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सैकड़ों साल पुरानी कुप्रथा तोड़, किन्नरों का पिंडदान करेंगे बनारस के 151 पंडित!

किन्नरों के हित में काम करने वाली संस्था 'किन्नर अखाडा' एक ऐतिहासिक आयोजन करने जा रही है, जिसमें हाल के वर्षों में स्वर्ग सिधारे किन्नरों का पिंडदान संस्कार किया जायेगा।

दुनियां बदल रही है! देश आजादी के 70 सालों के बाद नई उम्मीदों की ओर बढ़ रहा है। आज़ाद भारत में लाख निराशाओं के मुद्दों पर बहस हो रही है। लेकिन कहीं कहीं बिखरीं आज़ादी की छींटे हमें आशा से भर देती हैं, कि आने वाला वक़्त भेदभाव की परम्पराओं से ऊपर उठकर इंसानियत के कंधे से कंधा मिलकर चलने की होड़ में है।  

ट्रांसजेंडर समूह का संघर्ष हाल के कुछ वर्षों में रंग लाया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के इन्हें थर्ड जेंडर का दर्जा देने के बाद, हर क्षेत्र में आज कहीं न कहीं कोई ऐसा सितारा उभर रहा है। पिछले दिनों उज्जैन कुम्भ में किन्नर अखाडा बनने की घटना से धार्मिक क्षेत्रों में भी किन्नरों का हस्तक्षेप बढ़ गया और अब देश की धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी बनारस से एक और ऐतिहासिक पहल ने जन्म लिया है। वाराणसी के 151 ब्राहमण पहली बार ट्रांसजेंडर मृतकों का पिंडदान करेंगे।

 

किन्नरों के हित में काम करने वाली संस्था ‘किन्नर अखाडा’ एक ऐतिहासिक आयोजन करने जा रही है, जिसमें हाल के वर्षों में स्वर्ग सिधारे किन्नरों का पिंडदान संस्कार किया जायेगा। 1

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पिंडदान संस्कार एक हिन्दू प्रथा है, जिसमें स्वर्ग सिधारे पूर्वजों को श्राद्ध अर्पित किया जाता है। सितम्बर महीने में पितृपक्ष जिसे पितरों का पक्ष (पखवारा) भी कहा जाता है, 17 दिनों का होता है। इन 17 दिनों के पितृपक्ष मे श्राद्ध एवं पिंडदान करने का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस पुण्य क्षेत्र में पिता का श्राद्ध करके पुत्र अपने पितृऋण (पितृदोष) से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है।
 
सैकड़ों वर्षों से किसी भी धर्म के किन्नरों का धार्मिक अंतिम संस्कार नहीं किया गया है। इतना ही नहीं ज्यादातर किन्नरों को कब्रिस्तान के बजाय कहीं सुनसान में जलाया जाता रहा है। हिन्दू पंडित उनके म्रत्यु बाद के कर्मकांड करने से मना कर देते हैं और इसीलिए हर साल पितृपक्ष में मृतक परिजनों को दिया जाने वाला श्राद्ध भी कभी नहीं होता। लेकिन इस वर्ष मृतक किन्नरों को पिंडदान देने की शुरुआत हो रही है, जो उन्हें समाज में बराबरी का दर्जा मिलने के संघर्ष में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
 
किन्नर अखाडा के संस्थापक सदस्य ऋषि अजय ने ‘द एशियन एज को बताया कि,
“हिन्दू धर्म में जन्मा प्रत्येक मनुष्य 16 कर्मकांडो का अधिकारी हो जाता है, जिनमें जन्म के समय किये जाने वाले संस्कारों सहित नाम संस्कार, मुंडन संस्कार, जनेहू संस्कार, विवाह संस्कार और अंतिम संस्कार शामिल हैं। लेकिन किन्नरों को अब तक शुरू से लेकर अंतिम संस्कार तक हर अधिकार से दूर रखा गया। हम ये सुनिश्चित कर रहे हैं कि अब ऐसा और न हो। “
 
 
किन्नर अखाडा की महामंडलेश्वर लक्ष्मी त्रिपाठी कहती हैं, “हम तीन सौ वर्ष पुरानी कुप्रथा को तोड़ रहे हैं, जिसमें किन्नरों को म्रत्यु पश्चात कर्मकांड करने की इजाजत नहीं है। हम अब से किन्नरों के अंतिम संस्कार की परंपरा भी शुरू करेंगे। “
 

‘किन्नर अखाडा’, बनारस के गंगा किनारे पिंडदान संस्कार समारोह 24 सितम्बर को आयोजित करेगा। जिसमें 151 ब्राह्मणों का समूह अन्य संतो के साथ श्राद्ध प्रक्रिया पूरी करेंगे।

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इस समारोह की अध्यक्षता कर रहे आचार्य बद्री नारायण ने बताया कि, “ये ऐतिहासिक मिसाल है और एक सबूत भी कि वक़्त बदल रहा है। किन्नर भी मनुष्य हैं और उन्हें भी सभी धार्मिक संस्कारों का समान अधिकार है। ये पहल उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने में भी मदद करेगी। “
 
हमारा समाज बदल रहा है। हम सारे विभेदों को भुलाकर इंसानियत की ओर कदम बढा रहे हैं। बदलते वक़्त के साथ भारत भी नए आयाम गढ़ रहा है। इंसान को इंसान से जोड़ने की ओर मिसाल बन रही ऐसी पहलों को सलाम!  

मूल लेख निशि मल्होत्रा द्वारा लिखित !


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