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    निराला : ध्रुपद : गुंदेचा बंधु : अंतिम प्रणाम

    निराला जी शास्त्रीय रागों पर आधारित कविताएँ लिखा करते थे, उनकी एक कविता पर नज़र डालिए: ताक कमसिनवारि, ताक कम सिनवारि, ताक कम सिन वारि, सिनवारि सिनवारि। ता ककमसि नवारि, ताक कमसि नवारि, ताक कमसिन वारि, कमसिन कमसिनवारि। इरावनि समक कात्, इरावनि सम ककात्, इराव निसम ककात्, सम ककात् सिनवारि।

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    छठ पूजा : संगीत का हुस्न : नास्तिकता

    बहँगी लचकत जाए बहँगी लचकत जाए..   कितने हसीन बिम्ब हैं. कितना हसीन गीत है, आज जो वीडियो हाज़िर-ए-ख़िदमत है उसमें कितनी मोहक आवाज़ और गायकी है. आप अगर छठ पूजा उत्साह से मनाते हैं तो इस गीत को सुन कर श्रद्धा के उल्लास से भर सकते हैं. और अगर

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    पटाखे : पंछी : मिस श्रीवास्तव की लाइटिंग

    फड़ फड़ फड़ फड़ फड़ दो दिन हैं अभी दीवाली को साफ़ आसमान गुलाबी ठण्डक कोई पटाखा नहीं लेकिन मन अभी से दीवाली की शोरीली रात का पंछी हुआ है न पिए चैन न बिन पिए   फड़ फड़   देर तक गूँजती महानगर के शोर में अंदरूनी सन्नाटे की

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    ख़ामोशी की पंखुड़ियाँ !

    1.. जब तितलियाँ सारी रौशनी उड़ा ले जाएँ और तुम्हारी आँखों का उजाला बूँद बूँद टपके मेरे मन को सफ़ेद कर दे गीला कर दे बहुत दिनों तक एक शब्द भी न बोला जाए   2. ज़माना जिनकी सुनता था वो तीन बन्दर थे तीनों मर गए तब से ख़ामोशी

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    वो आदमी कभी औरत था

    पश्चिमी दुनिया में रहने पर एक बात बहुत बाद में समझ आई कि (बहुधा) पुरुष अपने पौरुषत्व और स्त्री अपनी स्त्रियोचित भूमिका के पिंजरे में बंधे होते हैं. हालाँकि ऊपर ऊपर से देखें तो एक पश्चिमी औरत, मर्दों के सारे काम करती हुई नज़र आती है और इधर भारत में

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    अच्छी ख़बरों का ज़माना – एक नृत्य नाटिका

    एक नट और नटनी मंच पर नृत्य करते हुए प्रवेश करते हैं. पार्श्वसंगीत में 'जॉनी मेरा नाम' फ़िल्म का देव आनंद और हेमा मालिनी पर फ़िल्माया प्रसिद्ध गाना बज रहा है: "हीरे से जड़े तेरे नैन बड़े जिस दिन से लड़े नहीं चैन पड़े सुन कर तेरी नहींsss नहीं जाँss

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    Hither hither, Love

    वो डूब रही थी. चमकदार लेकिन कड़वी शाम टेबल पर इतने सारे लोग बने ठने. और इतनी सारी काम की बातें। परिपक्व, ज़िम्मेदार गहरी बातें   वो डूब रही थी उनमें वो भी डूब रहा था बातें तो करता था लेकिन अपने ख़यालों में उतरा रहा कोलेस्ट्रॉल.. घुटने का दर्द

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    उम्मीद के फूल

    एक शाम एक हसीन फूल ने खिड़की खटखटायी बच्चे ने खिड़की का पल्ला खोला गहरी भूरी बिल्लोरी आँखें कौतूहल, दोस्ती, शंका भरे पानी में तैरते कंचे सी आँखें वो देर तक फूल की ओर देखता रहा पहचानने की नाकाम कोशिश   फूल उसे देख मुस्कुराता रहा फिर बच्चे ने गुनगुनाना

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    कला में ब्राह्मणवाद*

    साहित्य में ब्राह्मणवाद है. नकारना चाहें तो नकार दें. लेकिन लेखकों की ज़ातियों में विभाजन इतना है कि हिंदी लेखन ही हाशिए पर दिखता है. मठाधीश, वरिष्ठ, नया, संपादक का प्यारा, महान नेटवर्कर.. शायद ही कोई हिंदी का लेखक हो जो अन्य लेखकों पर जली-कटी टिप्पणी करने की प्रेरणा से बचा

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    ऐ, तुम्हारा पियानो कहाँ है?

    बचपन स्कूल की भागदौड़ में कट गया. फिर प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी का दौर चला. नौकरी मिल भी गयी आख़िरकार. फिर शादी हुई, बच्चे, माँ-बाप की तबीयत, बच्चों की पढ़ाई, छोटे-मोटे शौक़, थोड़ा घूमना फिरना, एक अदद घर बना लिया, थोड़ा इन्वेस्टमेंट कर लिया, बुढ़ापा जैसे-जैसे आता गया स्वास्थ्य की

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    जे डी अंकल का स्केच!

    चेहरे पे टँगी मूँछें हनुमानी प्रयासों की अधजली पूँछें मार्क्सवादी नारों की सीख - यह है कि गरम पानी से गरारे करने चाहिए घर आकर. और यह भी कि झण्डे उठाने हैं अगर तो पहले से ही दर्द की गोली लेकर जाया जाए   कुल जमा बीस तीस किताबों का

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    मदारी!

    सन 1937 में दूध बताशा के अंक में ये कविता छपी थी. इसके रचनाकार थे 'बाबूलाल भार्गव 'कीर्ति''. जल्दी चलो, मदारी आया, संग बहुत सी चीजें लाया। डमरू अब है लगा बजाने, भीड़ जोड़कर खेल जमाने।देखो साँप नेवला कैसे लड़ते, बड़े मल्ल हों जैसे। बिच्छू जैसे काले काले, लिए हाथ

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