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19 सालों से मुफ्त में सिखातीं हैं हाथ की कारीगिरी; 50,000 महिलाओं को बनाया सक्षम!

अनीता का सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि हर एक महिला के हाथ में कमाई का हुनर हो!

नीता गुप्ता मुश्किल से 8-9 साल की होंगी, जब उन्होंने अपने खुद के घर में पितृसत्ता की बेड़ियों तले औरतों के साथ अन्याय होते हुए देखा। उनकी माँ के तीन भाई थे, लेकिन तीनों की ही किशोरावस्था में मृत्यु हो गयी। इसके बाद, उनके नाना ने अपने वंश को आगे चलाये रखने के लिए एक बहुत ही गरीब घर की लड़की को खरीदा।

“उन्होंने उस लड़की को सिर्फ बेटा पैदा करने के लिए खरीदा और जब यह काम हो गया तो उस बेचारी को घर की नौकरानी की तरह रखा। सारा दिन उससे घर का काम कराते, फिर जरा-सी गलती हो जाये तो उसे बहुत मारा जाता था। उस वक़्त से ही हम सोचते थे कि अगर उसके माँ-बाप के पास पैसा होता तो वे कभी अपनी बेटी को न बेचते या फिर अगर ये कुछ कमाती होती तो भी इतना सब-कुछ न सहती,” अनीता ने कहा।

बचपन में, अनीता ने जो भी अपने घर में देखा, वहीं से उनके मन में अपने पैरों पर खड़े होने की भावना ने जन्म ले लिया था। 8 साल की अनीता ने ठान लिया था कि परिस्थितियां चाहे साथ दें या फिर विपरीत हों, लेकिन वे पढ़ेंगी-लिखेंगी और खुद अपने फैसले लेंगी।

बिहार में आरा जिले के भोजपुर में एक अच्छे-भले ज़मींदार परिवार में जन्मीं 44 वर्षीया अनीता गुप्ता, सात भाई- बहनों में पांचवें नंबर पर आती हैं। बहुत ही छोटी उम्र में उन्होंने अपने पिता को खो दिया और उनकी माँ पर सभी ज़िम्मेदारी आ गयी।

Anita Gupta, Founder of Bhojpur Mahila Kala Kendra

“घर-परिवार तो समृद्ध था पर हमारी माँ को चाचा बहुत ही मुश्किल से पैसे देते थे। उनके लिए हम छह बहनों और हमारे एक भाई को पालना किसी बोझ से कम नहीं था। इसलिए पढ़ाई-लिखाई का बात तो भूल ही जाइये। उनकी कोशिश सिर्फ इतनी थी कि जितना जल्दी हो सके, हम सबकी शादी करवा दें,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए अनीता ने बताया।

स्कूल की पढ़ाई भी अनीता ने जैसे-तैसे पूरी की। वे आगे कॉलेज में पढ़ना चाहती थीं, लेकिन रेग्युलर पढ़ना मुमकिन नहीं था तो उन्होंने डिस्टेंस से ग्रेजुएशन में दाखिला लिया। अपनी पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने हाथ के हुनर भी सीखे। क्योंकि उनका मानना था कि अगर कोई औरत पढ़ी-लिखी भी न हो, पर उसमें कोई स्किल है या फिर उसके हाथ में सिलाई-कढ़ाई, बुनाई जैसा कोई भी हुनर है, तब भी वह अपना पेट पाल सकती है।

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इसलिए, उन्होंने इधर-उधर से देखकर, खुद कुछ न कुछ करते हुए सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, डाई, जूट का काम, ज्वेलरी मेकिंग जैसे हुनर सीखे। “चाचा लोग हमारी मम्मी को जो पैसे देते थे उसमें बहुत मुश्किल से हमारा खर्च पूरा हो पाता था। इसलिए हमें लगा कि हमें भी कमाना चाहिए,” उन्होंने आगे कहा।

अनीता ने अपने आस-पड़ोस में महिलाओं को बता दिया कि वे सिलाई-कढ़ाई का काम सिखा रही हैं। अगर कोई अपनी बेटियों को सिखवाना चाहता है तो उनके पास भेज दे। लेकिन यह बात अनीता के अन्य परिवार के सदस्यों को नहीं जमी। उन्होंने उनसे तुरंत काम करने के लिए मना कर दिया और कहा कि इतने बड़े घर की बेटी कमाएगी तो लोग क्या कहेंगे?

लेकिन अनीता ने किसी की नहीं सुनी। वे अपने फैसले पर अडिग रहीं कि वे कहीं बहार जाकर नौकरी नहीं कर रही हैं। घर पर रहकर ही ट्रेनिंग देंगी महिलाओं और लड़कियों को तो हर्ज ही क्या है? फिर भी सभी परिवारजन उनके खिलाफ ही खड़े रहे। ऐसे में, उनकी माँ उनकी ताकत बनीं और उन्होंने अपनी बेटी को आगे बढ़ने की हिम्मत दी।

साल 1993 में अनीता गुप्ता ने मात्र 2 लड़कियों के साथ ‘भोजपुर महिला कला केंद्र’ की नींव रखी। उन्होंने एक बैनर पर भोजपुर महिला कला केंद्र लिखवाया और अपने घर के बाहर लगा दिया। अनीता बताती हैं कि तब उनके दिमाग में सिर्फ दो ही बातें थीं- एक तो उन्हें खुद की कमाई चाहिए थी और दूसरा, वे लड़कियों को इस तरह का काम सिखाकर, उन्हें खुद अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रेरित करना।

Giving training to women group

धीरे-धीरे उनका काम बढ़ने लगा और कब 2 से 200 लड़कियां उनके पास ट्रेनिंग के लिए आने लगीं, उन्हें खुद भी पता नहीं चला। भोजपुर और आस-पास के इलाकों से भी उनके पास लड़कियां ट्रेनिंग के लिए आती थीं। उनके केंद्र का नाम काफी मशहूर हो गया था और फिर उन्हें, जिला अधिकारियों ने ग्रामीण विकास अधिकरण के तहत गाँव की महिलाओं को जूट प्रोडक्ट्स बनाने की ट्रेनिंग करवाने का प्रोजेक्ट दिया।

अनीता आगे बताती हैं, “बस उस एक प्रोजेक्ट के बाद हमने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। क्योंकि हमारे काम से सब इतने संतुष्ट थे कि सरकार ने आगे भी अपने कई इस तरह के प्रोजेक्ट्स के लिए हमारे साथ काम किया। हमने अपनी छोटी बहन को पढ़ाया, अपने भाई को पढ़ाया-लिखाया। घर की स्थिति काफी सुधर गयी। इसके बाद, साल 2000 में हमने अपने भोजपुर महिला कला केंद्र को एक सामाजिक संगठन के तौर पर रजिस्टर कराया।”

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जब उनके अपने हालात ठीक हो गये तो अनीता ने ठान लिया कि अब वे पैसे कमाने के लिए नहीं बल्कि महिलाओं के उत्थान के लिए अपने केंद्र का इस्तेमाल करेंगी। साल 2000 से उन्होंने आरा जिले के आस-पास के गांवों में फ्री ट्रेनिंग कैंप लगाना शुरू किया। वे गाँव-गाँव जातीं और वहां पर लोगों को अपने घर की बहु-बेटियों को स्किल ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए भेजने को जागरूक करतीं।

Promotion

अनीता के मुताबिक, अब तक वे इस तरह से लगभग 50 हज़ार महिलाओं और लड़कियों को अलग-अलग स्किल्स, जैसे कि सिलाई, कढ़ाई, ज्वेलरी मेकिंग आदि की ट्रेनिंग दे चुकी हैं। उनका कहना है कि अगर इन पचास हज़ार में से 5 हज़ार महिलाओं ने भी अपने हाथ के हुनर को अपने रोज़गार का ज़रिया बनाया तो मानो कि उनकी मेहनत सफल हो गयी।

इसके अलावा, अनीता गुप्ता ने 6000 महिलाओं को हस्तशिल्प विभाग से अपना अर्टीसन कार्ड (कारीगर पहचान पत्र) बनवाने में भी मदद की है। अब इस अर्टीसन कार्ड की मदद से ये सभी महिलाएं सरकार द्वारा आयोजित होने वाले किसी भी हस्तशिल्प मेला, हाट, या फिर किसी अन्य आयोजन में बिना कोई पैसे भरे अपने प्रोडक्ट्स ले जाकर बेच सकती हैं।

साथ ही, यदि कोई भी महिला अपना का शुरू करना चाहती है तो अर्टीसन कार्ड की मदद से उन्हें सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत लोन भी आसानी से मिल जाता है।

भोजपुर महिला कला केंद्र ने लगभग 500 महिला समूह भी बनाये हुए हैं ताकि जो महिलाएं अपना काम नहीं कर सकती, उन्हें वे रोज़गार दें। इन समूहों में कुछ महिलाएं जूट का काम करती हैं, कुछ टोकरी आदि बनाती हैं तो कुछ ज्वेलरी मेकिंग से जुडी हुई हैं। अनीता बताती हैं कि इन सभी महिलाओं को प्रोडक्ट्स बनाने के लिए सामान केंद्र द्वारा दिया जाता है और फिर प्रोडक्ट बनाने के बाद वे उन्हें केंद्र भेज देती हैं।

इन कारीगर महिलाओं को प्रति प्रोडक्ट के हिसाब से पैसे दिए जाते हैं। इस तरह से अपने घर में रहते हुए भी ये महिलाएं महीने में 4 से 8 हज़ार रुपये तक की कमाई कर लेती हैं।

Some glimpses of her training and products

 

हालांकि, अनीता का इन महिलाओं को इस मुकाम तक पहुंचाने का सफर बिल्कुल भी आसान नहीं रहा। जिस तरह अपने हक के लिए वे अपने परिवार से लड़ी हैं। उसी तरह, इन महिलाओं को उनके सीखने और कमाने का हक दिलाने के लिए भी उन्होंने संघर्ष किया है।

अनीता बताती हैं कि जब भी कहीं गाँव में जाती थीं तो लोग उन विरोध करते ही थे। वह कहते थे, “देखो, आ गयी हमारे घर की बहु-बेटियों को खराब करने। अगर ये औरत सब कमाने लगेंगी तो घर में मर्द को कौन पूछेगा। हमारी तो सुनेंगी ही नहीं।”

घर के पुरुष तो पुरुष, महिलाएं भी अपनी बहु-बेटियों को बाहर भेजने से कतराती थीं। पर अनीता ने हार नहीं मानी। वे बिना डरे लोगों के घर पहुँच जातीं और उन्हें समझातीं। अपने सफ़र के बारे में बताती कि कैसे उन्होंने अपने घर-परिवार को सिर्फ हुनर के दम पर सम्भाला।

बिहार के सुदूर गांवों की औरतों को उन्होंने न सिर्फ घर की दहलीज पार करना सिखाया, बल्कि यहाँ पर सदियों से जात-पात की शिकार मुसहर तबके की महिलाओं के हाथों में कलम भी दी। एक गाँव के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “वहां पर ऊँची जाति के लोग चाहते ही नहीं थे कि जिस निचले तबके की महिलाएं उनके खेतों में काम करती हैं, वे कोई हुनर सिख कर आगे बढ़ें। उन्हें लगता था कि अगर ये अपना काम करेंगी तो फिर उनके यहाँ कौन काम करेगा। तो सबको डराते थे कि अगर तुम्हारी वो मैडम दोबारा आई तो गोली मार देंगे।”

पर जान से मारे जाने की धमकी भी अनीता को रोक नहीं पायी। बल्कि, उन्हें जब पता चला तो उन्होंने और जोर-शोर से उस गाँव में काम किया। उन्होंने वहां न सिर्फ स्किल प्रोग्राम चलाया बल्कि साक्षरता प्रोग्राम भी चलाया। “एक बार, वो औरतें हमें बतायीं कि बैंक से उनको मेनेजर ने भगा दिया कि खाता नहीं खोलेंगे। इसके बाद, हमने तीन महीने उन महिलाओं को लिखना-पढ़ना सिखाया ताकि वे अपना नाम, और अन्य ज़रूरी जानकारी खुद लिखें। इसके बाद, सभी महिलाओं को हाथ में पेन देकर बैंक भेजा कि उनसे फॉर्म मांगों और खुद अपने खाते के लिए जानकारी भरो।”

आज भोजपुर महिला कला केंद्र, उषा कंपनी के साथ मिलकर उनके 3000 सिलाई स्कूलों में औरतों को ट्रेनिंग करवा रहा है। अनीता का सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि हर एक महिला के हाथ में कमाई का हुनर हो।

उन्हें उनके कार्यों के लिए समय-समय पर सरकार और अन्य संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किया जाता रहा है। उन्हें रांची के ग्राम श्री मेला में महिला उद्यमी का सम्मान मिला, फिर वीमेन डेवलपमेंट कारपोरेशन पटना ने भी उन्हें सम्मानित किया। इसके अलावा, उन्हें ‘ब्रांड्स ऑफ़ इंडिया’ के ख़िताब से भी नवाज़ा गया है।

10 जनवरी 2020 को उन्हें दिल्ली में ‘जीजाबाई पुरस्कार’ से सम्मानित किया जायेगा। अंत में अनीता बस यही कहती हैं, “हमारा सफ़र कोई पुरस्कार जीतने के लिए शुरू नहीं हुआ था, वह लड़ाई तो हमारे अस्तित्व, हमारी पहचान के लिए थी। पर आजकल तो पढ़ाई बहुत आगे बढ़ गयी है। लोगों में जागरूकता भी है। पर फिर भी हम यही कहेंगे कि पढ़ाई के साथ-साथ स्किल पर भी फोकस करो। अगर स्किल होगी कुछ करने की, तो यकीन कीजिये हालात कैसे भी हों आप भूखे नहीं रहेंगे।”

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द बेटर इंडिया, अनीता गुप्ता के जज़्बे को सलाम करता है और हमें उम्मीद है कि हर एक महिला उनसे प्रेरणा लेगी। यदि आपको इस कहानी ने प्रभावित किया है और आप उनसे सम्पर्क करना चाहते हैं तो 9430507746 या फिर 7903737181 पर कॉल कर सकते हैं!

Summary: Anita Gupta, Hailing from Arrah, Bihar, founded the Bhojpur Mahila Kala Kendra in 1993, to empower women from small towns by providing them with education and employment training. The NGO has trained almost 50,000 women in various handicraft skills and has formed around 500 women self-help groups in Bihar. The women manufacture and sell jewelry at government-organized fairs.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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