त्रिशूर की रहनेवाली 26 वर्षीया अंसिया के ए, होममेड नेचुरल चीज़ों से 38 से ज्यादा स्किन केयर प्रोडक्ट्स बनाती हैं। पढ़ें, कैसे माँ की सीख बनी इस बिज़नेस का आधार।
सोनभद्र की बिफन देवी खुद के साथ, दूसरों का पेट भरने में विश्वास रखती हैं। तभी तो पिछले कई सालों से वह अपने साथ साथ, खुद के खर्च पर कई गरीबों को भी खाना खिलाती आ रही हैं।
बिहार के बेगूसराय की रहनेवाली सिन्नी सोश्या, पटना में एक आर्ट स्टूडियो चलाती हैं और इसके जरिए 15 और लोगों को रोजगार भी दिया है। कभी डॉक्टर बनने का सपना देखनेवाली सिन्नी ने अपने हुनर को ही अपनी पहचान बना ली है।
लखनऊ में रहनेवाले रेलवे अधिकारी राजीव कुमार को गार्डनिंग से इतना प्यार है कि आज तक वह जहां भी रहें, वहां ढेरों पौधे लगाते रहें। उन्होंने अपना गार्डन लैंडस्केपिंग करके इतना सुन्दर सजाया है कि उन्हें इसके लिए हमेशा अवॉर्ड भी मिलते रहते हैं।
सांगली, महाराष्ट्र के 44 वर्षीय अशोक आवती ने पढ़ाई भले ज्यादा न की हो, लेकिन दिमाग किसी इंजीनियर से कम नहीं। हाल ही में, उन्होंने अपने परिवार के लिए कबाड़ से एक जुगाड़ू कार बनाई है, जो दिखने में फोर्ड कंपनी के 1930 मॉडल जैसी है।
लखनऊ के गोसाईगंज के पास एक छोटे से गांव माढरमऊ की सोनाली साहू बचपन से ही पढ़ाई में अच्छी रही हैं। उनकी लगन और कुछ बनने की इच्छा को देखकर उनके स्कूल की प्रिंसिपल ने उनका साथ देने का फैसला किया। स्कूल प्रिंसिपल की छोटी सी मदद से सोनाली आज बड़े सपने भी देख पा रही हैं।
78 वर्षीया राधा डागा, ‘त्रिगुणी ईज़ ईट्स’ नाम से पैकेज्ड फ़ूड कंपनी चलाती हैं। तक़रीबन 10 साल पहले रिटायरमेंट की उम्र में उन्होंने अपने खाना बनाने के शौक के कारण इस बिज़नेस की शुरुआत की थी।
साल 2016 से राजकोट के उपलेटा तालुका की किरण पिठिया, अपने पति रमेश पिठिया के साथ मिलकर, गरीब और बेसहारा मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए एक विशेष संस्था चला रही हैं, जहां इन बच्चों की मुफ्त में सेवा की जाती है।