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बंगलुरु: इस डॉक्टर के प्रयासों ने एक डंपयार्ड को बदला दादा-दादी पार्क में!

लोगों को कचरा न फेंकने के लिए समझाना बहुत ही मुश्किल काम था। अगर उन्हें रोका जाता तो वे उल्टा डॉ. अग्रवाल से ही बहस करते कि अगर यहाँ न फेंके तो कहाँ फेंके?

ठ साल पहले, डॉ. हेमंत कुमार अग्रवाल ने बंगलुरु के डोम्लूर इलाके में अपना घर बनवाना शुरू किया था। पर उनके घर की प्लॉट के एकदम सामने लगा कचरे का ढेर उनकी परेशानी का सबब बना हुआ था। वहां लोगों के लिए वह डंपयार्ड ही था और कचरे के ढेर की वजह से उस जगह पर मक्खी, मच्छर और कीट-पतंगों की भी कोई कमी नहीं थी।

डॉ. अग्रवाल ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए बताया, “मैं बहुत गुस्से में था लेकिन कुछ कर नहीं पा रहा था। वहां रह रहे दूसरे लोगों को भी परेशानी थी, लेकिन कुछ को छोड़कर कोई भी इस बारे में कुछ करना नहीं चाहता था। बाकी कुछ तो बेशर्मों की तरह वहीं अपने घर का कचरा डाल कर आते थे। मैंने उन्हें रोका और नगर निगम के अधिकारियों को भी जानकारी दी, पर कुछ नहीं हुआ।”

इस समस्या के लिए डॉ. अग्रवाल ने अकेले आठ सालों तक संघर्ष किया है। लेकिन अब से मात्र तीन साल पहले इस जगह की साफ़-सफाई का काम शुरू हुआ। यह काम भी डॉ. अग्रवाल को अपने हाथ में लेना पड़ा और इस काम में बंगलुरु के मशहूर सिविक ग्रुप, द अगली इंडियन ने उनका साथ दिया।

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कुछ एक्टिव वॉलंटियर्स के साथ मिलकर पूरे कचरे को यहाँ से हटाया गया और फिर इसे साफ़ करके एक खूबसूरत पार्क की शक्ल दी गयी। डॉ. अग्रवाल ने खुद अपने हाथों से यहाँ बीज बोये और पौधे लगाये हैं और वह इस जगह को उनका अर्बन जंगल (शहरी जंगल) कहते हैं।

एक दशक से थी यह समस्या 

“डॉ. अग्रवाल ने बहुत ही बढ़िया काम किया है,” यह कहना है छबि नारायण का, जिनके घर के बगल में यह डंपयार्ड था।

“आप सोच भी नहीं सकते परिस्थिति कितनी बुरी थी। मेरे घर के साथ वाला रोड सर्विस रोड था और बहुत कम इस्तेमाल होता था। कम ट्रैफिक की वजह से लोगों को जरा भी वक़्त नहीं लगा अपने घरों का कचरा यहाँ डालने में और देखते ही देखते यह एक अनऑफिशियल डंपयार्ड बन गया। कुछ समय बाद, BBMP के कर्मचारी और कूड़ा बीनने वाले भी इस गली को कलेक्शन सेंटर की तरह इस्तेमाल करने लगे। इससे डॉ. अग्रवाल के क्लिनिक पर आने वाले मरीजों पर भी प्रभाव पड़ा,” उन्होंने आगे बताया।

द अगली इंडियन के कोर्डीनेटर ने इस बारे में बताया, “इस जगह पर कचरे की डंपिंग शुरू होने के बाद, समस्याएं सिर्फ बढ़ी और फिर एक पॉइंट के बाद, सिर्फ कूड़ा-कचरा ही एक समस्या नहीं थी।”

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धीरे-धीरे बसों ने रातों में वहाँ पार्किंग शुरू कर दी और इसे एक अस्थायी बस स्टेशन में बदल दिया। ड्राईवर और स्टाफ ने यहीं पर नहाना और यहाँ तक कि सार्वजनिक जगहों पर ही पेशाब करना शुरू कर दिया। आधी रात को यह इलाका शराबियों और बदमाशों के घुमने की जगह हो गया था।

डॉ. अग्रवाल, वन मैन आर्मी 

The lone crusader – Dr Agarwal

अक्सर रात के 1-2 बजे भी डॉ. अग्रवाल इन लोगों को जाकर डांटते और उन्हें यहाँ से जाने के लिए कहते। लेकिन उन्हें उनके पड़ोसियों का बहुत ही कम सपोर्ट था और ज़्यादातर लोग तो इस सबसे दूर ही रहते थे।

सबसे ज्यादा कचरा तो रात को ही फेंका जाता- यहाँ रहने वाले लोग अपने घरों से कचरे से भरे पॉलीबैग्स फेंकते तो कंस्ट्रक्शन वर्कर आकर यहाँ मलबा आदि फेंक जाते। नगर निगम से इस गली की नियमित सफाई और रात में नियमित पुलिस पेट्रोलिंग के लिए लगातार अपील की गयीं, पर प्रशासन के कान तो जैसे बहरे हो गये थे।

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“वे कभी-कभार आते और डंपिंग जोन के कुछ हिस्सों को ही साफ़ करते और फिर से यहाँ पर कचरा जमा होने में वक़्त नहीं लगता। लोगों को कचरा न फेंकने के लिए समझाना बहुत ही मुश्किल काम था,” डॉ. अग्रवाल ने बताया।

लोग उनसे बहस करते कि फिर कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं है कचरा डंप करने के लिए। लोगों को यह समझ ही नहीं आता कि कचरा अच्छे से अलग-अलग करके नगर निगम के कर्मचारियों को दिया जाता है और यह उनकी ज़िम्मेदारी है कि वे इसे डंप करें। इसके अलावा, नगर निगम के पार्षदों ने शुरू में डॉ. अग्रवाल और उनके कुछ साथियों की अपील पर बहुत कम ध्यान दिया।

Attending to patients while working

द अगली इंडियंस ने की मदद

साल 2016 में डॉ. अग्रवाल की लड़ाई में उनके साथ द अगली इंडियन की टीम भी खड़ी हो गयी और फिर शुरुआत हुई बदलाव की। बंगलुरु के लोगों का यह एक अज्ञात ग्रुप है और ये लोग अपनी पहचान छिपाए रखकर शहर में पर्यावरण के मुद्दों पर काम कर रहे हैं और आम नागरिकों की मदद करते हैं।

डॉ. अग्रवाल ने बताया, “हमने एक जेसीबी किराये पर लिया और सफाई अभियान शुरू कर दिया। इस जगह से हमने लगभग 10 ट्रक भरके कचरा निकाला और फिर आखिरकार इसके नीचे की पक्की सड़क दिखने लगी।”

वॉलंटियर्स ने यहाँ पर रंगोली आदि बनाई और डॉ. अग्रवाल अपने घर से कुछ सजावट का सामान ले आये ताकि इस जगह को थोड़ा सजाया जा सके। इसके बाद स्थिति थोड़ी बदली थी, लेकिन अभी उनकी लड़ाई बाकी थी।

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डॉ. अग्रवाल ने अपने एक दोस्त से बीज लिए और उन्हें यहाँ पर खाली जगहों में बिखेर दिया। फिर अगले मानसून के बाद यहाँ पर सिर्फ हरियाली ही हरियाली थी। यहाँ की पूरी तस्वीर ही बदल गयी और फिर यहाँ रहने वालों ने ताजा हवा में सांस ली।

उन्होंने थोड़ा रिसर्च किया और ऐसे पौधों के बीज लाये, जिन्हें गाय नहीं खाती। अगर आप इस सड़क पर जायेंगे तो आपको सड़क के किनारे इन पेड़ों की एक लम्बी कतार दिखेगी।

बंगलुरु का पहला अज्जा-अज्जी पार्क (दादा-दादी पार्क)

इस बार नवनिर्वाचित नगर पार्षद लक्ष्मीनारायण सी आर ने अपना पूरा समर्थन डॉ. अग्रवाल और उनकी टीम को दिया। उन्होंने इस पूरे रोड को पक्का करवाया, स्ट्रीट लाइट लगवायीं और अब यह जगह सैर करने के लिए खुबसूरत से पार्क में तब्दील हो चुकी है।

डॉ. अग्रवाल ने इस जगह को आज्जा-आज्जी पार्क (दादा-दादी पार्क) का नाम दिया है और इसे इलाके के सभी बुजुर्गों को समर्पित किया है।

Dr Agarwal with corporator Lakshmi Narayan C R

“यह सभी के लिए है। हर दिन यहाँ माता-पिता अपने बच्चों के साथ, पालतू जानवरों के साथ और बड़े-बुजुर्ग सैर के लिए आते हैं। यह देखकर अच्छा लगता है कि कैसे एक छोटा सा प्रयास बड़ा बदलाव ला सकता है,” उन्होंने कहा।

“बंगलुरु में कभी भी सिर्फ बड़े बुजुर्गों के लिए इस तरह का कोई पार्क नहीं था। सड़कों पर भारी ट्रैफिक और फूटपाथ के खस्ता हाल के चलते, वे लोग कभी शांति से सैर के लिए भी नहीं निकल पाते। लेकिन अब हमने डोम्लुर में एक उदहारण सेट कर दिया है तो उम्मीद है कि शहर में अन्य जगह भी इस तरह के प्रयास किये जायेंगे,” द अगली इंडियन ने बताया।

दिलचस्प बात यह है कि डॉ. अग्रवाल इस इलाके में अपनी सामाजिक-पर्यावरणीय पहल के लिए प्रसिद्ध हैं। नागरिकों के बीच पर्यावरण चेतना बढ़ाने के लिए शहर में बने डॉग पार्क्स में से तीन पार्क्स उन्होंने बनाये हैं। वे रेग्युलर तौर पर बेसहारा जानवरों के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन भी करते हैं और इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनके साथ अच्छा व्यवहार हो।

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अज्जा-अज्जी पार्क की जहां तक बात है तो अभी भी छोटी-मोटी परेशानियां हैं। लोग चोरी-छिपे कूड़ा-कचरा फेंकते हैं। पार्क में आने वाले लोग भी बहुत बार यहीं पर अपने जानवरों को शौच कराते हैं। लेकिन डॉ. अग्रवाल ने इस तरह की समस्याओं को हल करने की ठानी हुई है।

हर दूसरे दिन, वे आपको पार्क की साफ़-सफाई में जुटे दिख जायेंगे। बेशक, वे सच्चे हीरो हैं और ऐसे हीरो की न सिर्फ बंगलुरु को बल्कि पूरे देश को ज़रूरत है!

मूल लेख: सायंतनी नाथ

संपादन – मानबी कटोच 

Summary: Eight years ago, when Dr Hemant Kumar Agarwal began constructing his house in Domlur, Bengaluru, he was utterly repelled by the dump-yard in front of his plot. Although he has been fighting the issue single-handedly for eight years, the restoration process escalated only in the past three years, after he collaborated with The Ugly Indian, a well-known civic group in Bengaluru. Together with a few proactive volunteers, the extensive stretch of the dump yard was cleaned up and replaced with a soothing patch of greenery. Dr. Agarwal, who sowed the seeds and saplings with his own hands, fondly refers to the park as his #UrbanJungle.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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