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मदनलाल कुमावत: दिहाड़ी मजदूर से लेकर राष्ट्रपति के मेहमान बनने तक का सफर

मदनलाल की कहानी में ऐसे कई मोड़ हैं, जहां उन्होंने हार न मानते हुए मेहनत को सर्वोपरि माना।

मारे आसपास ऐसी कई कहानियां हैं, जो देखने में साधारण लगती हैं पर उन्हें सुना जाए तो वे साधारण लोगों की असाधारण कहानियां होती हैं।

यह कहानी भी एक ऐसे ही शख़्स की है, जिन्होंने महज़ चौथी कक्षा तक पढ़ाई की है लेकिन अपने काम की वजह से उन्हें राष्ट्रपति भवन में मेहमान के तौर पर रहने का मौका मिला।

कहानी किसान मदनलाल कुमावत की है, जिनका जन्म 1965 में बालमुकुंदपुरा में हुआ, जो जयपुर के बगरू क्षेत्र के पास एक गांव है। पिता के पास 3 बीघा कृषि भूमि होने के कारण उनके पिता को घर चलाने के लिए दूसरों के खेत में काम करना पड़ता था।

मदनलाल ने द बेटर इंडिया को बताया, “शुरूआत में रोजगार के लिए मैंने कारपेंटर का काम किया। काम के सिलसिले में बगरू आ गया, जहां मैंने 4 साल तक बालूराम बावरिया के यहां काम किया। जहां कारपेंटर का काम कर रहा था, वहां कैलाश जी जांगिड़ का आना जाना था, जो थ्रेसर बनाने का वर्कशॉप चलाते थे। कारपेंटर के काम में माहिर होने के बावजूद मैंने इस नए काम को सीखने की ठानी।”

राजस्थान में शुरू किया थ्रेसर बनाना

उस वक़्त तक पंजाब से लाकर राजस्थान में थ्रेसर बेचे जा रहे थे। राजस्थान में थ्रेसर बनाने का काम नहीं होता था। 1990 में उन्होंने अपने गुरु की मदद से यहां थ्रेसर बनाने का काम शुरू किया। एक समय ऐसा भी आया, जब थ्रेसर को पूरी तरह बनाने में उन्हें कामयाबी मिली।

मदनलाल कुमावत

मदनलाल बताते हैं,“पहले पहल थ्रेसर में लगने वाले बैलेंस वगैरह ढलाई के नहीं आते थे। इंजन के व्हील पर बैलेंस व्हील लगाया जाता था। यहीं से मेरे जीवन को नई दिशा मिली। थ्रेसर बनाने के काम को पूरा कर जब व्हील चलाया गया तो हवा बनने लगी। गुरुजी बोले, ‘देखो कितनी हवा बन रही है! क्या तुम इस हवा को कम कर सकते हो?’

थ्रेसर में अनाज निकालने के पहले और बाद में हवा का इंतजार करना पड़ता था। अब नए काम में, इस हवा को कंट्रोल करके इस छलनी में ही दे देते हैं। हवा को कंट्रोल करते हुए उस छलनी में लगा दिया। ऐसा करने पर थ्रेसर में 80% तक सुधार हुआ है। फिर 2-3 किसानों ने मशीनों में अनाज साफ न होने और कचरा आने की शिकायत की। एक दिन किसान के साथ उनके खेत पर जाकर वस्तुस्थिति को अपनी आंखों से देखा और समझने का प्रयास किया। फिर क्या था! वर्कशॉप आकर समस्या का निदान कर दिया।”

मदनलाल की कहानी में ऐसे कई मोड़ हैं, जहां उन्होंने हार न मानते हुए मेहनत को सर्वोपरि माना। जब उन्होंने थ्रेसर का काम सीखना शुरू किया, तब उन्हें रोज़ 16 रूपये मिलते थे। अब उन्हें मेहनताने के रूप में 140 रुपये रोज़ मिलने लग गए थे।

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खुद का वर्कशॉप लगाया

1990 से 1997 तक काम सीखने के बाद सीकर जिले के दांतारामगढ़ गांव को कार्यस्थली के रूप में चुनते हुए उन्होंने ‛शिवशंकर मदनलाल कृषि यंत्र उद्योग’ के नाम से खुद के वर्कशॉप की स्थापना की।

यह वह दौर था, जब किसानों को अलग अलग फसलों के लिए थ्रेसर का इस्तेमाल करने पर बार बार जालियों को बदलवाने के लिए मिस्त्रियों के पास जाना पड़ता था, जिससे समय बर्बाद होता था, मिस्त्री पर भी निर्भरता बनी रहती थी।

मदनलाल के मन में किसानों के लिए कुछ करने की चाह थी। वर्कशॉप में अनाज निकालने के इस थ्रेसर में सुधार का उन्होंने मन बना लिया। काफ़ी सुधारों के बाद उन्हें एक ही थ्रेसर में सभी फसलों के लिए काम में आने वाली जालियां लगाने में सफलता मिल गई। उनके इस आईडिया से उस समय के काश्तकारों को काफी फायदा मिला।

थ्रेसर में खास क्या?

पहले के दौर में अलग अलग फसलों के लिए थ्रेसर में अलग अलग जालियां होती थीं, जिसे बार बार मिस्त्री की मदद से लगाया और बदला जाता था। थ्रेसर में अनाज के लिये अलग, दलहन के लिए अलग और मूंगफली के लिए तो बिल्कुल ही अलग जालियों का इस्तेमाल होता था।

मदनलाल ने ऐसी तकनीक विकसित की जिसमें एक ही थ्रेसर से सारे काम किये जा सकें। थ्रेसर में अलग-अलग फसलों में रूटर की गति अलग होती है। ड्रम में जो जालियां लगती हैं, वे भी अलग-अलग होती हैं। उन्होंने विभिन्न किस्म की जालियों को एक ही थ्रेसर में लगाते हुए ऐसा फोल्डिंग सिस्टम बनाया की किसान 5 मिनट में किसी भी जाली को निकालकर दूसरी जाली खुद ही फिट कर सकता है। मज़े की बात, सभी जालियां मशीन में ही रहती हैं। अब बार-बार मिस्त्री से बदलवाने के लिए जाने और समय की बर्बादी से छुटकारा मिल गया है।

ट्रेक्टर को जेसीबी बनाया

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उनके पास गांव का एक व्यक्ति आया जिसने बताया कि उनके पास एक ट्रेक्टर बेकार पड़ा है, जिसे बेचने पर भी कुछ खास रकम नहीं मिलेगी। वे इस पर अपनी बुद्धिमत्ता से कुछ जुगाड़ कर दें तो बेहतर हो।

उन्होंने ट्रेक्टर में जेसीबी बनाने में कामयाबी हासिल की। उनका यह नवाचार भी ख़ूब सराहा गया। पहले 1998 के एक ट्रेक्टर पर उन्होंने जेसीबी बनाई, सफ़ल होने पर कुछ और लोगों के ऐसे ही आर्डर भी उनके पास आए। इस काम में साढ़े तीन से पौने चार लाख रुपए खर्च आता है, जबकि कंपनियों द्वारा बनाए ऐसे ही मॉडल की कीमत लगभग साढ़े 13 लाख तक (कम या ज्यादा) होती है। एक ट्रॉली में 150 फुट मिट्टी आती है, उनके द्वारा बनाई गई जेसीबी से ट्रॉली भरने में मात्र 15 रुपए का खर्च आता है।

नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने बदली ज़िंदगी

इसी बीच उनकी मुलाकात सुंडाराम वर्मा से हुई, जो ‛हनी बी नेटवर्क’ के सहयोगी थे और उनके जैसे ज़मीनी खोजकर्ताओं को मंच दिलवाने में मदद करते थे। यही से ‛हनी बी नेटवर्क’ और ‛नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन’ से उनका जुड़ना हुआ, जिसने आगे चलकर उनके जीवन में अहम बदलाव लाया।

1999 में ‛नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन’ की टीम उनके बनाए थ्रेसर की खासियत जानने पहुंची, जिसे उन्होंने गलत जवाब देकर लौटा दिया। उन्हें डर था कि कहीं कोई उन्हें फंसा न दे!

टीम अगले साल फिर आई। इस बार मदनलाल ने उन्हें अपने थ्रेसर की खासियत खुद न बताते हुए किसानों से पूछने को कहा। टीम कुछ किसानों से मिली, परिणाम सुखद रहा और वर्ष 2000 में राष्ट्रपति ने उन्हें सम्मानित किया।

राष्ट्रपति के बने मेहमान 

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की ‛इन रेसिडेंस स्कॉलरशिप’ के लिए पूरे देश से चुने गए 11 नवाचारियों में कुमावत भी शामिल रहे। इसके बाद गत वर्ष मार्च में गुजरात के गांधीनगर, ग्राम भारती में एनआईएफ की ओर से आयोजित “FESTIVAL OF INNOVATION AND ENTREPRENEURSHIP” में चयनित 11 इन्नोवेटर्स को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति का मेहमान बनाया गया था। इस तरह एक चौथी पास किसान राष्ट्रपति का मेहमान बन गया।

फोर्ब्स मैगज़ीन ने भी दिया सम्मान

आईआईएम-अहमदाबाद के प्रोफेसर और भारत में हनी-बी नेटवर्क के संस्थापक अनिल गुप्ता ने फोर्ब्स पत्रिका में एक संकलन के लिए भारत के सात सबसे शक्तिशाली ग्रामीण उद्यमियों का चयन किया। फोर्ब्स ने 7 सबसे शक्तिशाली ग्रामीण भारतीयों की सूची जारी करते हुए उन्हें सम्मान दिया।फ़ोर्ब्स ने इनके द्वारा बनाए गए थ्रेसर को 7 लो कॉस्ट रूरल टेक्नोलॉजी में शामिल किया।

मदनलाल की कहानी यह साबित करती है कि यदि आप हौसले और मेहनत से अपना काम करें, तो कामयाबी एक दिन आपके कदम ज़रूर चूमती है। ऐसे अनमोल इंडियन को द बेटर इंडिया का सलाम!

मदन लाल कुमावत से बात करने के लिए आप उन्हें  09413162395 पर कॉल कर सकते हैं या
shivshankarosian@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।
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Written by मोईनुद्दीन चिश्ती

देशभर के 250 से ज्यादा प्रकाशनों में 6500 से ज्यादा लेख लिख चुके चिश्ती 22 सालों से पत्रकारिता में हैं। 2012 से वे कृषि, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर कलम चला रहे हैं। अब तक उनकी 10 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पर्यावरण संरक्षण पर लिखी उनकी एक पुस्तक का लोकार्पण संसद भवन में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के हाथों हो चुका है।

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