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दो भाइयों ने बनाई सस्ती विंड टरबाइन, अगले 20 साल के लिए पायें मुफ्त बिजली!

अरुण जॉर्ज ने अपने इस ‘मेड इन इंडिया’ विंड टरबाइन का सबसे पहला इनस्टॉलेशन भारतीय नेवी के लिए किया।

मारे देश की आबादी 130 करोड़ से ज्यादा है और इस जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आज भी गाँवों में रहता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, आज भी देश के लगभग 31 मिलियन घरों में बिजली नहीं है। जबकि भारत में ऐसे प्राकृतिक साधनों की कोई कमी नहीं है, जिनसे बिजली उत्पादन किया जा सकता है- जैसे कि धूप या फिर हवा।

सोलर उर्जा का इस्तेमाल तो फिर भी पिछले कुछ सालों में काफी हद तक बढ़ा है, लेकिन विंड एनर्जी के क्षेत्र में अभी भी बहुत कुछ होना बाकी है। भारत में हवा से उर्जा उत्पन्न करने के लिए साधनों की कोई कमी नहीं है। यदि अच्छे स्तर पर इस दिशा में काम किया जाए तो यह ग्रीन और क्लीन एनर्जी का एक बेहतर विकल्प है।

लेकिन सबसे बड़ी समस्या है हवा से बिजली उत्पादन करने वाली विंड टरबाइन की लागत और फिर उनकी क्षमता। क्योंकि विंड टरबाइन की लागत विदेशों में जहां 4 से 5 लाख रुपये जाती है तो वहीं भारत में कम से कम  2- 3 लाख रुपये तक है। इसके अलावा, इन टरबाइन को काम करने के लिए हवा की गति 3 मीटर प्रति सेकंड होनी चाहिए। इन वजहों से ये बड़ी टरबाइन घरेलू इस्तेमाल में नहीं आ पाती हैं।

इस समस्या पर काम करते हुए केरल के दो भाइयों ने छोटी विंड टरबाइन डिजाईन की, जिसे किसी भी घर पर लगाया जा सकता है और इससे उत्पादित उर्जा से घर में इस्तेमाल होने वाली बिजली की खपत को पूरा किया जा सकता है। अरुण जॉर्ज और उनके भाई, अनूप जॉर्ज ने साल 2015 में ‘अवांत गार्डे इनोवेशन्स’ कंपनी शुरू की।

Arun George and Anoop George

“देश के लिए कुछ करना है”

अरुण बताते हैं कि उनका बैकग्राउंड बिल्कुल भी इंजीनियरिंग से नहीं है, बल्कि उन्होंने तो एमबीए किया और फिर कुछ समय तक ऑस्ट्रेलिया में नौकरी भी की।

“मैं 2006 में ऑस्ट्रेलिया गया, मुझे वहां की नागरिकता भी मिल गयी, लेकिन तब भी मेरे मन में था कि मैं अपने देश वापस जाऊंगा। वहां पर जो भारतीय दोस्त थे मेरे, वे कहते थे कि यहाँ आने के बाद कोई वापस नहीं जा पाता। पर मुझे वापस आना था क्योंकि मुझे अपने देश के लिए कुछ करना था। उस समय यह तो नहीं पता था आखिर करना क्या है। लेकिन इरादा बिल्कुल पक्का था और आख़िरकार, मैं 2010 में लौट आया,” उन्होंने आगे कहा।

यहाँ लौटने के बाद साल 2013 तक उन्होंने कॉर्पोरेट सेक्टर में काम किया। लेकिन फिर उन्हें लगने लगा कि उन्हें अपना कुछ करना है। ऐसा कुछ, जिससे वे देश के लिए कुछ कर पायें। उन्हें हमेशा से ही पर्यावरण के प्रति काफी लगाव रहा। ग्रीन और क्लीन एनर्जी, ग्रीन बिल्डिंग, ऑर्गनिक लाइफस्टाइल आदि के बारे में सजग रहने वाले अरुण को विंड एनर्जी में दिलचस्पी होने लगी।

“मैंने तय किया कि मेरा स्टार्टअप ग्रीन एनर्जी पर काम करेगा और उसमें भी हम विंड एनर्जी को भारत में सस्ता और किफायती बनाएंगे। बस फिर मैंने इस विषय में पढ़ना शुरू किया और अधिक जाना। जैसे ही मैं निश्चिंत हो गया कि मुझे यह करना ही है, तो मैंने 2013 में ही अपनी कंपनी रजिस्टर करा ली।”

हालांकि, उनका यह स्टार्टअप साल 2015 में ऑपरेशनल हुआ। अपना स्टार्टअप शुरू करते समय ही वे एक बात पर बहुत स्पष्ट थे कि उनका उद्देश्य देश में कुछ बदलाव लाना है न कि सिर्फ पैसे कमाना। वे दुनिया को एक मॉडल देना चाहते थे, जहां कोई कंपनी बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए भी सफल हो सकती है।

 

यूएन के 20 टॉप स्टार्टअप्स में आया नाम 

38 वर्षीय अरुण ने अपने भाई, अनूप जॉर्ज के साथ मिलकर छोटे विंड टरबाइन के डिजाईन पर काम करना शुरू किया। उनका कांसेप्ट क्लियर था, टरबाइन का साइज़ कम रखना, उसकी लागत कम करना और साथ ही, हवा की कम गति पर उसे चला पाना। क्योंकि उन्हें अपने इस आईडिया को रहवास क्षेत्रों व छोटे उद्योगों के लिए सफल बनाना था।

अरुण बताते हैं कि जब उन्होंने अपना प्रोटोटाइप पूरा किया तो वे इसे लेकर एक इंजीनियरिंग कॉलेज गये और वहां पर इसे दिखाया। लेकिन उन्हें यहाँ पर कहा गया कि उनका डिजाईन सफल नहीं हो सकता। पहले भी तो छोटी विंड टरबाइन फेल ही हुई हैं तो यह कैसे काम करेगी?

पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कुछ दिन बाद अपने प्रोटोटाइप को सरकार द्वारा स्टार्टअप्स के प्रोत्साहन के लिए स्थापित विभाग में भेजा। उन्हें यहाँ से बहुत उम्मीदें थीं क्योंकि इस विभाग में सभी टेक्निकल एक्सपर्ट्स और इंजिनियर्स शामिल थे। लेकिन इनका भी वही जवाब था जो कि इंजीनियरिंग कॉलेज से मिला।

Promotion

“मुझे लग रहा था कि ये लोग कुछ नया, इनोवेटिव करने में भरोसा क्यों नहीं रखते। उन्होंने एक बार मेरे डिजाईन को डिस्कस भी नहीं किया और अपनी राय दे दी। इसके बाद हमने अपने प्रोटोटाइप को एक लोकल चर्च में टेस्टिंग के लिए लगाया। सिर्फ दो हफ्तों में ही हम निश्चिंत हो गये कि यह सफल प्रयोग है,” उन्होंने कहा।

लेकिन उनके इन इनोवेशन के चर्चे पूरे देश में और पूरे विश्व में तब हुए, जब यूनाइटेड नेशन ने इसे अपने टॉप 20 इनोवेशन स्टार्टअप की लिस्ट में जगह दी। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय, दोनों ही मीडिया ने उनकी कहानी को कवर किया। इसके बाद उन्हें न सिर्फ अपने प्रोडक्ट के लिए क्लाइंट मिलने लगे, बल्कि अब बहुत से लोग उनके साथ काम करना चाहते थे।

Small Wind Turbine- Avatar

“यूएस, यूके जैसे देशों से हमें कई एप्लीकेशन आए। ऐसे लोग जिन्हें सालों का अनुभव है और फिर भी वे कम से कम सैलरी में हमारे लिए काम करने को तैयार थे। इससे हमें बहुत प्रेरणा मिली कि दुनिया में अभी भी ऐसे लोग हैं, जो समाज के लिए, पर्यावरण के लिए काम करना चाहते हैं,” उन्होंने कहा।

इससे पहले, उन्होंने जो कुछ भी किया, उसे अपनी बचत के पैसों से फंड किया। लेकिन इस ग्लोबल पहचान के बाद बहुत सी विदेशी कंपनियों ने भी उनके स्टार्टअप को फंड करने में दिलचस्पी दिखाई। पर अरुण बताते हैं कि उन्होंने इस बारे में कोई जल्दबाजी नहीं की क्योंकि वे अपने लक्ष्य से नहीं भटकना चाहते थे।

 

क्या है छोटे विंड टरबाइन की खासियत

उन्होंने अपने इस टरबाइन को ‘अवतार’ नाम दिया है और अब सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या खास है अवतार में, जो न सिर्फ भारत से, बल्कि अन्य देशों से भी उन्हें वाह-वाही मिल रही है। सबसे पहले तो इसका साइज़ छत के पंखे के बराबर है, जिसके चलते इसे कहीं भी आसानी से लगाया जा सकता है।

दूसरा, यह एक घर की बिजली की बेसिक ज़रूरत के हिसाब से पर्याप्त उर्जा (3 से 5 किलोवाट) उत्पादित कर सकती है। इसका मतलब है कि आपको बस एक बार इसकी इंस्टालेशन पर पैसे खर्च करने है और फिर लगभग 20 साल तक आपके घर में बिजली पर कुछ खर्च नहीं होगा। घरों के साथ-साथ, अवतार कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में भी कारगर है और गाँवों को रौशन करने का भी बेहतरीन विकल्प है।

तीसरा, अवतार 1. 4 मीटर प्रति सेकंड हवा की गति पर काम करती है, जो कि भारत में सामान्यतः होती है। और सबसे ज़रूरी खासियत है इसकी लागत, जो एक आईफ़ोन की कीमत से भी बहुत कम है। आज जहां लोग आईफ़ोन खरीदने के लिए एक लाख रुपये से उपर खर्च कर रहे हैं, वहीं इस टरबाइन की कीमत मुश्किल से 60 हज़ार रुपये है।

अब जब हम आईफ़ोन जैसी चीज़, जिसके बिना शायद ज़िन्दगी बितायी जा सकती है, उस पर लाख रुपये खर्च कर रहे हैं तो क्या ‘अवतार’ पर उससे कम खर्च करके अपने गाँवों को और अपने घरों को ग्रीन एनर्जी नहीं दे सकते!

अरुण ने अपना सबसे पहला इनस्टॉलेशन इंडियन नेवी के लिए किया। कोचीन में इंडियन नेवी के कैंपस में उन्होंने सबसे पहले अपने विंड टरबाइन लगाए। अरुण कहते हैं कि यह उनके लिए गर्व की बात है कि उन्होंने देश के लिए तत्पर रहने वाली नेवी के लिए एक ‘मेड इन इंडिया’ प्रोडक्ट दिया है।

अब वे हिंदुस्तान लीवर कंपनी की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट के लिए टरबाइन तैयार कर रहे हैं। और उनका यह टरबाइन आम नागरिकों के लिए भी रेडी है। यदि कोई भी अपने यहाँ यह छोटा विंड टरबाइन लगवाना चाहता है तो बेझिझक उनसे सम्पर्क कर सकते हैं।

वैसे भी अब वक़्त है कि हम अपने पर्यावरण के बारे में सोचें और ग्रीन एनर्जी की तरफ अपने कदम बढ़ाएं। ‘अवतार’ विंड टरबाइन के बारे में अधिक जानने के लिए या फिर अपने यहाँ इंस्टाल करवाने के लिए यहाँ पर क्लिक करें!

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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