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कभी आजीविका के लिए बांटे अखबार, आज ऑस्ट्रेलिया में खड़ी की कंपनी, टर्नओवर है 10 करोड़ रु

कभी आजीविका के लिए बांटे अखबार, आज ऑस्ट्रेलिया में खड़ी की कंपनी, टर्नओवर है 10 करोड़ रु

अलीगढ़ के रहने वाले आमिर कुतुब, बहुत से सपने लेकर ऑस्ट्रेलिया पहुँचे थे। लेकिन वहाँ उन्हें आजीविका के लिए, एयरपोर्ट पर सफाई कर्मचारी और अखबार बाँटने का काम करना पड़ा। उन्होंने हार मानने की बजाय, दिन-रात मेहनत कर, अपनी खुद की कंपनी शुरू की। जिसका टर्नओवर आज 10 करोड़ रुपए है।

वक्त कभी एक जैसा नहीं रहता। अगर इंसान ठान ले तो खुद अपनी तकदीर तय कर सकता है। यह बात 31 वर्षीय आमिर क़ुतुब के लिए, बिल्कुल सटीक बैठती है। अलीगढ़ से ऑस्ट्रेलिया तक का आमिर का सफर, हर तरह की चुनौतियों, धैर्य, मेहनत और सफलता की कहानी (Success Story) है। आमिर कहते हैं कि “कभी भी अपनी काबिलियत से कम में संतुष्ट न हों।” 

उन्होंने आजीविका के लिए एयरपोर्ट पर सफाई करने से लेकर अखबार बाँटने तक, हर छोटा-बड़ा काम किया है और फिर 2014 में, ऑस्ट्रेलिया में अपनी कंपनी ‘एंटरप्राइज मंकी‘ लॉन्च की, जिसका अब सालाना टर्नओवर 10 करोड़ रुपए है। 

छोटे शहर के लड़के के बड़े सपने

Success Story
आमिर कुतुब अपने दोस्तों के साथ

उत्तर-प्रदेश के सहारनपुर से संबंध रखने वाले आमिर के माता-पिता, उनकी बेहतर शिक्षा के लिए अलीगढ़ चले गए। यहाँ पर आमिर ने काफी वक्त बिताया। वह कहते हैं, “अगर मेरे पिता का बस चलता तो वह मुझे डॉक्टर बनाकर ही छोड़ते।” लेकिन आमिर ने एमबीबीएस नहीं की और मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने लगे। हालांकि, वह अपना करियर इसमें भी नहीं बनाना चाहते थे। 

वह कहते हैं कि उनमें अपने कोर्स के प्रति कोई लगाव नहीं था, जिस वजह से उनके नंबर कम आने लगे। कोर्स में उनकी दिलचस्पी भी कम होती जा रही थी। यह वह समय था, जब उनके कॉलेज के एक प्रोफेसर ने उनसे कहा कि वह जीवन में कुछ नहीं कर पाएंगे। उस पल को याद करते हुए वह बताते हैं, “प्रोफेसर ने मुझे क्लास में सबके सामने खड़ा किया और कहा कि मैं जिंदगी में कुछ नहीं कर पाऊंगा क्योंकि, मेरे ग्रेड्स बहुत ख़राब थे। उस पल मैं टूट गया। मेरा आत्म-विश्वास बिल्कुल ही गिरता जा रहा था और मुझे अपने चारों ओर, सब खत्म होता नजर आ रहा था।”

लेकिन, जिंदगी आगे बढ़ती रही और आमिर भी आगे बढ़े। कॉलेज के अलग-अलग इवेंट में वह भाग लेने लगे और यहाँ उनका आत्मविश्वास, एक बार फिर बढ़ने लगा। वह कहते हैं कि उन्होंने वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लिया और जीतने लगे। उन्हें पुरस्कार देने वाले प्रोफेसर वही थे, जिन्होंने उन्हें भरी क्लास में सबके सामने डांटा था। वह आगे कहते हैं, “उस पल मुझे लगा कि शायद प्रोफेसर को मेरी खूबियों के बारे में सब पता नहीं था। तब मैंने तय किया कि मैं अपनी जिंदगी में जरूर कुछ न कुछ करूँगा क्योंकि, मैं कर सकता हूँ।”

2008 में बनाया एक सोशल नेटवर्क

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यूनिवर्सिटी के शुरूआती दिन

यह वह समय था जब ऑरकुट के अलावा, अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट लोगों के बीच लोकप्रिय हो रही थीं। आमिर अपने कॉलेज के लिए, एक सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म बनाने के विचार पर काम करने लगे। लेकिन मैकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र होने के कारण, उन्हें किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। वह कहते हैं कि उनसे हमेशा पूछा जाता था कि एक मैकेनिकल इंजीनियरिंग का छात्र, प्रोग्रामिंग करने और सोशल नेटवर्किंग साइट बनाने की कोशिश क्यों कर रहा है? लेकिन, उन्होंने इसे चुनौती की तरह लिया और चार महीने तक इस पर काम किया। 

इसके लॉन्च के बाद साल 2008 में, उनकी सोशल नेटवर्किंग साइट पर पहले हफ्ते में ही लगभग 10 हजार सदस्य साइन अप कर चुके थे। थोड़ा और वक्त बीतने पर यह संख्या 50 हजार तक पहुँच गयी। वह कहते हैं, “मुझे तब अहसास हुआ कि मुझे समस्या को हल करने के लिए, तकनीक का इस्तेमाल करना सबसे ज्यादा पसंद है।” लेकिन ऐसी क्या बात थी जिसने उनका हौसला बनाये रखा? इस पर वह कहते हैं, “मैं पहले से ही असफल था और मेरे पास खोने के लिए और कुछ नहीं था। अगर यह काम हो गया तो बहुत अच्छा और यदि नहीं! तो भी मैं उसी जगह पर रहता।” 

आमिर ने 2012 में ग्रेटर नोएडा में होंडा में काम किया, ग्रैजुएशन होने के बाद, यह उनकी पहली नौकरी थी। उन्होंने लगभग एक साल तक, एक प्रोडक्शन इंजीनियर के रूप में काम किया और यहीं पर उन्हें एहसास हुआ कि वह 9 से 5 की नौकरी करने के लिए नहीं बने हैं। वह कहते हैं, “मैंने यह नौकरी घरवालों की ख़ुशी के लिए की थी। लेकिन यह वह काम नहीं था, जिसे मैं करना चाहता था।” उन्हें लगा जैसे उनकी प्रतिभा और जुनून, दोनों बेकार हो रहे हैं। आमिर कहते हैं कि उन्हें पता था कि वह एक उद्यमी बनना चाहते हैं।

23 साल की उम्र में आमिर ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी और उस समय उन्हें यह नहीं पता था कि वह आगे क्या करेंगे। लेकिन, वह कहते हैं कि उस वक्त उन्होंने खुद को ‘आजाद’ महसूस किया। इसके बाद, वह वेब डिजाइनिंग के लिए फ्रीलांस (स्वतंत्र रूप से) प्रोजेक्ट करने लगे तथा उनके ज्यादातर क्लाइंट ऑस्ट्रेलिया और लंदन के थे। अतिरिक्त गतिविधियों में हिसा लेने के दौरान, उन्हें जो अनुभव प्राप्त हुए, वह यहाँ काम आए। जब वह अपने संभावित क्लाइंट को अपने आईडिया बताते थे तो अपने पिछले अनुभवों का इस्तेमाल करते थे। वह कहते हैं, “मैं मैकेनिकल इंजीनियरिंग ग्रैजुएट था और जब मैंने काम शुरू किया तो उस दौरान, किसी ने मेरी मदद नहीं की। बावजूद इसके मैं सफल हुआ क्योंकि, मैं जो कर रहा था, मुझे वह करना पसंद था।”  

पहुँच गए ऑस्ट्रेलिया

उनके एक क्लाइंट ने उन्हें ऑस्ट्रेलिया आकर काम करने का सुझाव दिया। लेकिन, आमिर ऑस्ट्रेलिया सिर्फ छात्र वीजा पर जा सकते थे। इसलिए, उन्होंने एमबीए के लिए अप्लाई किया और उन्हें एक आंशिक छात्रवृत्ति मिल गई थी। वह कहते हैं, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं ऑस्ट्रेलिया जाऊंगा। यह जीवन में पहली बार था, जब मैं हवाई जाहज में बैठा था। इससे पहले मैंने उन्हें बस आसमान में ही देखा था। मैं खुशकिस्मत था, जो पहले साल में मेरे पिता जी और बहन ने मेरी आर्थिक मदद की।”

वह कहते हैं, “मैं ऑस्ट्रेलिया में जिन भारतीयों से शुरू में मिला, वे सभी अपने आप में हर तरह से योग्य थे, लेकिन फिर भी, पेट्रोल पंप पर काम करना या टैक्सी चलाने जैसे काम कर रहे थे। यह देखना मेरे लिए निराशाजनक था। क्योंकि मैं लाखों सपने लेकर ऑस्ट्रेलिया आया था।” शुरुआत में सब कुछ चुनौतीपूर्ण था – यहाँ की बोली, उनका उच्चारण (एक्सेंट) और बाकी सब कुछ, जिससे वे उस वक्त घिरे हुए थे। यहाँ तक कि उन्हें कॉफी ऑर्डर करने जैसा सरल काम भी मुश्किल लग रहा था। 

वह कहते हैं, “लेकिन मुझे विश्वास था कि मुझे कोई नौकरी मिल जाएगी क्योंकि, मैंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की हुई थी।” लेकिन हकीकत बहुत अलग थी। लगभग चार महीनों तक, आमिर विभिन्न कंपनियों और पदों पर आवेदन करते रहे लेकिन, कहीं भी नौकरी नहीं मिली। वह कहते हैं कि उन्हें 150 से ज्यादा रिजेक्शन (अस्वीकृति) मिले हैं। इन सबके साथ, उनकी कॉलेज फीस, बिल और खुद का खर्च, सबकुछ बढ़ रहा था। ऐसे में, उन्होंने सफाई करने का काम कर लिया। 

वह कहते हैं, “एयरपोर्ट पर, मुझे एक क्लीनर के रूप में नौकरी मिली। भारत में कभी अपना खुद का कचरा भी साफ़ नहीं किया था और यहाँ पूरे एयरपोर्ट के कचरे के डिब्बे साफ करने पड़ते थे।” लेकिन इस अनुभव ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया। उन्होंने हर तरह के काम का सम्मान करना सीखा। इसके साथ ही, आमिर ने एक रात की नौकरी भी की, जो रात 2 बजे से सुबह 7 बजे तक थी। इसमें वह आस-पास के इलाके में अख़बार बांटते थे। 

वह कहते हैं, “यह मुश्किल था- दो नौकरियां, मेरा एमबीए कोर्स और अपने बिजनेस को स्थापित करने की कोशिश, सबकुछ मैं साथ ही कर रहा था।” खुद के लिए उनके पास सिर्फ तीन घंटे बचते थे और यह सब एक साल तक चला। आखिरकार, आमिर ने आईसीटी जिलॉन्ग (ICT Geelong) में इंटर्नशिप हासिल कर ली और वहाँ उन्हें एक हफ्ते के काम के बाद ही, पक्का कर दिया गया। वह कहते हैं कि यह पहचान मिलना, उनके लिए अद्भुत अहसास था और बहुत बड़ी बात थी। अगले दो साल में ही, आमिर वहाँ पर जनरल मैनेजर के पद पर आ गए। मात्र 25 साल की उम्र में वे खुद से दुगुनी उम्र के लोगों को मैनेज कर रहे थे। तब उन्हें लगा कि अब उन्होंने कुछ हासिल किया है। यहाँ वे एक युवा भारतीय अप्रवासी थे, जो ऑस्ट्रेलिया में अपनी एक पहचान बना रहे थे। 

2000 डॉलर और ढेर सारे सपने

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2014 में, आईसीटी जिलॉन्ग में काम करते हुए, आमिर ने अपना उद्यम- ‘एंटरप्राइज मंकी प्रोपराइटर लिमिटेड’ को पंजीकृत कराया, जो एक वेब और ऐप डेवलपमेंट कंपनी है। आज उनकी कंपनी की उपस्थिति चार देशों में है। दो हजार डॉलर के शुरुआती निवेश के साथ, उन्होंने अपने गैरेज से काम शुरू किया था। वह कहते हैं, “यह बिल्कुल भी आसान नहीं था, मुझे याद है कि मैं बस और रेलवे स्टेशनों पर अपने कार्ड बांटता था और जो भी मुझे मिलता, मैं उसे अपनी कंपनी के बारे में बताता था। लगभग चार महीनों के बाद, मुझे एक व्यक्ति मिला, जिसने कम से कम मुझे अपनी योजना समझाने के लिए, अपना कुछ समय दिया।” अपने पहले ग्राहक के बाद उन्हें और ग्राहक मिलने लगे क्योंकि, लोग उनके काम के बारे में बात कर रहे थे। यह आमिर का दृढ़ संकल्प था, जिससे वह आगे बढ़ते रहे। 

आज, यह कंपनी वर्चुअल रियलिटी और ऑगमेंटेड रियलिटी तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कुछ बड़े निगमों की सेवा में भी है और अब आमिर के पास यह सब करने के लिए पर्याप्त पूंजी है। वह अब सक्रिय रूप से निवेश करने के लिए, कंपनियों की तलाश में है और कहते हैं कि लगभग 6,40,000 डॉलर, उन्होंने कई छोटे स्टार्ट-अप में लगाए है।

दर्द निवारक (पेनकिलर) या विटामिन

एक कंपनी या स्टार्ट-अप का मूल्यांकन करने में, जहाँ वह निवेश कर सकते हैं, यह देखते हैं कि वह कंपनी किसी पेनकिलर के रूप में काम करती है या विटामिन के रूप में। वह बताते हैं, “आजकल आइडिया/तरकीबों की कोई कमी नहीं हैं लेकिन, मैं यह पता लगाने की कोशिश करता हूँ कि क्या यह तरकीब किसी समस्या को हल कर सकती है या सिर्फ अच्छा महसूस कराती है। मैं पेनकिलर की तलाश में हूँ न की विटामिन के एक डोज की।” वह उस टीम को भी जरूरी समझते हैं, जो न सिर्फ इन विचारों पर काम करती है बल्कि इन्हें सही तरीके से पूरा करने में, एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। 

अब तक, आमिर आठ स्टार्टअप में निवेश कर चुके हैं, हर एक स्टार्टअप में उन्होंने 80 हजार डॉलर तक निवेश किए हैं। अब वह और सात स्टार्ट-अप में निवेश करना चाह रहे हैं। इन सात स्टार्टअप में, वह हर एक में 50 हजार डॉलर से 100 हजार डॉलर तक फंडिंग देंगे। वह कहते हैं कि जरूरी नहीं कि हर एक स्टार्टअप अच्छा ही काम करें, कुछ असफल भी हो जाते हैं। इसलिए, एक इन्वेस्टर होना जोखिम भरा काम है। 

उनके द्वारा किए गए अब तक के सभी निवेश ऑस्ट्रेलिया में हुए हैं। लेकिन, अब वह भारत के टियर 2 और 3 शहरों में निवेश करने के मौके ढूंढ रहे हैं। वह कहते हैं, “मुझे यहाँ बहुत सी अनकही संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। भारतीयों के पास बेहतरीन विचार और व्यावसायिक योजनाएँ हैं।” 

महत्वपूर्ण सीख

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मिली हैं सराहना और पुरस्कार

*दूसरों की न सुनें: अक्सर जो लोग आपकी चिंता करते हैं जैसे- माता-पिता, शिक्षक, वे एक अलग पीढ़ी से हैं और जरूरी नहीं कि वे आपकी वास्तविकता और अन्य व्यावसायिक पहलुओं को समझें।

*आपको जिसमें विश्वास है, वही करें: अगर आप अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, दिल से मेहनत करते हैं तो आप इसे जरूर हासिल करते हैं। 

*लोकप्रिय रुझानों (पॉपुलर ट्रेंड) से दूर रहें: आप अपनी जिंदगी के साथ क्या करना चाहते हैं, इसके लिए बाहरी चीजों को देखने की बजाय अपने अंदर झांके। 

*असफलताओं से डरे नहीं: असफलताएं ही आपकी सफलता के रास्ते खोलती हैं। 

आमिर कुतुब के साथ रैपिड फायर:

*भारत की ऐसी कौन सी चीज है जो आप याद करते हैं: खाना और ‘समाचार’

*ऐसी क्या चीज है जो आप ऑस्ट्रेलिया से भारत भेजना चाहेंगे: नैतिकता, सम्मान और समानता

*एक चीज जो आप भारत के बारे में बदलना चाहेंगे: वर्ग-व्यवस्था और पद-व्यवस्था 

*सबसे असाधारण खरीद: मेरी कार (मर्सिडीज बेंज)

*ज्ञान की बात: सोच विचार के बाद, ठोस कदम उठायें। 

मूल लेख: विद्या राजा 

संपादन- जी एन झा

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निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.
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