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    (अ)प्रेम-कविता

    प्रेम भी यूँ तो सच है. लेकिन सबके लिए नहीं. सभी प्रेम के उपभोक्ता हैं. बस उपभोक्ता. प्रेम करके अपनी उड़ान को पंख देना सबके बस की बात नहीं. More

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    26 जनवरी : इतिहास का उपयोग क्या हो?

    इतिहास को समझने के लिए इंसान में विवेक भी हो, वरना जिसका जो जी चाहेगा इतिहास को घुमा फिरा कर अपना उल्लू सीधा करने निकल पड़ेगा। More

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    पचास : साइकिल : प्रेम : शराब : कविता

    पचपन-साठ के आसपास विधवा/ विदुर हुए लोगों की शादी आज 2019 में भी दुर्लभ है. अब जब बच्चों का घर बस चुका है, या बसने वाला है अकेले माँ या बाप की शादी की बात एक पाप की तरह लगती है. माँ के लिए रोया जाता है कि हाय कैसे रहेगी अब बेचारी लेकिन उनका भी नया घर बसे यह नहीं सोचा जाता. More

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    पुरानी गली में एक शाम : इब्ने इंशा

    आज की शनिवार की चाय का मकसद आपके साथ इब्ने इंशा के लिए उमड़े प्यार को साझा करना है. ‘मीठी बातें – सुन्दर लोगों’ में अपने आपको गिन लेने वाले इंशा जी को पढ़ना-सुनना आपके मन में सुनहला, सुगन्धित, नशीला धुआँ भर देता है. More

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    कविता-क्लोनिंग [क्या इससे बचना सम्भव है?]

    कविता लिखने की स्किल सीख सीख कर किताबें छपवाई जा रही हैं, वैसे भी आजकल कोई सम्पादन का मुआमला तो है नहीं, अपने पैसे दे कर जैसी चाहे छपवा लो, फिर सोशल मीडिया पर अपने आपको प्रमोट कर लो. More

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    पुष्पा भारती से सब प्यार करते हैं!

    आज द बेटर इंडिया और शनिवार की चाय में मनीष गुप्ता के साथ पढ़िए, डॉ. धर्मवीर भारती की रचना ‘कनुप्रिया’! क्योंकि डॉ. भारती सिर्फ ‘गुनाहों का देवता’ के ही रचियता नहीं थे। उन्होंने ‘कनुप्रिया’ और ‘अंधायुग’ जैसी रचनाएँ भी की हैं। More

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    सत्तर-अस्सी का एलबम!

    चुपड़ी, कर्री, भाप उठती रोटी की धूप की बातें संदली शाम, महकी रात का घी पोर पोर में रवाँ रवाँ. ठुमकती भोर दिल के चोर अम्मा के राम पिताजी के सुबह के काम रेडियो पर गाने फुल्ली दीदी के फ़साने छत पर खिलती अचार की बरनियाँ साइकिल सुधारने वाले का स्वैग बनिए की दुकान की […] More

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    तुम्हें नहलाना चाहती हूँ!

    मैं उस ख़त को लेकर मुंडेर पर जा कर बैठ गया सुबह की चाय के साथ. वो बरसात का मौसम था. मुझे कहीं जाना नहीं था तो मैं बैठा ही रहा. बरसात बीती तो शिशिर आया. फिर शरद, बसंत, हेमंत, ग्रीष्म और फिर से वर्षा. More

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    वन नाइट स्टैंड!

    जब एक आदमी और औरत स्वेच्छा से किसी को चुनते हैं तो वे फ़रिश्ते प्रतीत होते हैं. लेकिन संबंधों पर काम न करने की वजह से बोझिलता आ जाती है जिसे वे अपना प्रारब्ध मान बैठते हैं. More

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    दीवाली-वैराग्य!

    इस कविता में हास्य है शायद, या सच्चाई है, मुझे नहीं पता. जीवन के सवाल पर हूबनाथ की एक छोटी सी कविता! More

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