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    छठ पूजा : संगीत का हुस्न : नास्तिकता

    आज शनिवार की चाय के साथ आइये हम कुछ सामाजिक, धार्मिक बेड़ियाँ तोड़ें और हमारे देश की सांस्कृतिक समृद्धि के इस फूल की ख़ुशबू का रस लें 🙂 More

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    ख़ामोशी की पंखुड़ियाँ !

    कितनी दफ़ा यूँ होता है कि किसी की ख़ामोशी जानलेवा शोर बन जाती है. इस विषय पर कुछ लघु कविताएँ साझा हैं आज, और साथ ही कटूरा रॉबिंसन (Katurah Robinson) के साथ बनाया गया एक प्रयोगात्मक वीडियो जिसका शीर्षक है ख़ामोशी. आज की शनिवार की चाय ख़ामोशी के साथ आपकी नज़्र 🙂

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    वो आदमी कभी औरत था

    ऐसा हो सकता है कि कोई मन अपने शरीर से सामंजस्य न बैठा पाए. उसे ऐसा लगे कि मैं (मन) हूँ तो स्त्री लेकिन एक पुरुष के शरीर में बेहतर रहता, या इसका उलट कि हूँ तो पुरुष लेकिन मेरा शरीर स्त्री का होना चाहिए था. More

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    अच्छी ख़बरों का ज़माना – एक नृत्य नाटिका

    ‘हम सच्चे हैं – हम अच्छे हैं’ गाते गाते लोग स्टेज से चले जाते हैं. नट कमर पर हाथ रख कर बाँकी नज़र से नटी को देख रहा है. पार्श्व से गाने की आवाज़ धीरे धीरे ज़ोर पकड़ती है.. नटी मुस्कुरा कर नट की बाहों में बाँह डालती है और दोनों मिल कर साथ में गाने लगते हैं.. झूठा ही सही, झूठा ही सही..
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    Hither hither, Love

    आज की शनिवार की चाय अचानक खिल उठने वाले फूलों और अचानक बरस जाने वाले प्यार के नाम. More

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    ऐ, तुम्हारा पियानो कहाँ है?

    यही होता है तो आख़िर ये होता क्यूँ है? जैसे सवाल हैं. मैं यहाँ किसलिए हूँ? मैं कौन हूँ. मेरी ज़िन्दगी का मकसद क्या है? वे खोज में हैं.. वे ऊपर लिखी कहानी की तरह एक कीड़ों-मकोड़ों जैसी, पिंजरे में फंसे पंछी जैसी, असेंबली लाइन की तरह पूर्व-परिभाषित ज़िन्दगी नहीं चाहते. वे सच्ची ख़ुशी चाहते हैं. वे नृत्यरत होना चाहते हैं, वे जीवन का गीत गाना चाहते हैं. इस दुनिया को ऐसे लोग ही सुन्दर बनाते हैं. More

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    मदारी!

    आज शनिवार की चाय के साथ आपको एक एब्स्ट्रैक्ट सी कविता ‘सलमा की लव स्टोरी’ दिखाता हूँ. ये कविता कागज़ पर नहीं हो सकती आपको देखनी ही पड़ेगी. More

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