Search Icon
Nav Arrow
Rani Kamalapati

कौन थीं रानी कमलापति, जिनके नाम पर बदला हबीबगंज स्टेशन का नाम

भोपाल में 1979 में बने हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम हाल ही में बदलकर, रानी कमलापति रेलवे स्टेशन कर दिया गया। पर, कौन थीं रानी कमलापति? पढ़िए उनकी पूरी कहानी!

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित हबीबगंज रेलवे स्टेशन (habibganj railway station) का बीते दिनों नाम बदलकर रानी कमलापति स्टेशन (Rani Kamalapati Railway Station) कर दिया। नाम बदलने के बाद, स्टेशन का कोड भी HBJ से बदलकर RKMP भी हो गया। 

कौन थीं रानी कमलापति

कमलापति का जन्म सलकनपुर रियासत के राजा कृपाल सिंह सरौतिया के यहां हुआ था और उन्होंने घुड़सवारी से लेकर तीरकमान तक में महारत हासिल की थी। 

Advertisement

उनकी शादी 18वीं सदी में, भोपाल से करीब एक घंटे दूर गिन्नौरगढ़ के राजा निजाम शाह से हुई थी। उस दौरान भोपाल भी उन्हीं के शासन में था। अब गिन्नौरगढ़ सीहोर जिले में आता है।

राजा सूराज सिंह शाह के बेटे निजाम शाह को गोंड राजवंश का सबसे रसूखदार राजा माना जाता है। उनके राज्य में 750 से भी अधिक गांव शामिल थे। निजाम शाह की सात पत्नियां थीं, लेकिन उन्हें बेहद खूबसूरत और बहादुर रानी कमलापति सबसे ज्यादा पसंद थीं। 

Rani Kamalapati
रानी कमलापति की प्रतिमा

उन्होंने कमलापति से प्यार में, भोपाल में खूबसूरत ‘कमलापति महल’ (Rani Kamalapati Palace) बनवाया। 1989 में इस महल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अपने संरक्षण में ले लिया।

Advertisement

भतीजे ने की निजाम शाह की हत्या

निजाम शाह का भतीजा आलम शाह उनके राज्य को हासिल करने के साथ ही, रानी कमलापति (Rani Kamalapati) को भी अपनाना चाहता था। आलम शाह ने कमलापति से अपने प्यार को जाहिर भी किया, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया।

फिर, रानी कमलापति (Rani Kamalapati) को हासिल करने के मकसद से आलम शाह ने एक दिन मौका देख कर राजा के खाने में जहर मिला दिया और उनकी मौत हो गई। इसके बाद कमलापति को अहसास हुआ कि गिन्नौरगढ़ में उन्हें और उनके 12 साल के बेटे नवल शाह की जान को भी खतरा है। इसलिए वह भोपाल में अपने नाम से बनी महल में रहने लगीं।

Advertisement

लिया बदला

रानी कमलापति (Rani Kamalapati) ने गिन्नौरगढ़ भले ही छोड़ दिया, लेकिन उनके मन में अपने पति की हत्या का बदला लेने का विचार चल रहा था। लेकिन उनके पास न कोई सेना थी और न ही पैसे। 

अंत में, रानी कमलापति ने अपने अच्छे दोस्त मोहम्मद खान से मदद मांगी। वह कभी मुगल सेना का हिस्सा थे, लेकिन हिसाब में उलट-फेर के कारण उन्हें बाहर निकाल दिया गया था। मोहम्मद खान भोपाल से कुछ किलोमीटर दूर इस्लामनगर में अपना राज करते थे।

Advertisement

रानी कमलापति (Rani Kamalapati) ने मोहम्मद खान को आलम शाह की हत्या के बदले में एक लाख मोहरें देने का वादा किया। जिसके बाद मोहम्मद खान ने आलम शाह पर धावा बोल दिया और उनकी हत्या कर दी।

Rani Kamalapati's Fort
रानी कमला पति महल

लेकिन, अपने वादे के मुताबिक रानी कमलापति (Rani Kamalapati) ने मोहम्मद खान को आलम शाह की हत्या के बदले में एक लाख मोहरें देने का वादा किया। जिसके बाद मोहम्मद खान ने आलम शाह पर धावा बोल दिया और उनकी हत्या कर दी। ) के पास उतने पैसे नहीं थे और वह मोहम्मद खान को सिर्फ 50 हजार मोहरें दे पाईं और बाकी पैसों के बदले में उन्हें भोपाल का कुछ हिस्सा दे दिया।

कहा जाता है कि मोहम्मद खान के इरादे ठीक नहीं थे और वह पूरे भोपाल पर कब्जा हासिल करना चाहता था। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने रानी कमलापति ( Rani Kamalapati ) के सामने शादी का प्रस्ताव भी रखा। यह बात जब उनके 14 साल के बेटे नवल शाह को पता चली, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया और उन्होंने अपने सैनिकों के साथ मोहम्मद खान पर हमला कर दिया।

Advertisement

1723 में हुई इस लड़ाई में मोहम्मद खान ने नवल शाह की हत्या कर दी, लेकिन युद्ध स्थल पर इतना खून बहा कि उसे ‘लाल घाटी’ कहा जाने लगा। फिर, रानी कमलापति ( Rani Kamalapati ) ने अपनी आबरू बचाने के लिए महल के ही एक तालाब में जलसमाधि ले ली और जबतक मोहम्मद खान महल पहुंचा, सबकुछ खत्म हो चुका था। 

Fort Of Rani Kamalapati

हालांकि, कुछ जानकारों का मानना है कि मोहम्मद खान ने रानी कमलापति (Rani Kamalapati) को अपनी बहन मानते हुए मदद का हाथ बढ़ाया था और कमलापति ( Rani Kamalapati ) ने उनकी वजह से अपनी जान नहीं दी थी। भतीजे आलम शाह से बदले के बाद, वह मोहम्मद खान की हिफाजत में रहीं।

रानी कमलापति ( Rani Kamalapati ) की मौत के बाद, भोपाल में नवाबों का दौर शुरू हुआ।

Advertisement

जनजातीय संस्कृति, कला और परंपराओं को संरक्षण देने के साथ ही श्रेष्ठ जीवन मूल्यों के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर करने वाली रानी कमलापति (Rani Kamalapati) को मध्यप्रदेश के गौरवशाली इतिहास का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। साथ ही उन्हें महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण का भी प्रतीक माना जाता है।

संपादन- जी एन झा

यह भी पढ़ें – जब किसानों के ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ आंदोलन के आगे झुके अंग्रेज़, वापस लेना पड़ा कृषि कानून

यदि आपको The Better India – Hindi की कहानियां पसंद आती हैं या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हैं तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें या FacebookTwitter या Instagram पर संपर्क करें।

close-icon
_tbi-social-media__share-icon