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इन पाँच शहरों में रहते हैं, तो ज़रूर जुड़िये इन स्वच्छता हीरोज़ से!

इको-संडे की शुरुआत बेंगलुरु के दो ग्रेजुएशन छात्रों ने की है, तो वहीं दृष्टि फाउंडेशन की शुरुआत अहमदाबाद में एक पिता ने अपनी बेटी से प्रेरित होकर की!

हते हैं कि जैसे बूंद-बूंद करके सागर भरता है वैसे छोटे-छोटे पर लगातार उठाये गए अच्छे कदम एक दिन बड़े बदलाव की वजह बनते हैं। ज़रूरत है तो बस लोगों के नज़रिए को बदलने की। गली-मोहल्लों, पार्क आदि में कूड़े-कचरे के ढेर नज़र आते ही हम अधिकारियों और कर्मचारियों को कोसने लगते हैं। बेशक, यह उनकी ज़िम्मेदारी है, पर क्या देश के नागरिक होने के नाते देश की स्वच्छता के प्रति हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं?

आज सबसे ज़्यादा आवश्यकता लोगों में इसी आत्म-विश्लेषण की है। जो लोग इस ज़िम्मेदारी को समझ रहे हैं, वे बिना समय गंवाए अपने स्तर पर बदलाव की कहानी लिख रहे हैं। आज द बेटर इंडिया पर जानिए ऐसे कुछ संगठनों के बारे में, जो देश के अलग-अलग कोनों में स्वच्छता पर काम कर रहे हैं। इन संगठनों के साथ जुड़कर स्कूल-कॉलेज के बच्चों से लेकर बूढ़े-बुजुर्ग तक, सभी उम्र के लोग अपना योगदान दे सकते हैं!

इको-संडे (Eco Sunday)

इको-संडे की टीम

इको-संडे नाम का यह वॉलंटियर ग्रुप हर रविवार बंगलुरु में अलग-अलग जगहों पर स्वच्छता ड्राइव करता है। इसे शुरू किया न्यू हॉरिजन कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग के दो सेकंड ईयर स्टूडेंट्स, 18 वर्षीय जेरोम रोबिन और 19 वर्षीय करतिन कनन ने। क्लाइमेट चेंज और बढ़ते प्रदूषण के मुद्दे पर हमेशा से सजग रहने वाले रोबिन और कनन ने लगभग 3 महीने पहले तय किया कि वे इस समस्या पर सिर्फ़ बात करने की बजाय कोई ठोस कदम उठाएंगे।

बस वहीं से शुरुआत हुई इको-संडे की। कभी सिर्फ़ 6 लोगों के साथ शुरू हुई उनकी इस पहल से हर रविवार नए लोग जुड़ रहे हैं। सोशल मीडिया पर तो उनके फॉलोअर्स लगातार बढ़ ही रहे हैं और उनके ग्रुप में भी ड्राइव के लिए हर बार 15 के करीब स्वयंसेवक जुड़ जाते हैं।

करतिन कहते हैं, “यह अभियान न सिर्फ़ स्वच्छता के उद्देश्य को पूरा कर रहा है पर बहुत से अंजान लोगों को आपस में जोड़ भी रहा है। जब वे ड्राइव के लिए आते हैं तो अजनबी होते हैं पर जब हम वापस जाते हैं तो सभी दोस्त होते हैं।”

ये सभी लोग हर रविवार बंगलुरु की अलग-अलग जगह जैसे कबोन पार्क, लालबाघ आदि की सफाई के लिए जुटते हैं। अब तक वे 12 स्वच्छता ड्राइव कर चुके हैं। लोगों के लिए अपने संदेश में वे कहते हैं, “करोड़ों बूदों से मिलकर समुद्र बन जाता है तो अगर हम लाखों लोग यक़ीनन एक-दूसरे के सहयोग से बदलाव ला सकते हैं। हमें ख़ुशी होगी अगर इको संडे से ज़्यादा से ज़्यादा लोग जुड़ें, पर अगर आप यह नहीं कर सकते तो अपने स्तर पर काम कीजिये। कचरे को अपने पीछे छोड़ने की बजाय, उसे वहां पहुंचाइये जहाँ उसकी जगह है।”

कोई भी बंगलुरु निवासी इनके इंस्टाग्राम पेज पर जाकर हर रविवार होने वाली इनकी गतिविधियाँ देख सकता है और साथ ही, इनसे जुड़ कर वॉलंटियरिंग कर सकता है।

क्लीन स्क्वाड प्रोजेक्ट (Clean Squad Project)

जगह-जगह जाकर स्वयंसेवक समूह साफ़-सफाई करते हैं

स्वच्छ भारत की दिशा में शुरू किया गया यह प्रोजेक्ट, भूमि नामक संगठन की एक पहल है। यह प्रोजेक्ट स्वयंसेवकों द्वारा चलाया जा रहा है। ये सभी लोग, हर शनिवार-रविवार इकट्ठा होकर अलग-अलग सार्वजनिक जगहों पर साफ़-सफाई करते हैं। साथ ही, लोगों को भी अपने देश को साफ़ रखने के लिए जागरुक करते हैं।

फ़िलहाल यह प्रोजेक्ट, बंगलुरु, चेन्नई और नई दिल्ली में चल रहा है। इसलिए इन शहरों के निवासी कभी भी इस प्रोजेक्ट में वॉलंटियर करके स्वच्छता में अपने भागीदारी दर्ज करा सकते हैं। इस संगठन से जुड़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

दृष्टि फाउंडेशन- स्वच्छ साबरमती

साभार: दृष्टि फाउंडेशन

दृष्टि फाउंडेशन के संस्थापक दिनेश गौतम का उद्देश्य अहमदाबाद की साबरमती नदी को फिर से स्वच्छ और निर्मल बनाना है। इस काम के लिए उन्हें उनकी बेटी से प्रेरणा मिली। द बेटर इंडिया को उन्होंने बताया कि कैसे उनकी बेटी ने साबरमती को देखकर कहा था, “कितनी गंदी है” और इस एक कटाक्ष ने दिनेश को कुछ करने के लिए प्रेरित किया।

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अक्टूबर, 2018 में उन्होंने स्वच्छता अभियान शुरू किया था और अब उनके इस अभियान में बहुत से स्थानीय लोग जुड़ चुके हैं। हर सप्ताह सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक, स्वयंसेवकों के साथ मिलकर साबरमती की सफाई करते हैं। दिनेश कहते हैं कि स्वच्छता कोई राकेट साइंस नहीं है। इसके लिए बस अधिकारियों और सभी नागरिकों को साथ मिलकर काम करना होगा।

यदि आप अमदावादी हैं तो साबरमती को सफाई के लिए वॉलंटियर बन सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें!

वी मीन टू क्लीन (We Mean To Clean)

दो साल पहले दिल्ली के कीर्ति नगर स्लम के डंपयार्ड की तस्वीर बदल दी इस एक अभियान ने (साभार)

साल 2014 से दिल्ली के हर एक कोने के स्वच्छता अभियान में जुटे इस संगठन की शुरुआत दो एमएनसी प्रोफेशनल स्वाति भल्ला और मनीष खुराना ने की। यह संगठन भी स्वयंसेवकों की मदद से ही अच्छे से काम कर रहा है, बस इनका तरीका जरा अलग है।

सबसे पहले, यह ग्रुप दिल्ली और एनसीआर के ऐसे क्षेत्र का मुआयना करते हैं, जहां पर स्वच्छता ड्राइव की ज़रूरत है। फिर ये लोग शहर के अधिकारियों की मदद से उस वार्ड या क्षेत्र के काउंसलर से संपर्क करते हैं। फिर वार्ड काउंसलर और इलाके के लोगों की मदद से जुट जाते हैं अपने सफाई अभियान में।

यदि आप दिल्ली निवासी हैं और इस नेक काम में अपना योगदान देना चाहते हैं तो इनके स्वच्छता ड्राइव्स से जुड़ने के लिए यहाँ पर क्लिक करें!

बीच प्लीज (Beach Please)

‘बीच प्लीज’ टीम (साभार)

साल 2017 में अपने दोस्तों के साथ मिलकर मुंबई में दादर के रहने वाले मल्हार ने दादर बीच की सफाई का अभियान शुरू किया था। आज उनके इस अभियान से 20 हज़ार से भी ज़्यादा मुंबईकर जुड़ चुके हैं। बच्चों से लेकर बूढों तक, सभी उम्र के लोग बीच की साफ़-सफाई के लिए आगे आ रहे हैं।

21 वर्षीय मल्हार ने कहा कि अपने शहर को अच्छा या बुरा बनाने की ताकत हम में ही होती है। हम हमेशा सरकारी अधिकारियों को ही दोष नहीं दे सकते हैं। गणेश विसर्जन के दौरान मैंने देखा कि कैसे लोग बिना सोचे पानी के स्त्रोत को बर्बाद कर रहे हैं। मैं एक बदलाव लाना चाहता था और इस तरह से ‘बीच प्लीज’ शुरू हुआ।

यदि आप भी मुंबई को साफ़, स्वच्छ और स्वस्थ देखना चाहते हैं तो उनके इस अभियान में वॉलंटियरिंग करके अपना योदान दे सकते हैं। उनसे जुड़ने के लिए 9167660403 पर कॉल करें!

संपादन – भगवती लाल तेली


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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