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‘ज्वार’: युगों से है भारत के खान-पान का अहम हिस्सा, अब विदेशियों ने समझी कीमत

ज्वार ‘ग्लूटन-फ्री’ है और इसलिए अब विदेशों में भी इसे ‘नया क्विनोआ’ के रूप में भी जाना जा रहा है।

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लोगों के बीच मिलेट्स के बारे में बढ़ती जागरूकता के कारण न सिर्फ भारतीय बल्कि विदेशी भी इन्हें अपने खान-पान में शामिल करने लगे हैं। बहुत से मोटे अनाज जैसे रागी, बाजरा, ज्वार और कई छोटे अनाज जैसे कोदो, कंगनी आदि सामान्य घरों की रसोई में अपनी जगह बनाने लगे हैं। लोगों के स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण के हित में होने के कारण मिलेट्स पर जोर दिया जा रहा है। एशिया, अफ्रीका के बाद अब यूरोप में भी लोगों के बीच मिलेट्स का ट्रेंड बढ़ रहा है। इस कड़ी में आज हम आपको बता रहे हैं विश्व के पांचवे सबसे महत्वपूर्ण अनाज, ‘ज्वार’ के बारे में। 

ज्वार बहुत ही महत्वपूर्ण फसल है जिसकी खेती कम से कम पानी में की जा सकती है। यह दुनिया के शुष्क और अर्ध-शुष्क कटिबंधों में न सिर्फ लोगों के लिए भोजन, बल्कि मवेशियों के लिए चारा भी प्रदान करती है। एक अनुमान के अनुसार, 30 से ज्यादा देशों में पांच अरब लोगों के लिए मुख्य आहार है। अफ्रीका और भारत में ज्वार मुख्य पारंपरिक फसलों में से एक है जिसे अब से लगभग 50-60 साल पहले ‘पुराने ज़माने के भोजन या गरीबों के भोजन’ के रूप में देखा जाने लगा था। लेकिन अब एक बार फिर लोगों को समझ में आ रहा है कि यह पारंपरिक फसल मानव-प्रजाति के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। 

ज्वार की आज कई प्रजातियां मौजूद हैं जैसे रबी और खरीफ में अलग -अलग प्रजातियां बोई जाती हैं। इसके अलावा, कुछ प्रजातियां खासतौर पर मवेशियों के चारे के रूप में बोई जाती हैं। पिछले कुछ सालों में मीठी ज्वार का भी प्रचलन बढ़ा है क्योंकि इससे शुगर सिरप, एथेनॉल आदि बनाई जा सकती है। इसलिए इस प्रजाति को काफी प्रोमोट भी किया जा रहा है। मीठी ज्वार के तनों से सिरप मिलती है, जिसका कई तरह से खाद्य उत्पादों में प्रयोग किया जा सकता हैं। वहीं, इसके दानों से एथेनॉल मिलती है, जिसे बायोफ्यूल बनाने के लिए इस्तेमाल में लिया जाता है। 

ज्वार क्यों है सुपरफूड 

Superfood Jowar
Jowar (Source)

बात अगर ज्वार को अपने आहार में शामिल करने की हो तो इसके औषधीय गुणों के कारण बहुत से लोग इसे ‘सुपरफूड’ का नाम भी देते हैं। तेलंगाना में ज्वार की रोटी अच्छी-खासी मशहूर हैं। लेकिन अब दलिया, खिचड़ी और दोसा जैसी चीजों में ज्वार का इस्तेमाल हो रहा है। अहमदाबाद की डाइटिशियन, ख्याति प्रजापति कहती हैं कि ज्वार में बहुत से ऐसे पोषक तत्व और गुण हैं, जो इसे बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए उपयुक्त आहार बनाते हैं। ज्वार ‘ग्लूटन-फ्री’ है और इसलिए इसे ‘नया क्विनोआ’ के रूप में भी जाना जा रहा है। 

बहुत से लोगों को ‘ग्लूटन’ नामक प्रोटीन से एलर्जी होती है और गेहूं-जौ में ग्लूटन मिलता है। ऐसे में, ज्वार एक अच्छा विकल्प है उन लोगों के लिए जो ग्लूटन युक्त आहार नहीं खा सकते हैं। इसके अलावा, ख्याति कहती हैं कि ज्वार में आयरन की अच्छी मात्रा होती है जो इसे लड़कियों और महिलाओं के लिए अच्छा बनाती है। खासकर कि वे लड़कियां इन्हें माहवारी शुरू हुई है और ऐसी, महिलाएं, जिन्हें माहवारी बंद होने को आयी है। ज्वार में फाइबर की मात्रा भी अच्छे होती है, इस कारण यह पाचन क्रिया को अच्छा करता है। 

साथ ही, ज्वार हाई ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रित करने में मददगार है। ज्वार एक अच्छा एंटीऑक्सीडेंट है, जो कैंसर से लड़ने में मदद करता है। ख्याति बताती हैं कि ज्वार में जिंक, मैग्नीशियम, कॉपर जैसे लगभग 20 माइक्रोन्यूट्रिएंट होते हैं। जिससे ब्लड सर्कुलेशन, मेटाबोलिज्म अच्छा होता है। वजन कम करने में भी यह सहायक है। इसके पोषक गुणों के कारण ही अब लोग इसे गेहूं के अच्छे विकल्प के तौर पर देखने लगे हैं। ज्वार का आटा आसानी से रोटियां, भाकरी, और चीला आदि बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। 

मशहूर हो रही हैं ज्वार की रोटियां:

भारत में पुराने समय से ज्वार की रोटियां खाई जा रही हैं। अलग-अलग जगहों पर ज्वार की अलग-अलग तरह की रोटियां बनती हैं। जैसे बहुत सी जगहों पर इसकी काफी मुलायम रोटियां बनती हैं। जिन्हें गर्म-गर्म खाने के लिए कहा जाता है। तो वहीं कई इलाकों में ज्वार की कड़क रोटियां भी बनाई जाती हैं। इन्हें लम्बे समय तक स्टोर किया जा सकता है।

इसलिए कई भारतीय फ़ूड कंपनियां ज्वार की कड़क रोटियां अच्छे से पैक करके बिक्री भी कर रही हैं। हुबली स्थित पूर्वा फ़ूड प्रोडक्ट्स कंपनी न सिर्फ भारत में बल्कि दूसरे देशों में भी अपने उत्पाद पहुंचाती है। उनके उत्पादों में मुख्य रूप से ज्वार, बाजरा जैसे मिलेटस के आटे और ‘रेडी टू ईट’ रोटियां शामिल हैं।

पहले की तरह आजकल हर घर में लोगों के पास इतना समय नहीं है कि वे ज्वार जैसे मिलेटस को साफ करके आटा बनवाये। और बहुत से लोगों को ज्वार की रोटियां बनाना भी नहीं आता है। ऐसे में, ज्वार की रोटियों को बाजार में अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। क्योंकि ज्वार के फायदे किसी से छिपे हुए नहीं है।

Jowar Roti
Jowar Roti (Source)

बीदर स्थित तिरुमला फूड्स के संजीव रेड्डी कहते हैं, “ज्वार की कड़क रोटियों को लगभग छह महीनों तक स्टोर किया जा सकता है। इसलिए अक्सर हमारे पास भी ग्राहकों की मांग आती है कि हम पैकेजिंग अच्छे से करके दें ताकि वे इन्हें ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका जैसे देशों में रह रहे अपने जानने वालों को भेज सकें।” उनका कहना है कि हर महीने लगभग 2000 रोटियां उनके यहां से दूसरे देशों में भेजने के लिए खरीदी जाती हैं।

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सुपरफूड ही नहीं सुपरक्रॉप भी:

लोगों के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होने के अलावा और भी बहुत सी वजहें जो ज्वार को एक महत्वपूर्ण फसल बनाती हैं। निंबकर एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टिट्यूट (NARI) के डॉ. अनिल राजवंशी कई सालों से ज्वार की अलग-अलग किस्मों पर रिसर्च कर रहे हैं। उनके शोध के मुताबिक, मीठी ज्वार प्रजाति के तने और दानों से शुगर, एलकोहल, सिरप, गुड़, चारा, ईंधन, छान/छत, बाड़ा और कागज आदि मिल सकते हैं। यह ऐसी फसल है, जिसके हर एक हिस्से को प्रयोग में लिया जा सकता है। पारंपरिक रूप से भारत एथेनॉल के उत्पादन के लिए गन्ने पर निर्भर है। 

जैसा कि हम सब जानते हैं कि गन्ने की खेती में पानी की बहुत ज्यादा जरूरत होती है। वहीं मीठी ज्वार को सामान्य ज्वार की तरह कम से कम पानी वाली जगहों पर भी उगाया जा सकता है। NARI ने इसकी एक ख़ास प्रजाति ‘मधुरा’ तैयार की है, जो एथेनॉल, शुगर सिरप, और गुड के उत्पादन के लिए अच्छी है। एथेनॉल का प्रयोग बायोफ्यूल बनाने में किया जाता है। फिलहाल, भारत को दूसरे देशों से ईंधन लेना पड़ता है लेकिन आने वाले समय में मीठी ज्वार के उत्पादन से इस निर्भरता को कम किया जा सकता है। 

बायोफ्यूल के अलावा, ICRISAT की रिसर्च के मुताबिक, ज्वार को ‘बायोप्लास्टिक’ बनाने के लिए भी प्रयोग में लिया जा सकता है। प्लास्टिक के इको फ्रेंडली विकल्पों की मांग के कारण, कई तरह के ‘नॉन-प्लास्टिक’ उत्पाद बाजार में उपलब्ध हो रहे हैं। गन्ने की खोई से भी कई तरह से उत्पाद जैसे सिंगल यूज कटलरी बनाई जा रही है। यह इको फ्रेंडली है लेकिन बात अगर गन्ने की खेती की हो तो यह लम्बे समय के लिए पर्यावरण के हित में नहीं है। इसलिए वैज्ञानिकों ने अब गन्ने की जगह ज्वार पर फोकस करना शुरू किया है। 

क्योंकि ज्वार की कई किस्में, गन्ने का अच्छा विकल्प हैं। ICRISAT के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. ए. अशोक कुमार के मुताबिक, अगर समय, पानी और उर्वरकों की तुलना में, ज्वार बहुत ही प्रभावी फसल है। और ज्वार की खोई में भी उतना ही सेल्यूलोस होता है जितना की गन्ने की खोई में। इसलिए ज्वार की खोई से भी पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद बनाये जा सकते हैं। 

अगर आप ज्वार को अपनी डाइट में शामिल करना चाहते हैं तो कई तरह से कर सकते हैं। जैसे इसके आटे की रोटियां आप खा सकते हैं। इसके अलावा, ज्वार को दूसरे मिलेट्स जैसे रागी या ड्राई फ्रूट्स के साथ मिलाकर भी अलग-अलग डिशेस बना सकते हैं। ज्वार का प्रयोग बेबी फ़ूड में भी किया जा सकता है। 

संपादन- जी एन झा

कवर फोटो: बाएं और दाएं

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