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Hither hither, Love

(काते मोला मोहनी डार दिए गोंदा फूल)

वो डूब रही थी.
चमकदार लेकिन कड़वी शाम
टेबल पर इतने सारे लोग
बने ठने. और इतनी सारी काम की बातें।
परिपक्व, ज़िम्मेदार गहरी बातें

 

वो डूब रही थी उनमें
वो भी डूब रहा था
बातें तो करता था
लेकिन अपने ख़यालों में उतरा रहा
कोलेस्ट्रॉल.. घुटने का दर्द
बच्चों की पढाई का लोन
बीवी का अफ़ेयर है क्या राकेश से?
भई ये बेस्ट फ़्रैंड क्या होता है..
और उधर नीना की कमर..

 

इतना पॉल्यूशन बढ़ गया है आजकल
दिल्ली में साँस लेना –
जैसे एक दिन में तीन सिगरेट पीना
‘अरे नहीं भाई इतना आसान विश्लेषण नहीं है’ कोई झुँझलाया
‘सिगरेट में सिर्फ़ टार होता है, इनमें तो..
साँस की कौन सी बीमारी नहीं है खोमचे वालों को
और बेचारे ऑटोवाले..’

 

‘हुँह! और पुलिसवाले?
ट्रैफ़िक पुलिसवालों का दर्द कौन समझेगा?’
‘ग़रीबों का रोना रोना –
सिंगल मॉल्ट के साथ सबसे शानदार चखना’

 

तड़प के उत्तर आया –
‘कुछ कहो तो मौक़ापरस्ती
और वो क्या.. क्या कहते हैं यार..
वो किसी के दुःख की रोटी सेकना।
चुप रहो तो सेंसिटिविटी की एक बूँद भी नहीं है’

 

‘हाथी के दाँत दिखाने के और..
इनके ख़ुद के सारे कॉलम झूठे हैं’ जलन-उत्प्रेरित त्वरित समर्थन

 

उसे लगा उसके फ़ेफ़डे
अंदर से सड़ चुके होंगे अब तक.
पेट भी शायद
कौन सा दूध असली है
कौन से सब्ज़ी बिना ऑक्सीटोसिन के उगी है
उबकाई आई और दिल फिर से डूबने लगा
पेट में मरोड़ उठी
फिर ध्यान आया कि हर बीमारी साइकोसोमैटिक है –
मन की उपज
तनाव का फल
‘फल क्यों? फूल क्यों नहीं?
तनाव का फूल..
वाह, तनाव का फूल..’
स्वयं की सृजनशीलता देख चेहरे पर मुस्कान फूटी
मरोड़ भाग गई
दिल उबर कर साँस लेने सतह तक आया
उसने भीड़ के बीच उसको देखा

 

उसका दिल उड़ा उछला
सालों बाद अटारी की सफ़ाई हुई हो जैसे
डीयू में पढ़ाती हैं अंग्रेज़ी
सोशल मीडिया ने उन्हें बता रखा है कि वे एक बेबाक
सोशली, मोरली, एनवायरनमेंटली जाग्रत महिला हैं

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‘महिला नहीं, इंसान!
आई कैंट टॉलरेट फेमिनिज़्म. दैट्स सो 2015’
इनकी साड़ी मधुबनी से आई है
चमड़े के बैग पर हाथ की कढ़ाई है
आज सारे विमर्श इन्हें बोर लग रहे हैं
सब खोखले, बातों के चोर लग रहे हैं
जैसे अचानक एक दिन
एक फ़ैशनट्रेंड पुराना लगने लगता हैं
वैसे ही बातों और इरादों का खोखलापन आज उभर आया था

 

‘जिनलिवेट आजकल देसी व्हिस्की जैसी हो गई है’
‘आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ के जा रहे हो?’
‘बुद्धिस्ट चैंट करने हमारे घर आना’
‘सितम्बर में पेरिस स्वर्ग से सुन्दर है’
‘ऑर्गनिक किनुआ..’

 

पति का मैसेज
‘देर हो जाएगी यार’
उसने चैन की साँस ली
खिड़की के बाहर देखा
फिर काँच में प्रतिबिम्ब दिखा
उसने मुड़ के एक बार इस तरफ़ फिर से देखा था

 

उसकी उम्र बीस साल कम हो गई

 

जॉन कीट्स की पंक्तियाँ
Hither hither, love—
‘Tis a shady mead—
Hither, hither, love!
Let us feed and feed!

 

बेटी का मैसेज:
माँ कहाँ हो यार? कुछ बताना है
हो सकता है कि मुझे प्यार हो गया है

 

उसने सोचा कैसे पल में मौसम बदलता है
अभी कुछ देर पहले ही तो मैं डूब रही थी

 

काँच में परछाईं
वो इस तरफ़ आ रहा है
एक कबूतर खिड़की पे आ बैठा
और कुछ गाने लगा
एक हवाईजहाज
सर के बहुत करीब से गुज़रा
शाम के रंग गहरा आए
और कीट्स की पंक्तियाँ
बाक़ायदा होठों पर बज उठीं

 

Hither, hither, dear
By the breath of life,
Hither, hither, dear!—
Be the summer’s wife!

 

Though one moment’s pleasure
In one moment flies—
Though the passion’s treasure
In one moment dies;—

 

Yet it has not passed—
Think how near, how near!—
And while it doth last,
Think how dear, how dear!

 

Hither, hither, hither
Love its boon has sent—
If I die and wither
I shall die content!

 

आज की शनिवार की चाय अचानक खिल उठने वाले फूलों और अचानक बरस जाने वाले प्यार के नाम. अगर यह मीठा, सौंधा लोकगीत पूरा समझ नहीं आये तो कमेंट सेक्शन खंगालें 🙂


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Written by मनीष गुप्ता

हिंदी कविता (Hindi Studio) और उर्दू स्टूडियो, आज की पूरी पीढ़ी की साहित्यिक चेतना झकझोरने वाले अब तक के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के संस्थापक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मनीष गुप्ता लगभग डेढ़ दशक विदेश में रहने के बाद अब मुंबई में रहते हैं और पूर्णतया भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार / और अपनी मातृभाषाओं के प्रति मोह जगाने के काम में संलग्न हैं.

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