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‘चिर अभिलाषा / चोर अभिलाषा’

आदमी जितना झूठ अपने आप से बोलता है उतना दुश्मन से भी नहीं हर तरह से अपने आप को समझा दिया जाता है कि 'बहुत अच्छा कर रहे हो' / 'कर ही क्या सकते हो?' अपनी नदी को ज़रूरतों के हिसाब से मोड़ने की जद्दोजहद में बीता जीवन - गरीब अपना धर्म समझ कर उसी में रहना - अमीरी है

“मुआफ़ करना दोस्त
तुम छले गए
तुम्हें तुम्हारा प्यार मिल ही गया
न मिलता – तो सपने तो न टूटते
भ्रम का महल तो बना रहता

* * *

‘मेरा ख़याल रखता है’
‘मेरा दर्द समझती है. निष्कपट हमदर्दी रखती है’
‘मेरे लिए लड़ता है’
‘मेरा कन्धा है’
‘मुझे समझती है’
‘अच्छा ‘नेचर’ है’
‘हम और तुम कितने अच्छे लगते हैं साथ में’
‘एडजस्ट कर लेती है’
‘तुम्हारे साथ रहना अच्छा लगता है..’
‘मेरे अकेलेपन की साथी तुम्हारी यादें हैं’

इस तरह का प्यार तुम्हारा ख़र्चा चला देता है
तुम्हें अमीर नहीं करता
वह समोसा / वड़ापाव है – तुम्हारा पेट भर देता है
क्षणिक तौर पर स्वाद देता है
तुम्हारा पोषण नहीं करता
तुम्हें तेज़वान, वीर्यवान नहीं बनाता
काम चल जाता है
पेट भर जाता है.
बस.
प्रेम का मकसद यह है कि आप समृद्ध हो जाएँ
एक ग़रीब प्रेम होता है, एक अमीर – आपका प्रेम कौन सा है?
कामचलाऊ प्रेम भी ऊपर से उसी चमक
उसी दमक के साथ, उन्हीं वादों, उन्हीं नारों के साथ आता है –
लेकिन एक बरसात में ही उसकी गमक जाती रहती है.
ऐसे लोगों को फिर सस्ता साहित्य समझाता है कि
प्रेम तो रोने का ही दूसरा नाम है.
‘एक आग का दरिया है और डूब के जाना है’
और रोने-कलपने में वक़्त निकल जाता है सारा
और वैसे भी इससे अच्छा टाइमपास नहीं
अपने इर्द गिर्द देखें सभी लोग किसी न किसी बहाने रोने-धोने में लगे रहते हैं

कोशिश करता हूँ समझाने की
ज़िन्दगी भी अमीर और ग़रीब होती है –
इसका पैसों से कोई सम्बन्ध नहीं है
एक चलायमान, ऊर्जावान, उष्ण जीवन – बलखाती नदी की तरह बहता हुआ
एक ‘सैटल होने’ को तलाशता, बाक़ी सपनों को सौतेला व्यवहार देता जीवन
ये सोचना कि बनना तो नदी है लेकिन इसे थोड़ा सा घुमा के
मम्मी-पापा का आशीर्वाद ले कर,
अपने प्रेमी की गली से होते हुए
बाज़ार से बीमा करवा के
अच्छी इमरतियाँ बँधवा लें
बच्चों के इम्तिहान के बाद
बस निकल चलेंगे जंगल की ओर
– हम तो साहब उच्श्रृंखल नदी हैं.

यहीं से टूटन-फूटन आती है
इसी झूठ से
गाँव में रहना / जंगल में रहना सब सही है
चौपाल का पेड़ होना या खुले आकाश में उड़ता पंछी होना
दोनों ही सही हैं बस
अपने मूल धर्म के साथ खिलवाड़
अपने आप से झूठा व्यवहार करना –
नदी को बाँधने की कोशिश
पेड़ को उड़ाने की..
किसी के मूल धर्म को बदलने की नीयत / कोशिश में खटना ही
सारे अवसाद, सारे तनाव की जड़ है.

जो लोग इसे पढ़ कर आत्म-मंथन करने लगे हैं
पहले तो वे ये जानें कि आत्ममंथन नहीं कर रहे आप
अपने आपको validate करने की कवायद कर रहे हैं
हमेशा यही करते हैं – अपने आपको किसी भी तरह समझा लेते हैं.
रहे-सहे भ्रम को और अच्छे से तोड़ने के लिए ये भी सोचें कि
बरसाती झरना अपनी सेल्फ़ी ले कर अपने आप को हमेशा के लिए नदी समझने लगे तो गड़बड़ है न..

गड़बड़ है न?

आदमी जितना झूठ अपने आप से बोलता है उतना दुश्मन से भी नहीं
हर तरह से अपने आप को समझा दिया जाता है कि ‘बहुत अच्छा कर रहे हो’ / ‘कर ही क्या सकते हो?’
अपनी नदी को ज़रूरतों के हिसाब से मोड़ने की जद्दोजहद में बीता जीवन – गरीब
अपना धर्म समझ कर उसी में रहना – अमीरी है

वैसे ही, प्यार में महबूबा की गोद मिल जाती है (शादी)
तो साल दो साल में पक क्यों जाते हैं?
क्योंकि ग़रीब प्रेम था
प्रेम का तो मकसद ही आपको आपकी ख़ुद की ज़िन्दगी में चलायमान रखना है.
आपकी क्षमता का विकास ताउम्र होता रहे – यही प्रेम का लक्ष्य है.

एक कविता सुन लें : ‘चिर अभिलाषा – चोर अभिलाषा’

लेखक –  मनीष गुप्ता

हिंदी कविता (Hindi Studio) और उर्दू स्टूडियो, आज की पूरी पीढ़ी की साहित्यिक चेतना झकझोरने वाले अब तक के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के संस्थापक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मनीष गुप्ता लगभग डेढ़ दशक विदेश में रहने के बाद अब मुंबई में रहते हैं और पूर्णतया भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार / और अपनी मातृभाषाओं के प्रति मोह जगाने के काम में संलग्न हैं.


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