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बैग भी डेस्क भी! IIT ग्रेजुएट के इनोवेशन से एक लाख गरीब बच्चों को झुककर बैठने से मिली राहत!

कई संगठन अपने सीएसआर के तहत यह डेस्किट खरीदकर ज़रूरतमंद छात्र-छात्राओं तक पहुंचा रहे हैं। इससे अब तक करीब 1 लाख बच्चों को यह डेस्किट मुफ़्त में बांटी जा चुकी हैं।

देश के अधिकतर सरकारी स्कूलों की हालत आज भी खस्ताहाल है। जर्जर हो चुकी दीवारें मुश्किल से इमारत का बोझ उठा पाती हैं तो वहीं बारिश के मौसम में टपकती छत बहुत बार परेशानी का सबब बन जाती है। इन स्कूलों में शौचालय होना तो जैसे ‘लक्ज़री’ की बात है। ऐसे ही कुछ स्कूलों में छात्रों के बैठने के लिए बेंच व डेस्क तक नहीं होती। बच्चे ज़मीन पर एक पतले से कालीन पर बैठते हैं और किताबों के ऊपर पूरा झुक कर पढ़ते और लिखते हैं। यह नज़ारा आपको ग्रामीण इलाके के साथ-साथ शहर के भी बहुत-से स्कूलों में देखने को मिल जाएगा।

अपनी आँखों को किताबों के एकदम पास ले जाकर पढ़ने से ये बच्चे अपनी आँखे और पीठ, दोनों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इन मासूम बच्चों को इस पोजीशन में 6 घंटे से भी ज़्यादा समय तक बैठकर पढ़ना पड़ता है। मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस तरह की गलत मुद्रा (पोस्चर) में बैठने पर बच्चों को साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं और कुबड़ा (हंचबैक) इनमें से एक है। ये बच्चे शुरू से ही इस तरह की आदतों में ढल जाते हैं और फिर ये आदतें उनके पूरे जीवन को प्रभावित करती हैं।

छात्र इस तरह इन स्कूलों में बैठते हैं (साभार: इशान सदाशिवन)

लेकिन इन बच्चों की परेशानी को समझा IIT कानपुर से पासआउट छात्र इशान सदाशिवन ने। इशान ने कम लागत में हल्के वजन की, पोर्टेबल और फ्लेक्सिबल बैग कम डेस्क बनाई है जिसे बच्चे बैग और डेस्क, दोनों ही रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए इशान ने बताया, “IIT कानपुर में एक प्रोग्राम के तहत हम कैंपस के आस-पास के इलाके के गरीब तबके के करीब 30 बच्चों को पढ़ाते थे। हर रोज़ पूरे उत्साह के साथ हमारे पास आने वाले इन बच्चों को हम अंग्रेजी और गणित सिखाते थे। लेकिन हमारे पास इन बच्चों को बिठाने के लिए कोई व्यवस्थित कक्षा, डेस्क या फिर बेंच जैसा इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था। ऐसे में ये बच्चे ज़मीन पर हंचबैक स्टाइल में बैठते थे। मुझे समझने में बिल्कुल भी वक़्त नहीं लगा कि इन बच्चों के लिए ऐसे बैठना कितना हानिकारक हो सकता है।”

इशान ने स्कूल में बच्चों की यह हालत सिर्फ़ कानपुर में ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों में भी देखी। उन्होंने अपने करियर में कई जगह शिक्षा से संबंधित प्रोजेक्ट्स पर काम किया और इस दौरान न सिर्फ़ शहरों के बल्कि गांवों के भी दौरे किए। यहाँ भी उन्होंने यह समस्या देखी।

इशान सदाशिवन

फिर उन्होंने ऐसी डेस्क डिजाईन करना शुरू किया जिसे छात्र खुद स्कूल ले जाए। उसे बैग और डेस्क दोनों तरह से उपयोग कर सके। इस प्रोजेक्ट को उन्होंने अपने सोशल एंटरप्राइज PROSOC इनोवेटर्स के तहत किया। जिसका अर्थ है प्रोडक्ट फ़ॉर सोसाइटी यानी समाज के लिए उत्पाद!

“हम पहली बार में ही इस डिजाईन को बनाने में कामयाब नहीं हुए। हमने 40 एक्सपेरिमेंट किए। ज़्यादातर फेल हुए और हमें सीखने को मिला कि और क्या बेहतर कर सकते हैं। डेस्क के लिए प्लाइवुड फाइनल करने से पहले हमने और भी कई मैटेरियल जैसे मेटल, लकड़ी और फैब्रिक आदि ट्राई किये थे। इसके बेस के लिए हल्की स्टील की ट्यूब और बैग के लिए वॉटरप्रूफ मैटेरियल का इस्तेमाल कर बैग तैयार किया। हालाँकि बैग का वजन 1 किलोग्राम है। स्टील की जगह एल्युमिनियम को इस्तेमाल किया जाए तो बैग का वजन और भी कम हो जाएगा। लेकिन इससे बैग की कीमत बढ़ जाएगी और फिर गरीब बच्चों की मदद करने का जो उद्देश्य है वह पूरा नहीं होगा।” इशान ने बताया।

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इशान ने आखिरकार ऐसी डेस्क बनाने में कामयाबी हासिल की थी जो बैग और डेस्क दोनों के रूप में काम आ सकती थी। इसका नाम उन्होंने डेस्किट रखा। इसे बनाने के लिए उन्होंने कई डॉक्टर्स व एक्सपर्ट्स से सलाह ली। वे इसका श्रेय IIT कानपुर के डिजाईन प्रोग्राम, स्टार्टअप इन्क्यूबेशन एंड इनोवेशन सेंटर और इन्वेंट सोशल इन्क्यूबेशन प्रोग्राम को देते हैं।

साभार: इशान सदाशिवन

डेस्किट यानी एक ऐसा स्कूल बैग है जिसे स्टडी टेबल में भी बदला जा सकता है। इसकी ऊँचाई इस तरह से रखी गई की बच्चे ज़मीन पर बैठकर भी इसे आराम से इस्तेमाल कर सकते हैं। इशान का यह इनोवेशन दो सामाजिक समस्याओं का हल देता है। एक, यह बच्चों के बैठने के पोस्चर को ठीक करने के साथ ही बच्चों की आँखों को ख़राब होने से रोकता है। दूसरा, इस डेस्क कम बैग को बनाने का खर्च उन स्कूलों को उठाने की ज़रूरत नही है जो पहले ही फंड्स की कमी से जूझ रहे हैं।

करीब एक लाख बच्चों तक फ्री में पहुंची डेस्किट

इशान ने डेस्किट को कमर्शियल बिक्री के लिए भी बाज़ार में उतारा है। अब कई संगठन अपने सीएसआर के तहत यह डेस्किट खरीदकर ज़रूरतमंद छात्र-छात्राओं तक पहुंचा रहे हैं। इससे अब तक करीब 1 लाख बच्चों को यह डेस्किट मुफ़्त में बांटी जा चुकी हैं।

इशान कहते हैं कि “मैं ऐसे सैकड़ों छात्रों से मिला हूँ जो कि डेस्किट इस्तेमाल कर रहे हैं। PROSOC में हम उनका फीडबैक चाहते हैं। हमें डेस्किट को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। बच्चे, शिक्षक, अभिभावक इस डेस्किट को पसंद कर रहे हैं। उनका कहना है कि कस्टमाइज्ड डेस्क की वजह से स्कूल जाना मजेदार हो गया है। अब बच्चे अपनी पीठ को बहुत थकाए बिना आराम से पढ़ सकते हैं और इससे स्कूल में बच्चों का तनाव बहुत कम हो गया है। हमें ख़ुशी है कि इसका सकारात्मक नतीजा आया।”

अब बच्चों को बैठने में कोई परेशानी नहीं है (साभार: इशान सदाशिवन)

इशान के अनुसार इन छोटी-छोटी बातों का भी बच्चों के जीवन पर गहरा और लंबा प्रभाव पड़ सकता है। एक साधारण से इनोवेशन से, डेस्किट आज बच्चों के बहुत से मुद्दों का हल बन रही है और वह भी बहुत ही कम कीमत पर।

इस एक डेस्क-बैग की कीमत 500 रुपए से 550 रुपए के बीच है। यदि आप यह डेस्क कम बैग खरीदना चाहते हैं तो यहाँ पर क्लिक करें!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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