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Turtle Shailender Singh Wild Life

विलुप्त हो रहे कछुओं के लिए छोड़ी सरकारी नौकरी, 7 प्रजातियों को बचाने में जुटे शैलेंद्र

भारत में स्वच्छ पानी के कछुओं की 29 प्रजातियां हैं। जिनमें से 17 प्रजातियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में उच्च मांग, अवैध तस्करी, व्यापार और आवास के नुकसान के कारण खतरे में हैं। इन्हें संरक्षित करना आवश्यक है।

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क्या आपको पता है कि पानी को स्वच्छ और पारिस्थितिक तंत्र (Eco System) को बनाए रखने में कछुए का महत्वपूर्ण योगदान होता है? दरअसल, ये मृत पदार्थ और शैवाल खाकर नदियों और तालाबों को साफ रखते हैं। कछुए (Turtles) की वजह से कई ऐसी मछलियां नियंत्रित रहती हैं, जिनका स्वभाव नुकसान पहुंचाने वाला होता है। इसके अलावा, सबसे खास बात यह है कि जलीय जीवों के लिए कछुआ प्रोटीन का स्रोत भी होता है। 

वन्यजीव संरक्षणवादी शैलेंद्र सिंह कहते हैं कि भारत में स्वच्छ पानी के कछुओं की 29 प्रजातियां हैं, जिनमें से 17 प्रजातियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में उच्च मांग, अवैध तस्करी, व्यापार और हैबिटेट के नुकसान के कारण खतरे में हैं। 

शैलेंद्र ने द बेटर इंडिया को बताया कि इनमें से कछुओं की कई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार की ओर बढ़ रही हैं और पर्यावरण संतुलन के लिए खतरा पैदा कर रही हैं। सबसे अधिक खतरा बटागुर बस्का, बटागुर कचुगा, निल्सोनिया नाइग्रिकन्स, चित्रा इंडिका, पंगशुरा सिलेटेन्सिस और मनोरिया एमिस फेरी जैसी प्रजातियों को है। हालांकि, इसे रोकने की लड़ाई में शैलेंद्र ने अपना जीवन समर्पित कर दिया है और वह पिछले 13 वर्षों में सात प्रजातियों को विलुप्त होने के कगार से बचा चुके हैं। 

कछुओं के लिए गहरा प्यार 

Dr Shailender Singh is working to save Endangered Turtles
Dr Shailender Singh (Source : The Hindu )

शैलेंद्र कहते हैं, “मेरा मानना है कि संरक्षण कार्यों की वजह से बटगुर की सभी तीन लुप्तप्राय प्रजातियों, ब्लैक सॉफ्ट-शेल टर्टल, इंडियन नैरो-हेडेड सॉफ्ट-शेल टर्टल, असम रूफर्ड टर्टल और साथ ही एशियाई ब्राउन कछुओं को लाभ मिला है।” उन्होंने बताया कि कछुओं (Turtles) की आबादी को पुनर्जीवित करने के अलावा, वह ज्यादातर उत्तरी प्रजातियों के पुनर्वास को लेकर सक्रिय हैं, जिन्हें अक्सर अवैध व्यापार से बचाया जाता है।

उनका कहना है कि जब वह नौ साल के थे, तब उन्होंने कछुओं को संरक्षित करने का कार्य शुरू किया था। उन दिनों को याद कर शैलेंद्र बताते हैं, “मैं कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य के पास जारवाल रोड नामक एक छोटे से गांव से हूं, जो भारत-नेपाल सीमा पर स्थित है। स्कूल के दिनों से ही मैं अभ्यारण्य जाने लगा। मैं वन क्षेत्र में वन्य जीवन और जैव विविधता से रोमांचित था। एक दिन मैंने एक दुकान से दो भारतीय टेंट कछुए मंगवाए। दरअसल, मुझे कछुआ देखना बहुत पसंद है और यहीं से मेरी रुचि इस जीव में बढ़ने लगी।”

शैलेंद्र का कहना है कि समय के साथ ही जानवरों के प्रति उनकी उत्सुकता बढ़ती गई। बाद में, उन्होंने जीव विज्ञान में स्नातक किया और लखनऊ विश्वविद्यालय से पर्यावरण विज्ञान में स्नातकोत्तर किया। वह कहते हैं, “मैं उच्च अध्ययन के दौरान टर्टल सर्वाइवल एलायंस (TSA) में शामिल हुआ। यह एनजीओ प्रजातियों की रक्षा करने की दिशा में काम कर रहा था। मुझे पता चला कि कछुए सबसे लुप्तप्राय जानवर हैं। बाघों और हाथियों के विपरीत, कछुए जानवरों का एक उपेक्षित समूह हैं।” 

जागरूकता की कमी ने पीएचडी करने के लिए किया प्रेरित

साल 2003 में, उन्होंने गोमती नदी में कछुओं (Turtles) पर एक शोध किया। उनके शोध ने तीन-धारीदार शेल (striped Roofed Turtles) वाले कछुओं और अन्य प्रजातियों के विलुप्त होने का खुलासा किया। शैलेंद्र कहते हैं, “इस जानकारी ने मुझे चिंतित कर दिया था। मैंने देश भर में कछुओं का अध्ययन करने, उनके खतरों को समझने और आवश्यक संरक्षण उपाय करने का फैसला किया। मुझे कछुए बहुत प्यारे लगते हैं। ये ऐसे जीव हैं, जो किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते। इस जीव की कई खासियत हैं।”

वह कहते हैं कि कछुओं के संरक्षण और उनके बारे में जागरूकता की कमी ने उन्हें पीएचडी करने के लिए प्रेरित किया। साल 2005 में, उन्होंने चंबल नदी में कछुओं के बारे में अध्ययन करने के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की नौकरी को ठुकरा दिया। उनके इस निर्णय ने उनके  माता-पिता को परेशान कर दिया था।

शैलेंद्र का कहना है कि कछुओं से संबंधित मुद्दों के बारे में बहुत से लोगों को जानकारी नहीं थी, जो आज भी एक सच है। उन्होंने कहा, “यही कारण था कि मैंने कछुओं के हित में एक फैसला किया और गंगा व ब्रह्मपुत्र नदी घाटियों में काम करना शुरू किया।”  

शुरू की ‘रियर एंड रिलीज’ सुविधा

Dr Shailender Singh Turtle
Dr Shailender Singh with Turtle (Source : Jagran.Com)

शैलेंद्र का कहना है कि देश के विभिन्न हिस्सों में कछुओं (Turtles) का अध्ययन करते हुए उन्हें एहसास हुआ कि इस जीव को जीवित रहने के लिए कितनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। दक्षिण एशियाई देशों में कछुओं का व्यापार और मांस के लिए उनका अवैध शिकार किया जाता है। मछली पकड़ने के जाल में फंसने के बाद जल प्रदूषण या आकस्मिक डूबने के कारण उन्हें अक्सर अस्तित्व के खतरों का सामना करना पड़ता है। रेत खनन के कारण भी इस जीव को नुकसान पहुंच रहा है। शैलेंद्र का कहना है कि खतरों का मुकाबला करने के लिए उन्होंने संरक्षण परियोजनाएं शुरू की।

चंबल नदी में अपने काम का एक उदाहरण देते हुए, वह कहते हैं, “हमने साल 2006 में कछुओं की प्रजाति बटागुर कचुगा और बटागुर ढोंगोका के लिए संरक्षण कार्यक्रम शुरू किया था। यह सबसे लंबे समय तक चलने वाले अभियानों में से एक था, जहां हमने शिकारियों और अन्य मानवजनित दबावों से घोसलों की रक्षा की थी। हमने इटावा के पास एक ‘रियर एंड रिलीज’ सुविधा स्थापित की और मध्य प्रदेश में कछुओं के बच्चों को पालने के लिए इसी तरह की सरकारी सुविधा को सहायता प्रदान की।”

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चंबल नदी पर शुरू किया कछुआ संरक्षण कार्यक्रम

शैलेंद्र अपने काम के तरीके के बारे में बताते हैं, “कछुए जहां रहते हैं, उस जगह की पहचान की जाती है और उसके अनुसार सुरक्षा उपाय किए जाते हैं। कई अंडे सुरक्षित पानी में संरक्षित किए जाते हैं। हमारे रेडियो-टेलीमेट्री अध्ययन ने कछुओं के संरक्षण आदि के बारे में जानकारी इकट्ठा की है, जिसके अनुसार उनके जीवित रहने की दर 80 प्रतिशत थी।” 

उनका कहना है, “स्थानीय समुदाय की सहायता इस काम में काफी मदद मिलती है। हमने 35 स्कूलों और 4,000 से अधिक बच्चों को शामिल करके निचले चंबल के साथ क्लस्टर स्तर पर एक सामुदायिक शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत की। हमने स्थानीय समुदाय को कछुओं से आजीविका कमाने की निर्भरता को कम करने के लिए कुछ प्रयोग किए। हम उन्हें कृत्रिम आभूषण बनाने, सिलाई और स्कूलों के माध्यम से आर्थिक रुप से सबल बनाने का काम कर रहे हैं।”

कछुओं को घर में ना रखें

शैलेंद्र का कहना है कि साल 2008 से अब तक 13 बटागुर बस्कों की आबादी बढ़कर 380 हो गई है। साल 2021 में उन्हें Behler Turtles Conservation Award से सम्मानित किया गया। उनका कहना है कि संरक्षण कार्यक्रमों में विभिन्न मानवीय संबंधों का उपयोग किया जाता है।

उन्होंने कहा, “भारत में लोग कछुए को धर्म आदि से भी जोड़कर देखते हैं। कुछ समुदाय ऐसे भी हैं, जो कछुओं को घर में शगुन के लिए रखते हैं। हम अपने नेटवर्क का उपयोग गांवों और मंदिर के तालाबों में लुप्तप्राय प्रजातियों के प्रजनन में मदद करने के लिए कर रहे हैं। हमारा प्रयास है कि लोगों को यह समाझाया जाए कि घर में वे कछुए को न रखें।” 

अब शैलेंद्र टीएसए में कार्यक्रम निदेशक के रूप में काम करते हैं। उनका मानना है कि आज सबसे बड़ा मुद्दा अवैध कछुआ व्यापार है। वह कहते हैं, “यह विडंबना है कि मनुष्यों के साथ इतने सकारात्मक संबंध होने के बावजूद कछुए विलुप्त होने के कगार पर हैं।” उन्होंने बताया कि उनका लक्ष्य खतरे में पड़ी भारतीय कछुओं की प्रजातियों में से कम से कम एक प्रजाति को सुरक्षित करना और कछुओं के भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए एक कॉलोनी विकसित करना है।

शैलेंद्र ने की कछुओं को लेकर समाज से अपील

शैलेंद्र की समाज से बस एक ही अपील है, “कछुओं को कभी पालतू न रखें और न ही उनका मांस के रूप में सेवन करें। उनका कहना है, “मैं लोगों से कछुओं के लिए सुरक्षित आवास प्रदान करने के लिए आस-पास की आर्द्रभूमि और नदियों को साफ रखने का आग्रह करता हूं। स्थानीय लोगों को Kurma mobile application का उपयोग करके किसी भी कछुए के देखे जाने और अवैध गतिविधियों की सूचना देनी चाहिए। कृपया अपने-अपने क्षेत्रों में कछुओं और आर्द्रभूमि को बचाने वाले संगठनों का समर्थन करें।”

उन्होंने आगे कहा कि कछुओं (Turtles) को हमारे समर्थन की जरूरत है। वह कहते हैं, “मैं भाग्यशाली हूं कि मैंने उनके संरक्षण में योगदान दिया है। मैं साफ पानी में ढेर सारे कछुओं को देखना चाहता हूं। प्रागैतिहासिक प्राणी जो कि इस धरती पर लगभग 20 करोड़ वर्षों से चले आ रहे हैं। मैं उनके संरक्षण के लिए सभी युवाओं और नागरिकों से एकजुट होने के लिए आग्रह करता हूं।”

मूल लेख- हिंमाशु नित्नावरे

संपादन- जी एन झा

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