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पचास : साइकिल : प्रेम : शराब : कविता

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गवत रावत की एक कविता है ‘सत्तावन बरस का आदमी’ जो इस तरह है:

सत्तावन बरस के आदमी से कोई नहीं पूछता
उसके प्रेम के बारे में
कोई नहीं पूछता
रगों में दौड़ती फिरती उसकी इच्छाओं के बारे में

यहाँ तक कि सत्तावन बरस के दो आदमी जब मिलते हैं
एक दूसरे से तरह-तरह से बस
यही पूछते रहते हैं, अब कितने दिन और हैं..

इसके आगे कविता बताती है कि सत्तावन बरस का आदमी किसी जवान कंधे पर हाथ रख बतियाना चाहता है. उम्र के इस पड़ाव में उसके पास सुनाने के लिए सच्ची कहानी, सुन्दर कविता और मधुर गीत भी होता है. और कैसे वह उम्र की पवित्रता (?) में छूटी चीज़ों को नए सिरे से पाना तो चाहता है लेकिन उसे साठ के पार की फैंसिंग दिखा दी जाती है हर जगह.
बीते सप्ताह मैंने पचास की उम्र छू ली. अब इस कविता तो पढ़ कर लगता है कि शायद यह किन्हीं बीते ज़मानों की कविता है. क्योंकि पचास में अभी तो पता ही नहीं चलता कि कोई उम्र है. मैं जन्मदिन के दिन किसी से मिलना अमूमन पसंद नहीं करता, कोई समारोह तो शायद ही पिछले तीस वर्षों में हुआ हो. इस बार भी सुबह से अकेले ही पड़ोसी की साइकिल ले कर निकल गया था. पड़ोसी की इसलिए कि तीन साइकिलें हमारी चोरी हो गयीं पिछले महीने. फ़्लोरिडा में भी इसी साल तीन साइकिलें चोरी हुई हैं इसी साल. लेकिन इस वक़्त जेब मैं पैसे नहीं हैं तो जो, जैसा, जहाँ से मिल जाए काम चल जाता है. और साइकिल पर भटकते हुए दिन बिताना पुराना शगल रहा है. जब नव-भारत टाइम्स के लिए स्तम्भ लिखना आरम्भ किया था, तो शायद दूसरे अंक में ही लेख में साइकिल के मज़े उठाने के बात की थी. मजमून का सार यह था कि यूरोप में जो भी घूमने जाता है, वह किराये की साइकिल ले कर घूमता ही है. वही लुत्फ़ साउथ मुंबई में भी आ सकता है, बिना लाखों रुपए खर्च किये. उसके बाद कई लोगों ने कहा भी था कि उन्होंने साइकिल ख़रीदी है.

बात हो रही थी ‘सत्तावन बरस का आदमी’ की इस कविता को हमने राजीव वर्मा जी के साथ शूट किया है. सत्तर के करीब हैं राजीव जी और आजकल भोपाल में रहते हैं. मुंबई की फ़िल्मी दुनिया से जुड़े तो हैं लेकिन कम कर दिया है काम आजकल. उनसे उम्र की बात चली तो कहने लगे कि ‘यार, मुंबई में उम्र का पता ही नहीं चलता. भोपाल में आता हूँ तो हर ओर से जता दिया जाता है कि अब मैं ‘बड़ा’ हूँ और वैसे ही व्यवहार की अपेक्षाएँ रखी जाती हैं.

ये बात भी शायद सही है – जैसे जैसे आप छोटी जगह जाते हैं. उम्र आप पर लाद दी जाती है. उम्र कोई बुरी चीज़ नहीं है लेकिन अपने आपको उम्रदराज़ मान अपने पंखों को कतरना नासमझी है. बात जवान दिखने की नहीं है. न ही बंदरों की तरह उछलने की है. पचपन-साठ के आसपास विधवा/ विदुर हुए लोगों की शादी आज 2019 में भी दुर्लभ है. अब जब बच्चों का घर बस चुका है, या बसने वाला है अकेले माँ या बाप की शादी की बात एक पाप की तरह लगती है. माँ के लिए रोया जाता है कि हाय कैसे रहेगी अब बेचारी लेकिन उनका भी नया घर बसे यह नहीं सोचा जाता. एक समय आएगा जब समाज मुड़ कर देखेगा कि कितने मूर्ख थे हम लोग कि अपने पचासवें और साठवें दशक के माँ-पापा को अकेले ही रहने देते थे. एक अनकही उम्र क़ैद में. सोच में परिवर्तन चाहिए – बच्चे समझें कि ये लोग सेक्सुअल भी हैं और ज़िन्दगी की वो हर शय चाहते हैं जो बच्चों को चाहिए. और मूर्ख अकेले बुज़ुर्गों – सियापा और बेवकूफ़ी मत करो – पढ़े लिखे हो, समझदार हो – अपनी शादी के बारे में सोचो – आपकी ही तरह एक और अकेले के बाग़ में भी बहार आएगी. सोचो. सोचो!!!

डरो मत.
शरमाओ मत. सोचो. अकेले रह कर तुम कोई समझदारी नहीं कर रहे हो.

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बहरहाल, पचास के साथ साथ डाइबिटीज़ होने की ख़बर आई, तो शराब कम कर दी, जिम शुरू कर दिया. हाथ-पाँव में जान लगी. दिनभर धूप में साइकिल पर घूमने में मज़ा आया. ऑटो वालों से रेस लगाई. आर्ट गैलरी में पेंटर साहिबा से जीवन के गुर सीखे. बच्चों के साथ क्रिकेट खेला और शाम को एक मोहतरमा के किसी और के साथ डेट पर चले जाने पर मुँह बनाया. कॉलेज के चार छात्रों को पानी-पूरी खिलाई, और एक दो दफ़ा कोई हसीना मुस्कुराई..

पचास के बाद भी मुझे जीवन चाहिए. उतना ही चाहिए. और अधिक चाहिए.
और प्रेम भी चाहिए, पहाड़ भी चाहिए, खुला भी चाहिए, किवाड़ भी चाहिए.
मर जाऊँ जूनून में ऐसा प्रेम हो फिर से.
चलो फ़्रिज में रखे सम्बन्ध में नया तड़का लगाएँ
या दूरदराज़ की अंदर-बाहर की गलियों में घूम आएँ.
छोटा सा जीवन है साला –
ज़िम्मेवारी और समझदारी के चार लबादे और फेंकता हूँ चूल्हे में.

ओ’ चेतनाओं!
ओ’ चेतना पारिखों!!
कैसी हो??
आओ एक कविता सुनानी है:)

आज ज्ञानेन्द्रपति की यह कविता फिर से :

—–

लेखक –  मनीष गुप्ता

हिंदी कविता (Hindi Studio) और उर्दू स्टूडियो, आज की पूरी पीढ़ी की साहित्यिक चेतना झकझोरने वाले अब तक के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के संस्थापक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मनीष गुप्ता लगभग डेढ़ दशक विदेश में रहने के बाद अब मुंबई में रहते हैं और पूर्णतया भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार / और अपनी मातृभाषाओं के प्रति मोह जगाने के काम में संलग्न हैं.


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