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राजस्थान: किसान की अनोखी तकनीक, सिर्फ एक लीटर पानी से मिलेगी पौधे को ताउम्र ज़िंदगी!

यह विधि कम वर्षा वाले क्षेत्रों विशेषकर राजस्थान व अन्य सीमावर्ती राज्यों में पेड़ लगाने के लिए वरदान साबित हो सकती है।

म सभी ने जीवन में एकाध बार पौधा तो अवश्य ही लगाया होगा और हममें से कई उसकी देखभाल भी करते हैं। कई लोग दिन में एक बार, तो कई लोग सुबह शाम पानी देकर अपने पौधे को जल्दी बड़ा करने की कोशिश करते हैं।

लेकिन क्या आपको पता है कि पौधा लगाते वक्त सिर्फ एक लीटर पानी से आप उस पौधे को पूरी ज़िदंगी की खुराक दे सकते हैं? राजस्थान के एक प्रगतिशील किसान ने एक ऐसी विधि विकसित की है, जिसमें वनीय पौधे को उगाने के लिए आपको अपने पूरे जीवन में केवल एक लीटर पानी ही देना होगा। है न आश्चर्यचकित करने वाली बात!!

राजस्थान का अर्द्धमरूस्थलीय क्षेत्र, जहां वार्षिक वर्षा 25 सेमी से अधिक होती है वहां पेड़ लगाने की एक ऐसी ही तकनीक विकसित की गई है। इस तकनीक के ज़रिए पौधे को अपने पूरे जीवनकाल में केवल 1 लीटर पानी की आवश्यकता होती है वो भी सिर्फ उसे लगाते वक्त। मतलब समय, मेहनत और पानी तीनों की महाबचत।

सुंडाराम वर्मा

सीकर जिले के दांतारामगढ़ गांव में रहने वाले और विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित प्रगतिशील किसान सुंडाराम वर्मा, ‛द बेटर इंडिया’ को अपनी शोध विधि के बारे में बताते हुए कहते हैं, “बरसात का जो पानी भूमि पर गिरता है, उसे भूमि द्वारा सोख लिया जाता है। सूर्य की किरणों, भूमिगत रिसाव, खरपतवार, केशिका नली सिद्वांत (capillary tube) द्वारा उस पानी को नुकसान पहुंचता है। यदि हम पौधे को भूमि की ऊपरी सतह से 30 सेमी या उससे गहरा लगाएं तो केवल खरपतवार व केशिका नली ही मुख्य कारण रहते हैं जिनसे भूमिगत जल बाहर आ जाता है। यदि इन दोनों कारणों को हटा दें तो भूमि में इतना पानी मौजूद रहता है, जिससे किसी भी वनीय पौधे को पनपने के लिए आवश्यक जलपूर्ति हो जाती है।”

पौधे लगाने के लिए भूमि को यूं तैयार करें

जिस स्थान पर पौधे लगाए जाने हों, उस जगह पर मानसून की पहली बारिश के 6 से 7 दिन के बाद एक गहरी जुताई की जाती है। इस जुताई से खेत में उगी हुई खरपतवार नष्ट हो जाती है। अब ट्रैक्टर, बैल, हाथ या अन्य तरीकों से खेत की जुताई 20-25 सेमी गहराई तक की जाती है ताकि भूमि की ऊपरी सतह की कैपिलरीज टूट जाए और खेत खरपतवार से मुक्त हो जाए।

यह प्रकिया अपनाने के बाद मानसून के दौरान भूमि द्वारा अधिकांश पानी सोख लिया जाता है। जैसे ही मानसून समाप्त होने की स्थिति आती है, अगस्त के अंत या सितम्बर की शुरुआत में एक और गहरी जुताई की जाती है जिससे बची हुई खरपतवार नष्ट हो जाती है। 20 से 25 सेमी गहराई तक जुताई हो जाने के कारण भूमि की ऊपरी परत कैपिलरीज टूट जाती है, लेकिन जुताई के बाद भी 20-25 सेमी के नीचे की कैपिलरीज चालू रहती है। परिणाम यह होता है कि भूमिगत जल जो कैपलरिज द्वारा बाहर आता है, वह 20-25 सेमी नीचे आकर रुक जाता है।

यूं लगाएं पौधे


दूसरी जुताई के बाद पौधे लगाने वाली जगह को चिन्हित किया जाता है। पौधे को बीच में रखकर पानी से तर कर दिया जाता है। चिन्हित स्थान पर 15‘15‘45 सेमी का गहरा गड्ढा खोदकर, बिना गड्ढे की मिट्टी में से, पानी का नुकसान किए बगैर तुरंत पौधा लगा दिया जाता है। पौधा लगाने के बाद 1 लीटर पानी में 1 एमएल कीटनाशी दवा मिलाकर पौधे की सिंचाई की जाती है और फिर 7-8 दिन बाद खुरपी से हल्की गुड़ाई की जाती है। यहीं से पौधे को सदा के लिए प्रकृति पर छोड़ दिया जाता है।

पहले साल में तीन बार 15 सेमी गहरी निराई-गुड़ाई करते हैं। दूसरे साल में 2 बार यह प्रक्रिया अपनाई जाती है, इसके बाद इसकी कोई आवश्यकता नहीं रहती। इसके साथ दलहनी व आगे कोई भी फसल बोई जा सकती है।

 

इस विधि का महत्व क्यों है?

सुंडाराम बताते हैं, “जैसा कि हम सभी जानते हैं कि राजस्थान में पेड़ लगाने की बात तो दूर, कई स्थानों पर तो पीने का पानी भी मुश्किल से मिलता है। ऐसे में यह विधि कम वर्षा वाले क्षेत्रों विशेषकर राजस्थान व अन्य सीमावर्ती राज्यों में पेड़ लगाने के लिए वरदान साबित हो सकती है। शुष्क वानिकीकरण से पर्यावरण में सुधार, वर्षा में बढ़ोतरी हो सकती है।

शुष्क राजस्थान में वर्षा में लगातार कमी हो रही है, जिसका एकमात्र कारण वृक्षों की संख्या में कमी होना है। पूरे देश में केवल जैसलमेर में वर्षा में बढ़ोतरी हुई है क्योंकि वहां नहर के कारण अधिक वृक्षारोपण हुआ है। अतः नग्न पड़ी पहाड़ियों, खाली पड़ी भूमि तथा किसानों के खेतों में सघन वृक्षारोपण कर वर्षा में बढ़ोतरी की जा सकती है। अकाल के समाधान का यही एकमात्र स्थाई समाधान है। इस कार्य में शुष्क विधि अत्यंत महत्वपूर्ण एवं क्रांतिकारी भूमिका अदा कर सकती है।”

परम्परागत विधि के मुकाबले यह विधि काफी सस्ती है और इसमें पौधों के पनपने की दर 80% तक रहती है। इस विधि से अरडू, बेर, शीशम, खेजड़ी, सफेदा, बबूल जैसी प्रजाति के हजारों पौधे लगाए जा चुके हैं, इनकी पैदावार भी बहुत अच्छी होती है। राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, वन विभाग, वन अनुसंधान संस्थान, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा इस विधि का परीक्षण और अध्ययन किया जा चुका है। मुख्यमंत्री और मंत्रियों के अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के दो महानिदेशक, कृषि विश्वविद्यालयों के 6 कुलपतियों, कई संस्थानों के निदेशकों व वरिष्ठ वैज्ञानिकों, पांच प्रधान मुख्य वन संरक्षक एंव अनेक वरिष्ठ अधिकारी इस विधि को देख चुके हैं।

 

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

जोधपुर स्थित केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के हाइड्रोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राजेश कुमार गोयल कहते हैं, “सुंडाराम जी की यह विधि तकनीकी रूप से बहुत कारगर होने के साथ ही जल बचाने का एक उत्तम तरीका भी है। वृक्षारोपण में इसे इस्तेमाल किया जाना चाहिए।”

सुंडाराम ने सिर्फ एक लीटर पानी वाली तकनीक का ही विकास नहीं किया, बल्कि वह जांबाज़ योद्धा की भांति दिन-रात शोधकार्य में जुटे रहे। उनके खाते में कई नवाचार और शोध दर्ज हैं। चूंकि वह शिक्षित और परंपरागत किसान परिवार से आते हैं इसलिए उन्होंने अपनी शिक्षा का इस्तेमाल किसानों को खेती करने के दौरान आ रही तकलीफों को दूर करने के लिए किया। वह विज्ञान विषय में स्नातक हैं।

उनके द्वारा विकसित की गई ग्वार की ‛एसआर-23’ किस्म सीधी बढ़ने वाली और मध्यम समय में तैयार होने वाली एक किस्म है, जिसकी हर पत्ती पर फूल एवं फलिया होती हैं। हर पत्ती पर फलने के कारण इसकी पैदावार भी अधिक होती है। ‛नेशनल कोर्डिनेटड ट्रायल 2010’ में इसमें गोंद की मात्रा पूरे देश की सभी क़िस्मों से अधिक पायी गई थी।

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सुंडाराम बताते हैं, “इस किस्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मौसम के अनुसार अपने आप को ढाल लेती है। यदि बुवाई के बाद केवल एक बार वर्षा का दौर होता है तो पैदावार 8-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। दो बार वर्षा होती है तो पैदावार 10-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है और तीन बार वर्षा होती है तो 15-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार होती है। राजस्थान के अलावा हरियाणा, पंजाब, गुजरात, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु के किसानों ने मेरे खेत से इस उन्नत किस्म का बीज ले जाकर अपने खेतों में बोया, जिससे उन्हें बहुत अच्छी पैदावार प्राप्त हुई।”

 

सृस्टि फार्मर के तौर पर भी पहचान

देशभर में अपने-अपने क्षेत्रों में नए नवाचार करने वाले किसानों के तकनीकी ज्ञान का संकलन ‛हनी बी नेटवर्क’ द्वारा किया जाता है। ‛सृस्टि’ (SRISTI – Society for Research and Initiatives for Sustainable Technologies and Institutions) द्वारा उस तकनीक का मूल्यांकन कर उसकी नवीनता को सक्षम तकनीकी संस्थानों एवं अन्य किसानों में फैलाया एवं प्रचार प्रसार किया जाता है। इस प्रकार किसान सृस्टि से जुड़ जाता है। ऐसे किसान को सृस्टि फार्मर कहा जाता है।

सुंडाराम ने हनी बी नेटवर्क के सहयोगी के रूप में नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की सहायता से राजस्थान के अन्य नवाचारों की खोजों को एनआईएफ़ तक पहुंचाया जिसके मूल्यांकन के बाद कई शोधकर्ताओं को राष्ट्रीय मंच मिला। इसके अलावा सृस्टि, ज्ञान, हनी बी नेटवर्क एवं नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन के संस्थापक प्रो. अनिल गुप्ता के साथ उनका गहरा जुड़ाव रहा और उनके साथ रहकर उन्होंने कार्य किया।

राजस्थान के किसानों में नवाचार करने वाले नवाचारियों की खोज के लिए सृस्टि के सहयोग से साल 1995 में जयपुर में एक कार्यशाला प्रो. अनिल गुप्ता के निर्देशन में आयोजित की गई, जिसमें सुंडाराम ने भी सहभागिता की। उन्होंने एक लीटर पानी से वृक्षारोपण तकनीक एवं अधिक कलर वैल्यू वाली मिर्च के बारे में उन्होंने जानकारी दी। इन तकनीकों को सृस्टि ने देश-विदेश तक पहुंचाया। इसी से प्रभावित होकर उन्होंने अन्य तकनीकों एवं फसलों की अनेक किस्में तैयार की। इस प्रकार सृस्टि फार्मर के रूप में पहचान हुई, साथ ही हनी बी नेटवर्क के सहयोगी के रूप में भी उन्होंने पहचान बनाई। उन्होंने नेटवर्क के सहयोगी के रूप में राजस्थान में काम भी किया।

उन्हें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा दिए जाने वाला पहला ‛जगजीवनराम अभिनव किसान पुरस्कार’ भी मिला, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

इससे पहले पुरस्कार ‛कृषि पंडित’ नाम से दिया जाता था, जो 5000 रुपए का पुरस्कार था। ये पुरस्कार प्रगतिशील किसानों को मिलते थे, जो वैज्ञानिक तकनीकियों का उपयोग कर अपनी आमदनी बढ़ाते थे।जगजीवनराम अभिनव किसान पुरस्कार उस किसान को दिया जाना शुरू हुआ जो स्वयं अपनी तकनीक विकसित करते और बाद में किसानों और वैज्ञानिकों को बताते। जब एक सामान्य वैज्ञानिक को 4-5 हजार रुपये ही मासिक मिलते थे, उस समय वर्ष 1997 में उन्हें मिला 1 लाख रुपये का यह पुरस्कार जो वैज्ञानिक स्तर का बहुत ही गौरवशाली सम्मान था।

 

15 फसलों की 700 प्रजातियां भी सहेजी

प्रगतिशील किसान सुंडाराम ने राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (National Beauro of Plant Genetic Resorces) के लिए 15 फसलों की 700 से अधिक प्रजातियों का भी संकलन किया है, जिसमें लहसुन की 16, प्याज की 10, ग्वार की 150, तिल की 12, मूंग की 17, गोभी की 12, मेथी की 16, चना की 19, बाजरा की 154, धनिया की 35, जीरा की 105, मिर्च की 110, काबुली चना की 4, मोठ की 31 और चंवले की 14 किस्में शामिल हैं। इनमें 154 किस्में, बाजरा के राष्ट्रीय समन्वयक होने के नाते और 197 विभिन्न फसलों की किस्में, सीधे राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो में दी हैं। ये आईसी नम्बर के साथ सुंडाराम के नाम से संरक्षित हैं।

 

विश्व बौद्धिक संपदा संगठन द्वारा बुलावा

जब किसानों द्वारा यह मांग उठी कि किसानों द्वारा विकसित किस्मों का भी वैज्ञानिकों की किस्मों की तरह ही पेटेंट होना चाहिए तो यह जानना जरूरी हो गया कि क्या किसानों की तकनीकें भी पेटेंट योग्य होती हैं?

इस पर नई किस्में तैयार करने वाले किसानों के नाम मांगे गए तो सृस्टि ने सुंडाराम का नाम भेजा। ग़ज़ब की बात यह थी कि पूरी दुनिया से केवल एक किसान का ही चयन होना था। सौभाग्य से सृस्टि फार्मर के रूप में उनका चयन हुआ क्योंकि उनकी तकनीकों का स्तर पेटेंट योग्य था।

वह बताते हैं,“यह एक प्रकार का ऐसा अवार्ड है, जिसे Using Diversity Award के नाम से भी जाना जाता है। कनाडा के ओटावा शहर में एक संस्था है, जिसका नाम International Development Research Centre (IDRC) है। यह संस्था देशी फसलों की क़िस्मों (किसी भी देश की) का संकलन एवं उसका सरंक्षण करने वाली संस्थाओं एवं किसानों को Using Diversity Award देती है, ताकि देशी क़िस्मों का संरक्षण कुशलता से कर उसे अन्य किसानों के लिये उपयोगी बनाया जा सके। मुझे यह पुरस्कार वर्ष 1996 में सृस्टि फार्मर के रूप में 3.30 लाख रुपए का मिला। इसके तहत राजस्थान में बोई जाने वाली 15 प्रमुख फसलों की 700 से अधिक प्रजातियों को मैंने इकट्ठा किया था।”

इन दिनों वह कपास, गेहूं और पीली सरसों की देशी किस्मों के संवर्धन में जुटे हैं। उन्होंने कपास की एक ऐसी देशी किस्म तैयार की है, जिसको पानी की कभी भी आवश्यकता नहीं होती, यह केवल वर्षा से ही पनप जाती है। पानी की कमी में कपास के नीचे की घास सूख जाती है, जबकि कपास हरी रहती है। एक बार लगाने के बाद 20–25 वर्ष तक उपज देती रहती है। फरवरी में कटिंग करनी होती है तथा 5 वर्ष बाद 15 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होने का अनुमान है। यह किसी भी बंजर भूमि में पनप सकती है।

उनके पास पीली राई की 46 किस्में हैं, जो 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं। पीली होने के कारण उत्पादन के साथ-साथ इनमें तेल की मात्रा भी अधिक है। इनमें सबसे अच्छी दो, तीन क़िस्मों का उत्पादन के आधार पर चयन किया जाना शेष है।साथ ही उनके पास गेंहू की 90 किस्में हैं। इनमें आड़ी न गिरने वाली गुणवत्तायुक्त व अधिक उत्पादनशील क़िस्मों का चयन किया जा रहा है, जो 100 सेमी के आसपास ऊंचाई की हों। इन किस्मों के स्थिर और तैयार होने में एक या दो वर्ष का समय और लगेगा। प्रगतिशील किसान सुंडाराम वर्मा ऐसे किसानों में से हैं जो थककर बैठना पसंद नहीं करते। नित नए शोध और क़िस्मों के संवर्धन के लिए सतत प्रयासरत रहते हैं।

उनके बारे में ज्यादा जानकारी के लिए मेल आईडी sundaramverma@yahoo.co.in पर ईमेल भेजें, साथ ही आप उनके मोबाइल नंबर 09414901764 पर उनसे संपर्क कर सकते हैं। आप फेसबुक पर भी उनसे जुड़ सकते हैं।

संपादन- अर्चना गुप्ता


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Written by मोईनुद्दीन चिश्ती

देशभर के 250 से ज्यादा प्रकाशनों में 6500 से ज्यादा लेख लिख चुके चिश्ती 22 सालों से पत्रकारिता में हैं। 2012 से वे कृषि, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर कलम चला रहे हैं। अब तक उनकी 10 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पर्यावरण संरक्षण पर लिखी उनकी एक पुस्तक का लोकार्पण संसद भवन में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के हाथों हो चुका है।

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