in , ,

धारावी में बन रहे हैं बचे-कुचे कपड़ों से ये ख़ूबसूरत और किफायती बैग्स!

एक सजग ग्राहक के तौर पर यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम वो प्रोडक्ट्स खरीदें, जो हमारे समाज और पर्यावरण के लिए कल्याणकारी हो!

क सजग ग्राहक के तौर पर यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम वो प्रोडक्ट्स खरीदें, जो हमारे समाज और पर्यावरण के लिए कल्याणकारी हो। इसलिए हमें कोशिश करनी चाहिए कि अपनी दैनिक ज़रुरतों के लिए ऐसी चीज़ें इस्तेमाल करें, जिससे कि किसी की ज़िंदगी पर सकारात्मक प्रभाव पड़े।

ऐसी ही एक कोशिश मुंबई की मैना महिला फाउंडेशन ने की है, जिसकी एक पहल की वजह से अब आपके पैड पाउच, ट्रेवल बैग या फिर हैंडबैग की खरीददारी धारावी की ज़रुरतमंद महिलाओं की आजीविका बन सकती है और इन सब चीज़ों की कीमत आपको 600 रुपए से ज़्यादा भी नहीं पड़ेगी।

मैना महिला फाउंडेशन की एक मैनेजर, मारिया ने हमें फाउंडेशन के उद्देश्य के बारे में बताया और साथ ही, यह भी बताया कि कैसे अब तक यह संगठन 20 महिलाओं की आर्थिक व सामाजिक स्थिति को सुधार चुका है।

“इन महिलाओं की सामाजिक स्थिति ऐसी है कि अगर पति ‘ठीक-ठाक’ कमाता है तो इन्हें काम करने की इजाज़त नहीं होती है। काम करने वाली महिलाओं को यहाँ परिवार के लिए शर्म समझा जाता है। पर यह सब कुछ भी गृहिणियों से उनका क्रेडिट नहीं छीन सकता है। वे बहुत ही हुनरमंद और बहुत ही कम उम्र से सिलाई-कढ़ाई के कामों में निपुण होती हैं। हम, मैना में उनकी इसी स्किल पर कम करते हैं ताकि वे पूरे सम्मान के साथ अपने परिवार की आजीविका में कुछ योगदान दे सकें।”

 

 

मैना फाउंडेशन का विचार साल 2009-2010 में आया, जब सुहानी जलोटा (तब 14 साल की थीं) अपने एक स्कूल प्रोग्राम में धारावी गई। यहाँ पर वे इन गरीब महिलाओं से मिलीं और उनसे बात की। तब सुहानी को इन जगहों पर रहने वाली महिलाओं के जीवन के बहुत-से पहलुओं के बारे में पता चला। उन्हें पता चला कि कितनी मुश्किलों और परेशानियों में ये महिलाएं अपनी ज़िंदगी गुजारती हैं।

यहाँ पर, शौचालय घर से दूर बने होते हैं तो ऐसे में शौच के लिए जाना भी परेशानी का सबब है क्योंकि उन्हें रास्ते में लोगों की गंदी नज़रों, फूहड़ बांतों और कई बार तो बदतमीजी का शिकार भी होना पड़ता है। माहवारी के दिनों में रुढ़िवादी मिथकों की वजह से महिलाओं और लड़कियों को और भी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

यह भी पढ़ें: आपका यह छोटा सा कदम बचा सकता है हमारी झीलों को!

साथ ही, यहाँ पर महिलाएं और लड़कियां, असुरक्षित सैनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करती हैं। इसलिए उन्हें बीमारियां आदि होने का काफ़ी खतरा रहता है। सुहानी जो कि हमेशा से इकोनॉमिस्ट की पढ़ाई करना चाहती थीं, उन्होंने मैना फाउंडेशन शुरू करने का फ़ैसला किया, ताकि इसके ज़रिए इन महिलाओं को सुरक्षित सैनेटरी नैपकिन प्रदान किये जाएं और साथ ही, इन्हें आत्म-निर्भर बनाया जाएं।

 

Promotion
Banner

 

ज़मीनी स्तर पर कड़ी मेहनत और शोध के बाद, सुहानी ने महिलाओं का एक समूह बनाया और उन्हें घर पर सूती कपड़े के पैड बनाने के लिए ट्रेन किया। इन री-यूजेबल पैड को घर पर इस्तेमाल करने के अलावा, मैना फाउंडेशन इन्हें बाहर भी बेचती है जिससे इन महिलाओं को आर्थिक मदद मिलती है।

यह भी पढ़ें: इस 50 रुपये के डिवाइस से घर में बचा सकते हैं 80% तक पानी!

“हमने पैड्स के साथ शुरू किया और फिर धीरे-धीरे, एक टेक्सटाइल फैक्ट्री के साथ पार्टनरशिप कर ली, जो हमें अपना वेस्ट कपड़ा न्यूनतम रेट पर देने के लिए तैयार थी। हमारे मास्टर टेलर ने इस कपड़े से एक ट्रेवल पाउच का डिजाईन बनाया और यह ग्राहकों के बीच हिट हो गया। इसलिए हमने बचे-खुचे कपड़ों को रीसायकल करके पैड पाउच, हैंडबैग और ट्रेवल बैग बनाना शुरू कर दिया,” मारिया ने कहा।

 

 

इन बैग्स को फैक्ट्री से मिलने वाले बचे-कुचे कपड़े में से सिला जाता है। इसलिए बैग्स का रंग और पैटर्न एक जैसा नहीं होता। लेकिन जब भी कोई प्रोडक्ट बिकता है तो इन औरतों के चेहरे की ख़ुशी ‘अनमोल’ होती है।

हम लोगों के लिए ये भले ही छोटे-से बैग हैं पर इन महिलाओं के लिए ये ज़िंदगी की उम्मीद हैं!

संपादन: भगवती लाल तेली
मूल लेख: तन्वी पटेल


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है, या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें, या Facebook और Twitter पर संपर्क करें। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर व्हाट्सएप कर सकते हैं।

Promotion
Banner

देश में हो रही हर अच्छी ख़बर को द बेटर इंडिया आप तक पहुँचाना चाहता है। सकारात्मक पत्रकारिता के ज़रिए हम भारत को बेहतर बनाना चाहते हैं, जो आपके साथ के बिना मुमकिन नहीं है। यदि आप द बेटर इंडिया पर छपी इन अच्छी ख़बरों को पढ़ते हैं, पसंद करते हैं और इन्हें पढ़कर अपने देश पर गर्व महसूस करते हैं, तो इस मुहिम को आगे बढ़ाने में हमारा साथ दें। नीचे दिए बटन पर क्लिक करें -

₹   999 ₹   2999

Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

पढ़ाई के साथ संभाली गाँव की ज़िम्मेदारी, 32 लाख का काम करवाया सिर्फ़ 8.5 लाख रुपये में!

jitendra malik

10वीं पास किसान का इनोवेशन, एक घंटे में 300 क्विंटल कंपोस्ट टर्न करती है यह मशीन!