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मनोज बाजपेयी के गर्दिश के दिनों की साथी : रश्मिरथी!

गर्दिश के दिनों में ताकत कहाँ से आती है भला? जवाब में अमूमन लोग कहते हैं भगवान से, इश्क़ से, नशे से......लेकिन मनोज बाजपेयी कहते हैं 'रश्मिरथी' से! 

र्दिश के दिनों में ताकत कहाँ से आती है भला?
जवाब में अमूमन लोग कहते हैं भगवान से, इश्क़ से, नशे से……लेकिन मनोज बाजपेयी (Manoj Bajpayee) कहते हैं ‘रश्मिरथी’ से! 

“यह मेरे संघर्ष के दिनों का सबसे बड़ा सहारा थी, और आज भी कभी जब मैं अवसादग्रस्त होता हूँ तो ज़ोर ज़ोर से तृतीय सर्ग का पाठ करता हूँ!”

– मनोज बाजपेयी 

चप्पल घिसने वाले संघर्ष के दिन!

अभिनेता बनने की जद्दोजहद में जुटे सभी लोगों की ज़िन्दगी का ये एक ज़रूरी पड़ाव होता है। ये काले, अनिश्चितता के अस्त-व्यस्त दिन !

जब चारों तरफ़ से इंकार और रिजेक्शन की आवाज़ें आती हैं! कितनी ही बार अपने आप से विश्वास उठ जाता है! अपनी साल-दर-साल गढ़ी प्रतिभा बेमानी और बेगुण प्रतीत होती है। हर तरफ़ से सलाहें बरसती हैं कि ‘भाई, देखो कुछ नहीं होने वाला तुम्हारा यहाँ पर, लौट जाओ!’

विरले ही इससे आगे निकल पाते हैं, अधिकतर अपने सपनों-वपनों को तिलांजलि दे, पप्पा के व्यवसाय में मदद करने वापस चले जाते हैं।

ऐसे दौर में इस बिहारी लड़के की साथी थी रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कृत खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’!

वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पाण्डव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
 देखें, आगे क्या होता है..

द्रौपदी समेत पाँचों पाण्डव अज्ञातवास से लौट कर आ चुके हैं। अब दुर्योधन से अपेक्षा है कि कौरव आधा राज्य इनके नाम कर दें। लेकिन दुर्योधन ने कटु शब्दों में इंकार कर दिया; कहा कि आधा राज्य तो दूर की बात है, पाँच पाण्डवों को पाँच ग्राम (गाँव) भी नहीं दिए जायेंगे। तब पाण्डवों के दूत बन कर कृष्ण दुर्योधन के दरबार में उन्हें समझाने जाते हैं लेकिन वहाँ दुर्योधन के दुर्व्यवहार से क्रोधित हो उठते हैं और अपना विराट स्वरुप दिखलाते हैं। दुर्योधन तब भी टस से मस नहीं होता है और कृष्ण भी क्रुद्ध हो युद्ध की विभीषिका पर चिंतन करते यह कह कर निकल जाते हैं :

हित वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ
अंतिम संकल्प सुनाता हूँ
याचना नहीं, अब रण होगा
जीवन-जय या कि मरण होगा..

हो सके तो इन पंक्तियों को सस्वर पढ़ें। सबसे पहली बात जो आप देखेंगे कि इनमें एक संगीत है, जो आसानी से आपकी ज़ुबान पर चढ़ जाएगा। और फिर आप इसमें एक तीरती ऊर्जा पायेंगे जो रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की रचनाओं को विलक्षण बनाती हैं। आप उनकी कोई भी किताब उठा लें… तरल, संगीतमय, सकारात्मक ऊर्जा विद्युतीय कणों की तरह आपकी रगों में संचारित हो उठती है। मानसिक ही नहीं शारीरिक रूप से भी आप प्रभावित होंगे इनकी लेखनी से।

रश्मिरथी (1952), हिन्दी साहित्य के महानतम ग्रंथों में गिना जाता है। इसमें कर्ण एक गौरवशाली नायक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं।

कई विद्वानों का मानना है कि यह रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की सर्वश्रेष्ठ कृति है।

प्रस्तुत वीडियो में मनोज बाजपेयी इस पुस्तक के तृतीय सर्ग (chapter 3) का एक अंश पढ़ रहे हैं। यह पाठ आपकी अभिप्रेरणाओं को ऊर्जान्वित कर देगा इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। इस बात पर भी ग़ौर करें कि वे दर्शकों के लिए पढ़ते नहीं वरन् अपने आप के संसर्ग में ज़्यादा नज़र आते हैं।


लेखक –  मनीष गुप्ता

फिल्म निर्माता निर्देशक मनीष गुप्ता कई साल विदेश में रहने के बाद भारत केवल हिंदी साहित्य का प्रचार प्रसार करने हेतु लौट आये! आप ने अपने यूट्यूब चैनल ‘हिंदी कविता’ के ज़रिये हिंदी साहित्य को एक नयी पहचान प्रदान की हैं!

Read this story in English here.


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