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ख़ामोशी की पंखुड़ियाँ !

आज की शनिवार की चाय ख़ामोशी के साथ आपकी नज़्र :)

1..
जब तितलियाँ
सारी रौशनी उड़ा ले जाएँ
और तुम्हारी आँखों का उजाला
बूँद बूँद टपके
मेरे मन को सफ़ेद कर दे
गीला कर दे
बहुत दिनों तक
एक शब्द भी न बोला जाए

 

2.
ज़माना जिनकी सुनता था
वो तीन बन्दर थे
तीनों मर गए
तब से
ख़ामोशी ही नहीं है

 

3.
राख ढका
शान्त गर्म अलाव
सर्द रात, नंगे बदन
कानों पर नाखूनों के घाव
तीन बजने को आए
लेकिन पत्थर आँखों की ख़ामोशी
पूरे शहर में गूँज रही है
अभी तक

 

4.
अपने क़ातिल से उन्सियत
चुम्बन से मुहरबंद
मेरी ज़ुबान
न खुली, तो न खुली
उसकी शादी पर भी नहीं रोई

उन्सियत* Infatuation

 

5.
वे ख़ामोश रहे
क़ातिल चुनाव लड़ते रहे
विविध भारती बजता रहा

 

6.
सोलहवें साल में
एक उत्श्रृंखल नदी
सी लड़की ने
अपना पहला चुम्बन लिया
और तब से वो ख़ामोश है

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कितनी दफ़ा यूँ होता है कि किसी की ख़ामोशी जानलेवा शोर बन जाती है. इस विषय पर कुछ लघु कविताएँ साझा हैं आज, और साथ ही कटूरा रॉबिंसन (Katurah Robinson) के साथ बनाया गया एक प्रयोगात्मक वीडियो जिसका शीर्षक है ख़ामोशी. आज की शनिवार की चाय ख़ामोशी के साथ आपकी नज़्र 🙂


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Written by मनीष गुप्ता

हिंदी कविता (Hindi Studio) और उर्दू स्टूडियो, आज की पूरी पीढ़ी की साहित्यिक चेतना झकझोरने वाले अब तक के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के संस्थापक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मनीष गुप्ता लगभग डेढ़ दशक विदेश में रहने के बाद अब मुंबई में रहते हैं और पूर्णतया भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार / और अपनी मातृभाषाओं के प्रति मोह जगाने के काम में संलग्न हैं.

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