अपनी ड्रीम टीम बनाना शुरू किया, जिसमें ज़्यादातर महिलाएं हैं।

यह भी पढ़ें: इस 50 रुपये के डिवाइस से घर में बचा सकते हैं 80% तक पानी!

उन्होंने सामाजिक संगठन, आशा के साथ टाई-अप किया। आशा ने उन्हें ऐसी महिलाओं से मिलवाया जिन्हें रोज़गार की तलाश थी और उनमें यह काम करने का कौशल भी था।

फार्म में उनकी टीम

आज, उनके फार्म में 13 लोग काम करते हैं जिनमें से 10 महिलाएं हैं और ये सभी न सिर्फ जैविक खेती करना बल्कि अचार बनाना भी जानती हैं। उनके सबसे ज़्यादा बिकने वाले प्रोडक्ट्स में से एक जैलेपनो गार्लिक डिप की रेसिपी इन्हीं औरतों में से एक बुजुर्ग महिला, चम्पा ने बनाई हैं। चम्पा के दोनों पैर भले ही एक दुर्घटना में कट चुके हो पर ज़िन्दगी जीने का उनका जज़्बा कभी कम नहीं हुआ है।

वे बताती हैं,

“हमारे सभी प्रोडक्ट्स फार्म में ही हाथों से बनाए जाते हैं पर पैकेजिंग यूनिट गुरुग्राम में है। हम प्रोडक्ट्स की ज़रूरत की ज़्यादातर सभी चीज़ें अपने फार्म में ही उगाते हैं। कुछ चीज़ें जो हम नहीं उगा सकते, ऑर्गेनिक सप्लायर्स से मंगवा ली जाती हैं।”

उनकी यूएसपी

“हम अपने सभी प्रोडक्ट्स के लिए प्राकृतिक प्रेजरवेटिव के अलग-अलग कॉम्बो का उपयोग करते हैं। हम कोई आर्टिफिशियल मिठास नहीं डालते। हम चीनी के लिए खांड और गुड़ का पाउडर इस्तेमाल करते हैं। हमारे अचार में कोई सिंथेटिक सिरका या सफेद नमक नहीं है। हम गन्ने के सिरके, ताज़े कोल्ड-प्रेस्ड सरसों या तिल के तेल और सेंधा नमक का इस्तेमाल करते हैं, “निहारिका ने कहा।

उनके यहां फलों और सब्जियों को प्राकृतिक रूप से पकने दिया जाता है और अचार बनाने की प्रक्रिया शुरू होने के दो घंटे पहले ही उन्हें तोड़ा जाता है। सूखाने के लिए भी मशीन की बजाय उन्हें धूप में सूखाया जाता है।

मिक्सर-ग्राइंडर के अलावा, महिलाएं प्रोडक्शन यूनिट में किसी भी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट का इस्तेमाल नहीं करती हैं। लेकिन जैसे-जैसे उनका काम बढ़ रहा है, वे सब्जी-फल को काटने आदि के काम के लिए मशीन लाने की सोच रही हैं।

द लिटिल फार्म के ऑर्गेनिक अचार और अन्य प्रोडक्ट्स खरीदने के लिए यहाँ पर क्लिक करें!

यह उनके गुणवत्ता से भरपूर खाद्य सामग्री का कमाल है कि अब निहारिका सिर्फ अपने तैयार उत्पाद जैसे कि अचार से ही नहीं बल्कि कच्चे पदार्थ जैसे कि ट्रेल मिक्स, कद्दू के बीज, चिया बीज, सन बीज, सूरजमुखी के बीज, मसाले, गन्ने का सिरका और तेल आदि से भी अपना व्यवसाय आगे बढ़ा रही हैं।

पर सभी प्रोडक्ट्स ऑर्गेनिक हैं तो उनके स्लेफ़ लाइफ बहुत कम होगी?

“हम प्राकृतिक प्रेजरवेटिव इस्तेमाल करते हैं और इससे अचार खराब नहीं होता है। लेकिन ऑयल-फ्री प्रोडक्ट्स की सेल्फ-लाइफ कम होती है। हमारे सभी बोतल पर दिशा-निर्देश लिखे होते हैं कि गीली चम्मच का इस्तेमाल न करें और पानी से दूर रखें,” उन्होंने कहा।

फ़िलहाल वे 70 प्रोडक्ट्स बेच रहे हैं और जो कम्पनी 3 लाख रुपए से शुरू हुई थी और वह आज 7 लाख रुपए का सालाना टर्नओवर कमा रही है।

इस कंपनी के साथ काम करने वाली सभी महिलाएं अपने गाँव में परम्पराओं को बदल रही हैं क्योंकि यह बहुत ही कम होता है कि घूँघट रखने वाली महिलाएं काम करे। पिछले तीन साल से यहां काम कर रही 40 वर्षीया श्याम बाई बताती हैं कि वे इस फार्म पर काम करके उन्हें बहुत ख़ुशी मिलती है क्योंकि अब वे किसी और पर निर्भर नहीं हैं।

यशोदा

तो वहीं 35 वर्षीया यशोदा, जो अपनी बेटियों के साथ यहां काम कर रही हैं, कहती हैं कि अब वे और उनकी बेटियां अच्छी ज़िन्दगी जी सकते हैं। क्योंकि यहां काम करने से उनका घर चल रहा है, दो वक़्त का खाना मिल रहा है और बच्चे स्कूल भी जा पा रहे हैं। इससे ज़्यादा उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए।

इसी तरह एक और कर्मचारी, बालकुमारी दो साल से काम कर रही हैं। वे कहती हैं, ” मेरे पति एक किसान हैं और दिन-रात मेहनत करते हैं। यहां काम करके मैं उनका कुछ बोझ तो कम कर ही सकती हूँ।”

यह भी पढ़ें: बैग भी डेस्क भी! IIT ग्रेजुएट के इनोवेशन से एक लाख गरीब बच्चों को झुककर बैठने से मिली राहत!

निहारिका अंत में सभी महिला उद्यमियों के लिए सिर्फ एक ही सन्देश देती हैं, “मैं अक्सर ऐसी बहुत-सी महिलाओं से मिलती हूँ जिनके पास स्टार्टअप के लिए अच्छे आइडियाज हैं पर फिर उनके पास बीसों बहाने हैं कि उनके आईडिया क्यों नहीं चलेंगे। लेकिन आपको तब तक पता नहीं चलेगा जब तक कि आप शुरुआत न करें। जब आप अपनी मार्केट रिसर्च करके काम शुरू करते हैं तो आपको 99 वजह मिल जाएंगी कि यह क्यों चलेगा। आपको सिर्फ एक कोशिश करनी है। अगर आपके पास कोई आईडिया है तो उस पर काम करना शुरू करो।”

लिटिल फार्म कंपनी के प्रोडक्ट्स खरीदने के लिए यहां क्लिक करें!

संपादन – भगवती लाल तेली
मूल लेख: जोविटा अरान्हा 


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है, या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें, या Facebook और Twitter पर संपर्क करें। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर व्हाट्सएप कर सकते हैं।

निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.
Let’s be friends :)
सब्सक्राइब करिए और पाइए ये मुफ्त उपहार
  • देश भर से जुड़ी अच्छी ख़बरें सीधे आपके ईमेल में
  • देश में हो रहे अच्छे बदलावों की खबर सबसे पहले आप तक पहुंचेगी
  • जुड़िए उन हज़ारों भारतीयों से, जो रख रहे हैं बदलाव की नींव