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स्पैरो मैन ऑफ़ इंडिया: ऊँची इमारतों के बीच 26 प्रजातियों की चिड़ियाँ का बसेरा है इनका घर!

अब तक जगत जी 90, 000 से भी ज़्यादा घोंसले लोगों को बाँट चुके हैं।

“अगर कभी घर के अंदर चिड़िया आ जाती, तो माँ तुरंत पंखा बंद करवा देती थी ताकि उसे चोट न लग जाए। ऐसे ही बहुत बार अगर घर के अंदर चिड़िया ने घोंसला बना लिया है तो बाहर जाते वक़्त हमेशा एक खिड़की खुली रखने की हिदायत मिलती, जिससे कि वह चिड़िया अपने बच्चों के पास आती-जाती रहे,” ये सब बातें जब जगत जी मुझे बता रहे थे, तो उनके चेहरे का संतोष साफ़-साफ़ झलक रहा था। क्योंकि जिस ज़माने में इंसान इंसानी रिश्तों को भूलता जा रहा है, उस ज़माने में जगत जी इन बेज़ुबान जीवों से इंसानियत का रिश्ता बनाए हुए हैं।

उनका रिश्ता पक्षियों से इस कदर गहरा है कि आज हर कोई उन्हें ‘स्पैरो मैन’ के नाम से जानता है।

जगत किनखाबवाला

गुजरात के अहमदाबाद में जन्मे और पले-बढ़े जगत किनखाबवाला ने फाइनेंस में एमबीए किया और फिर सालों तक कॉर्पोरेट कंपनियों के साथ काम किया। आज भी वे कॉर्पोरेट कंपनियों के लिए बतौर सीएसआर कंसलटेंट काम करते हैं। लेकिन उनकी इस पहचान से उनके जानने वाले लोग ही वाकिफ़ हैं। बाकी हर किसी के लिए वे ‘स्पैरो मैन’ हैं, जो खुद तो चिड़ियों के संरक्षण पर काम कर ही रहे हैं। साथ ही, उनके इस काम और शोध ने देश-दुनिया में और भी लोगों को उनसे जुड़ने के लिए प्रेरित किया है।

जगत ने कभी भी नहीं सोचा था कि जिस उम्र में लोग रिटायरमेंट के बारे में सोचते हैं, उस उम्र में वे अपनी ज़िंदगी की एक नई पारी शुरू करेंगें। अब भी उनका जोश, जुनून बिल्कुल वैसा ही है जैसा युवाओं का होता है। वाकई उम्र महज़ एक संख्या है।

अपने घर के खूबसूरत बगीचे में चिड़ियों के घोंसलों की ओर निहारते हुए जगत बताते हैं कि साल 2008 में काम के सिलसिले में एक हवाई जहाज यात्रा के दौरान उन्होंने एक मैगज़ीन में आर्टिकल पढ़ा। आर्टिकल था कि किस तरह से बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते ‘हाउसिंग बर्ड्स’ (इंसानों के रहवास इलाकों में पाए जाने वाले पक्षी) कम होते जा रहे हैं।

“वो आर्टिकल मेरे लिए आय ओपनर था। मैंने फ्लाइट की क्रू से प्रार्थना करके वह मैगज़ीन अपने साथ रख ली और बस उस दिन से मैंने इस विषय में पढ़ना शुरू कर दिया।”

सिर्फ़ पढ़ना ही नहीं, बल्कि चिड़ियों के बारे में अच्छा-खासा शोध भी शुरू किया। उन्होंने अपने घर के बगीचे को भी इन पक्षियों के अनुकूल बनाया। घर की बाहरी दीवारों पर मिट्टी के घोंसले लगाए, उनके पानी पीने के लिए परिण्डे टाँगे और दाना खिलाने के लिए ख़ास ‘बर्ड फ़ीडर’ भी लगाए। जगत जी बताते हैं कि उनके यहाँ आज 26 प्रजातियों की चिड़ियाँ आती हैं।

छोटी-सी पहल कैसे बनीं जन-अभियान

अपने काम के बारे में आगे बात करते हुए उन्होंने बताया कि एक बार वे किसी के साथ शहर के शांति एशियाटिक स्कूल में गए। स्कूल में काम तो उनके दोस्त को था, लेकिन जब उन्होंने स्कूल में कदम रखा तो उन्हें अपने नेक काम को आगे बढ़ाने का रास्ता मिल गया।

वे कहते हैं, “अगर समाज में कोई बदलाव लाना है तो उस बदलाव के गुण अपने बच्चों में इजाद करो। क्योंकि वे आने वाली पीढ़ी हैं। अगर आने वाली पीढ़ी ज़िम्मेदार हो जाएगी तो यक़ीनन बड़ा बदलाव आएगा।”

स्कूल से की शुरुआत अपनी पहल को जन-अभियान बनाने की

उन्होंने स्कूल के अधिकारियों को अपने काम के बारे में बताया और प्रशासन ने उनकी मदद करते हुए स्कूल में बच्चों के लिए एक सेमिनार आयोजित किया। इस सेमिनार में जगत जी ने बच्चों को चिड़िया और पर्यावरण के प्रति जागरूक किया। इसके बाद उन्होंने बहुत ही आसान तकनीक से कार्टन (गत्ता) से चिड़िया का घोंसला बनाना सिखाया। स्कूल में हुआ यह इवेंट पूरे अहमदाबाद शहर में हिट हो गया।

जगत बताते हैं कि इस एक इवेंट के बाद उन्हें शहर के और भी कई अन्य स्कूल्स और सामाजिक संगठनों से फ़ोन आए। उन्होंने रेडियो सिटी के साथ भी एक एक्टिविटी की, जिसमें लगभग 1800 बच्चे और उनके माता-पिता ने भाग लिया।

इन बेजुबान पक्षियों का इंसान के जीवन में महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, हम अपनी बेसिक फ़ूड चेन को भूलते जा रहे हैं। ये पशु-पक्षी हमारी फ़ूड चेन का हिस्सा हैं। आज रहवास के क्षेत्रों में आपको शायद ही कोई पक्षी मिले, जबकि इंसान और ये पक्षी, एक-दूसरे के पूरक हैं। हम इंसान इनके लिए घरों में दाना-पानी देते हैं, बगीचे लगाते हैं और इसके बदले में ये पक्षी उन बैक्टीरिया और वायरस आदि को खाते हैं, जो कि इंसानों के लिए हानिकारक हैं। अगर इस फ़ूड चेन में से हम इन पक्षियों को निकाल दें, जैसा कि आजकल हो रहा है तो यह मानव जाति के लिए खतरा है। अपने इस पूरे शोध को उन्होंने एक किताब का रूप दिया है, जिसमें आप उनके प्रोजेक्ट ‘सेव द स्पैरो’ के बारे में विस्तार से पढ़ सकते हैं।

जगत जी की किताब ‘सेव द स्पैरो’ में पढ़िये उनके सफ़र के बारे में

कैसे मिला ‘स्पैरो मैन ऑफ़ इंडिया’ का टैग

गुजरात सरकार के इकोलॉजी विभाग ने राज्य में समाज के लिए, पर्यावरण के लिए अच्छा काम कर रहे कुछ लोगों को सम्मानित करने के लिए चुना था। उन्हीं में से एक नाम जगत का भी था। उनके काम के बारे में जानने के लिए विभाग की टीम ने उनके साथ डीपीएस स्कूल का दौरा किया।

यहाँ उनके कहने पर स्कूल के प्रिंसिपल ने कुछ बच्चों को बुलाया, जिनसे बातचीत में पूछा गया कि क्या वे जगत जी को जानते हैं? सभी बच्चों ने हाँ में जवाब दिया। इसके बाद जब उनसे पूछा गया कि बताओ क्या नाम है इनका? तो सभी बच्चे चुप हो गए, लेकिन एक बच्चे ने बहुत ही उत्साह के साथ कहा, “स्पैरो मैन”!

प्रधानमंत्री ने उनके कार्यों का जिक्र ‘मन की बात’ में किया और उनके लिए यह ख़ास पत्र भी भेजा!

इस बच्चे ने मासूमियत में जो नाम जगत को दिया, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी ‘मन की बात’ से मशहूर कर दिया। प्रधानमंत्री ने अपने इस कार्यक्रम में पूरे देश को जगत के अमूल्य कार्यों के बारे में बताते हुए, उन्हें “स्पैरो मैन ऑफ़ इंडिया” के नाम से नवाज़ा। वहीं गुजराती भाषा में लोग उन्हें ‘चकली काका’ बुलाते हैं।

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इनोवेटिव और इको-फ्रेंडली तकनीक से बना रहे हैं घोंसले

जगत द्वारा बचाई जाने वाली चिड़िया ही नहीं, बल्कि इन चिड़ियों के लिए जो घोंसले वे बनाते हैं, वे भी काफ़ी मशहूर हैं।

“मैं बच्चों को घर में आसानी से मिलने वाली चीज़ों से घोंसले बनाने के लिए प्रेरित करता हूँ। अगर आपने कभी ध्यान दिया हो तो चिड़िया हमेशा पेड़ के खोखले तने या फिर शाखाओं में अपना घोंसला बनाती हैं क्योंकि उन्हें थोड़ी खुली जगह चाहिए होती है। लेकिन शहरों में इस तरह पेड़ मिलना या फिर घरों में पेड़ों पर घोंसले बनाना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए मैंने यह तरीका इजाद किया।”

वे किसी भी पुराने कार्टन या डिब्बे को उचित जगह से काटकर, इस तरह से तैयार करते हैं कि अगर उसे घर की दीवारों या फिर छत से भी लटकाया जाए तो चिड़िया आसानी से अपना घोंसला इसमें बना सकती है। इसके अलावा सिर्फ़ इसी तरह से ही नहीं, बल्कि वे बच्चों को अपनी रचनात्मक प्रतिभा का इस्तेमाल करके अन्य किसी भी इको-फ्रेंडली तरीके से इस तरह के घोंसले बनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

जगत जी का ‘चकली घर’ (उनके इस नेक काम में रत्नामानी मेटल्स एंड ट्यूब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी सहयोग कर रही है)

वे कहते हैं, “आज मेरे मार्गदर्शन में देश की अलग-अलग यूनिवर्सिटी के छात्र अपने कई शोध कार्यों और प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। उड़ीसा, हरियाणा आदि से कई छात्र, जो कि जीव विज्ञान का अध्ययन कर रहे हैं, वे अक्सर मुझसे सलाह लेते हैं। साथ ही CEPT, NID जैसे संस्थानों के बच्चे अपने आर्किटेक्ट प्रोजेक्ट्स के लिए मुझे संपर्क करते हैं।

मैं बस उनसे यही कहता हूँ कि कल को डिग्री पूरी करके वे किसी न किसी के लिए तो घर बनाएंगे ही तो क्यों न वे अपने इस काम की शुरुआत इन बेजुबानों के घर से करें। अपनी पूरी मेहनत और ज्ञान का इस्तेमाल करके इन चिड़ियों के लिए क्रियात्मक ढंग से घोंसले बनाएं।

 

अब तक जगत 90, 000 से भी ज़्यादा घोंसले लोगों को बाँट चुके हैं। जिनके बारे में वे कहते हैं कि इन घोंसलों में से 10% भी यदि कामयाब होते हैं तो समझना कि हमारा काम हो गया।

प्लास्टिक की बोतलों से बना ‘स्पैरो हाउस’ (इनसेट: अंदरूनी भाग)

इन घोंसलों की ख़ास बात यह है कि इन पर जगत का नंबर लिखा होता है जिससे कि कोई भी ज़रूरत पड़ने पर उन्हें फ़ोन कर सके। साथ ही, पक्षियों के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, यह भी उन्होंने घोंसले पर लिखवाया है।

इसके अलावा उन्होंने एक कंपनी की खाली जगह में प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल करके एक ‘स्पैरो हाउस’ भी बनाया है। यह स्पैरो हाउस न सिर्फ़ इन चिड़ियों को, बल्कि कंपनी में आने-जाने वाले सभी लोगों को आकर्षित करता है। कंपनी में आने वाला कोई भी मेहमान इस स्पैरो हाउस का दौरा किए बिना वापस नहीं जाता।

 

सिर्फ़ शहर ही नहीं, गांवों तक भी पहुंची मुहिम

जगत बताते हैं कि “एक दिन देर रात को मुझे अचानक से एक फ़ोन आया। इतनी रात को फ़ोन की आवाज़ सुनकर उठा तो मन बैचेन हो गया कि इतनी रात को कौन फ़ोन कर रहा है। फ़ोन उठाया तो पता चला कि भुज के पास पाटन गाँव से कोई सज्जन है और बड़े संकोच से उन्होंने मुझे फ़ोन किया है।”

जगत को फ़ोन करने की वजह के बारे में बताते हुए उन सज्जन ने कहा कि उनके घर के एक हिस्से में एक चिड़िया ने घोंसला बनाकर अपने अंडे दिए थे। उसके बच्चे भी निकल आए थे लेकिन उस दिन उनके घर के एक पंखे में आकर उस चिड़िया की मृत्यु हो गई और जब शाम में वे घर वापस आए तो उन्होंने देखा कि चिड़िया के बच्चे रो रहे हैं। उन असहाय जीवों को देखकर उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने जगत जी को फ़ोन कर दिया कि वे कैसे उन बच्चों शांत करें।

गुजरात के इस ‘चकली काका’ की पहल आज शहरी-ग्रामीण सभी क्षेत्रों में पहुँच रही है

जगत ने पूरे इत्मिनान से उनकी बात सुनी और घंटे भर तक उन्हें कई तरीके समझाएं जिससे कि चिड़िया के बच्चों को शांत किया जा सकता है। इसके बाद जब जगत ने उससे पूछा कि उन्हें उनका फोन नंबर कैसे मिला तो उन सज्जन ने कहा कि किसी के ज़रिए उनका एक घोंसला पाटन गाँव में भी पहुंचा है और उसी घोंसले से उन्हें उनका नंबर मिला।

अपने इसी तरह के छोटे-बड़े प्रयासों से वे अब तक एक लाख से भी ज़्यादा चिड़ियों की संख्या बढ़ाने में सक्षम रहे हैं। चिड़िया संरक्षण के अलावा वे पानी के संरक्षण और पेड़ों के बचाव के लिए भी कार्य कर रहे हैं। अपने हर एक कार्य के पीछे उनका सिर्फ़ एक ही उद्देश्य है कि जिस प्रकृति और पर्यावरण ने उन्हें जीवन दिया है, वे भी उस प्रकृति को कुछ वापस कर पाएं।

अंत में वे सिर्फ़ यही संदेश देते हैं,

“हमारी ज़िंदगी की असल सफलता क्या है, यह हमें समझना होगा। यदि लाखों कमाकर भी हम संतुष्ट नहीं है तो फिर हमें सोचना चाहिए कि हमारी असल ख़ुशी कहाँ है। ज़रूरी नहीं कि जो मैं कर रहा हूँ, वही आप करें, लेकिन हर किसी का कोई न कोई पैशन होना चाहिए। आप जो भी करें, उसमें ही कोशिश करें कि जितना आपको इस समाज से मिला है आप भी उसे उतना ही लौटाएं। अब ज़रूरत है कि हम सिर्फ़ समस्याओं पर बात न करके, उनके हल ढूंढने की कोशिश करें।”

जगत, उनकी पत्नी रोज़ी के साथ लेखिका

जगत जी के कार्यों के बारे में विस्तार से जानने के लिए, या फिर उनसे इससे संबंधित किसी भी तरह की मदद के लिए आप उन्हें 9825051214 पर फ़ोन कर सकते हैं। साथ ही, यदि आपको लगता है कि उनका घोंसला आपके या आपके जानने वालों के काम आ सकता है तो आप बेझिझक फ़ोन करके उनसे मंगवा सकते हैं। क्योंकि ये घोंसले वे मुफ़्त में बांटते हैं!

संपादन : भगवती लाल तेली 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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