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3 डस्टबिन से बड़ा बदलाव; प्लास्टिक रीसायकल, गीले कचरे से खाद, पशुओं के लिए खाना!

“हम तो सिर्फ़ यही कह सकते हैं कि चाहे मैं हूँ या फिर जिला अधिकारी, कुछ सालों बाद हमारा ट्रांसफर हो जाएगा। पर यह शहर और इस शहर के लोग तो यहीं रहेंगे, इसलिए ज़रूरी है कि आम नागरिक अपने हाथों में इस तरह के अभियानों की डोर संभाले और बदलाव लाएं।”

नवरी 2019 में पंजाब के मानसा जिले में स्वच्छता की दिशा में एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू हुआ ‘प्रोजेक्ट 3D मानसा’ प्रशासन की एक सफल पहल साबित हो रहा है। इस प्रोजेक्ट को जिला प्रशासन ने सबसे पहले शहर के वार्ड नंबर 20 में शुरू किया था। पर आज यह पहल मानसा से 27 में से 15 वार्ड्स में सफलता पूर्वक चल रही है और उम्मीद है कि जल्द ही यह पूरे शहर में लागू होगी।

आखिर क्या है ‘प्रोजेक्ट 3D मानसा’?

इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य शहर में जगह-जगह लगे डंपयार्ड को हटाना और लोगों को जागरुक करना है ताकि वे अपने घरों से निकलने वाले कचरे के प्रति ज़िम्मेदार बनें। 3D से यहाँ तात्पर्य 3 डस्टबिन से है- एक डस्टबिन सूखे कचरे के लिए, दूसरा गीले कचरे और तीसरा डस्टबिन, घरों से फेंके जाने वाले बचे-कुचे खाने को इकट्ठा करने के लिए है।

लोगों को घर-घर जाकर समझाया जा रहा है तीनों डस्टबिन का महत्व (साभार: आदित्य मदान)

सूखे कचरे को रीसायकल के लिए भेजा जाता है तो गीले कचरे को खाद बनाने के लिए कम्पोस्टिंग यार्ड भेजा जाता है। आईएएस अभिजीत कपलिश बताते हैं कि इस तीसरे डस्टबिन का ख्याल प्रशासन को शहर में बेसहारा घुमने वाले जानवरों को देखकर आया। इसलिए प्रशासन ने लोगों से अपील की कि वे घरों में बचने वाला खाना, जो कि सही खाने लायक स्थति में हो, उसे वे तीसरे डस्टबिन में डालें ताकि इसे इकट्ठा करके इन जानवरों के लिए पहुँचाया जा सके।

इन वार्ड्स में से यह कचरा इकट्ठा करने के लिए हर सुबह और शाम प्रशासन द्वारा नियुक्त किए गए कर्मचारी वार्ड में जाते हैं। इन सभी लोगों को ख़ास तरह की ट्राय-साइकिल दी गई है, जिसमें तीन अलग-अलग डस्टबिन लगे हुए हैं। लोगों को सिर्फ़ अपना कचरा, अलग-अलग करके डस्टबिन में डालना होता है।

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ये सभी कर्मचारी घर-घर से कचरा इकट्ठा करके एमआरएफ शेड्स (मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी शेड) पर पहुंचाते हैं। यहाँ पर दूसरी टीम, एक बार फिर कचरे को अलग-अलग करती है और फिर प्रशासन के निर्देशों के मुताबिक, अलग-अलग कचरे को अलग-अलग यूनिट्स में भेज दिया जाता है।

मानसा की जिला अधिकारी अपनीत रियात ने बताती हैं कि फ़िलहाल शहर में 30 ट्राय-साइकिल चलाई जा रही हैं और 15 वार्ड्स के लिए 4 एमआरएफ सेंटर बनाये गए हैं। हर दिन मानसा में लगभग 30 क्विंटल टन कचरा होता है, जिसमें से अभी 16 क्विंटल टन कचरे का प्रबंधन हो रहा है और बाकी के लिए भी योजना पर काम चल रहा है!

छत्तीसगढ़ से मिली प्रेरणा

अपनीत बताती हैं कि इस प्रोजेक्ट में सबसे अहम योगदान, जिला पोषण अभियान में डिस्ट्रिक्ट लीड के पद पर नियुक्त आदित्य मदान का है। अपनी ड्यूटी के अलावा भी शहर के विकास कार्यों में रूचि रखने वाले आदित्य ने छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर शहर के बारे में पढ़ा कि कैसे वहां के प्रशासन की एक पहल ने पूरे शहर को स्वच्छता की मिसाल बना दिया।

यह रिपोर्ट पढ़ने के बाद आदित्य के मन में मानसा जिले के लिए भी ऐसा कुछ करने का ख्याल आया। मूल रूप से दिल्ली के रहने वाले आदित्य ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए बताया,

“मैं जब मानसा आया तो यहाँ पर जगह-जगह कूड़े-कचरे के ढेर देखकर बहुत बुरा लगता था। मैं हमेशा से ही शहर की साफ़-सफाई के लिए कुछ करना चाहता था और वैसे भी अगर शहर स्वच्छ होगा, तब ही हम उसे पूरी तरह से स्वस्थ भी बना पाएंगे। इसलिए जब मैंने अंबिकापुर के बारे में पढ़ा तो मैं तुरंत डीसी मैडम के कार्यालय पहुँच गया।”

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आदित्य की सोच जानकर अपनीत और अभिजीत को बहुत अच्छा लगा और उन्होंने तुरंत इस दिशा में काम करने की ठानी। सबसे पहले नगर निगम के साथ एक सेमीनार रखा गया, जिसमें शहर में स्वच्छता के हालातों पर बात हुई। इसके बाद, आगे की योजना पर काम किया गया और फिर ‘प्रोजेक्ट 3D मानसा’ की भूमिका तैयार हुई।

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“इस प्रोजेक्ट से सिर्फ़ साफ़-सफाई का ही उद्देश्य नहीं, बल्कि इसके साथ-साथ शहर में कूड़ा बीनने वालों के लिए एक सम्मान जनक रोज़गार भी बना। क्योंकि कचरा इकट्ठा और उसे अलग करने के लिए हमने इन्हीं लोगों को हायर किया। हमारे साथ फ़िलहाल 50 से ज़्यादा लोग जुड़े हुए हैं और इन सभी लोगों की हमने एक ‘प्रोजेक्ट 3D सोसाइटी बना दी,” आदित्य ने बताया।

सोसाइटी बनने से इन लोगों को न सिर्फ़ उचित साफ़-सफाई उपकरण, जैसे ग्लव्स, जूते, आदि उपलब्ध कराए गए, बल्कि अब इन सभी कर्मचारियों को स्वास्थ्य संबंधित योजनाओं का लाभ भी मिलता है। इन लोगों के अलावा, एमआरएफ शेड्स की गतिविधियों पर देख-रेख करने के लिए सुपरवाइजर भी नियुक्त किए गए हैं। साथ ही, एक स्पेशल टीम लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने के लिए भी तैयार की गई है।

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आईएएस अपनीत कहती हैं कि शहर में यदि कोई भी बदलाव लाना है तो वह शहर के लोगों के साथ के बिना कभी सफल नहीं होगा। यह प्रोजेक्ट तो सबसे ज़्यादा आम नागरिकों के ऊपर ही निर्भर करता है। इसलिए, शुरू में जब यह प्रोजेक्ट लॉन्च हुआ तो प्रशासन के लिए लोगों को समझाना किसी चुनौती से कम नहीं था।

आदित्य मदान (बाएं), एसडीएम अभिजीत कपलिश (बीच में), और डीसी अपनीत रियात (दायें)

अभी बेशक धीरे-धीरे लोगों का व्यवहार बदल रहा है और उन्हें समझ में आ रहा है कि अपने शहर को स्वच्छ रखना उनकी ज़िम्मेदारी है। पर एक वक़्त था जब बहुत से लोग आदित्य और उनकी टीम से झगड़ जाते थे और कहते थे कि वे क्यों इस तरह कचरे को अलग-अलग करें। ये तो प्रशासन का काम है।

“लेकिन हमारी टीम ने हार नहीं मानी। आज भी हमारे वॉलिंटियर की टीम, सुबह और शाम को अलग-अलग कॉलोनी, मोहल्लों, मंदिर, गुरुद्वारा आदि में जा-जाकर लोगों को कचरे को अलग-अलग करना सिखाती है। साथ ही, उन्हें इसका महत्व भी समझाती है,” आदित्य ने कहा।

प्रोजेक्ट को बनाना है सेल्फ-सस्टेन

इस प्रोजेक्ट को सेल्फ-सस्टेन बनाने के लिए मानसा प्रशासन कई प्रयास कर रहा है। गीले कचरे से बनने वाली खाद को मार्केट में बेचने की योजना पर काम हो रहा है। इसके अलावा, लोगों से पचास रुपए प्रति माह यूजर फीस के तौर पर लिए जा रहे हैं।

प्रशासन ने बहुत ज़्यादा कचरा उत्पन्न करने वाले सेट-अप जैसे कि स्कूल, अस्पताल और छोटे-मोटे व्यवसायों को निर्देश दिए हैं कि खुद अपने यहाँ कचरा-प्रबंधन यूनिट शुरू करें।

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कचरे के प्रबंधन के साथ-साथ इस बात पर भी गौर किया जा रहा है कि लोगों को कम से कम कचरा उत्पन्न करने के लिए प्रेरित किया जाए। सिंगल-यूज प्लास्टिक के प्रयोग को रोकने के लिए प्रशासन ने स्वयं-सहायता समूहों से कपड़े के थैले बनवाकर घर-घर में बाँटने की पहल भी शुरू की है।

कूड़े -कचरे के ढेर हत्वा कर शहर को खुबसुरत बनाने की पहल

सार्वजनिक जगहों पर खुद प्रशासनिक अधिकारी जाकर लोगों से बात करते हैं और उन्हें अपने शहर को स्वच्छ रखने की प्रेरणा देते हैं।

आदित्य आगे बताते हैं कि कुछ समय पहले प्रशासन ने बायोरेमिडीशन मशीन भी खरीदी है। अब उनका लक्ष्य शहर के जमे हुए डंपयार्ड्स को खत्म करना है। मानसा में 21 जगहों पर कूड़े के ढेर लगे हुए हैं। जिनमें से अधिकतर को साफ़ करके, उस जगह को खूबसूरत पार्क की शक्ल दे दी गई है, पर अभी भी बहुत-सी जगह बाकी हैं। इन जगहों को साफ़ करने के बाद शहर में अन्य विकास कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

अंत में आदित्य सिर्फ़ इतना कहते हैं कि अभी भी बहुत कुछ काम होना बाकी है। पर अच्छी बात है कि अब लोगों को गंदगी दिखने लगी है। और हम तो सिर्फ़ यही कह सकते हैं कि चाहे मैं हूँ या फिर जिला अधिकारी, कुछ सालों बाद हमारा ट्रांसफर हो जाएगा। पर ये शहर और इस शहर के लोग तो यहीं रहेंगे, इसलिए ज़रूरी है कि आम नागरिक अपने हाथों में इस तरह के अभियानों की डोर संभाले और बदलाव लाएं।

संपादन: भगवती लाल तेली


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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