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forest products made by adivasis

डॉक्टर्स की पहल का नतीजा! अब हेयर ऑयल से लेकर अचार तक बना रहे आदिवासी, कई गुना बढ़ी आय

डॉ मंजू वासुदेवन और डॉ श्रीजा केरल के आदिवासियों के जीवन में एक उम्मीद की किरण बनकर आई हैं। उनका फारेस्ट पोस्ट उद्यम आदिवासियों के लिए एक नियमित आय का जरिया है।


पर्यावरण की चिंता करते हुए अक्सर हम जंगलों को बचाने की बात करते हैं, लेकिन क्या कभी उन लोगों के बारे में सोचा है, जिनके लिए जंगल ही उनका घर है। दुनिया में भले ही कितनी भी तेजी से बदलाव आए हों, लेकिन इनका जीवन आज भी वैसा ही है। जंगल ही उनका प्यार है और उनकी आमदनी का ज़रिया भी। वे इसे ना तो छोड़कर जा सकते हैं और ना ही जाना चाहते हैं। ये आदिवासी यहां होने वाली फल-सब्जियों और जड़ी-बूटियों (Forest products) को बेचकर घर खर्च चलाते हैं।  

कादर, मलयार और मुथुवर की स्थानीय जनजातियां सालों से केरल के चालकुडी और करुवन्नूर नदी के पास रहती आ रही हैं और इन्हीं जनजातियों के बीच, इकोलॉजिस्ट डॉ मंजू वासुदेवन ने अपनी दुनिया बसा ली है। उन्होंने, इन लोगों के बीच रहकर उनकी परेशानियों को नजदीक से जाना और पाया कि वे आज भी अपने जीवन यापन के लिए जंगलों में मिलने वाली चीजों पर ही निर्भर हैं। अगर उनकी जीवन शैली में सुधार लाना है, तो जंगल से ही उन्हें कुछ ऐसा देना होगा, जो उनके लिए हर तरह से ज्यादा फायदेमंद हो। इसके बाद, वह केरल के एक एनजीओ ‘रिवर रिसर्च सेंटर’ के साथ जुड़ गईं।

आदिवासियों की परेशानियों को दूर करने के लिए, पॉलीनेशन इकोलॉजी में पीएच.डी. डॉ मंजू ने फॉरेस्ट पोस्ट की शुरुआत की। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहां आदिवासी पारंपरिक रूप से दुर्लभ शतावरी और क्वीन सागा से शहद, अचार, बांस से टोकरियां आदि अन्य कई तरह के उत्पाद बनाते हैं और उन्हें बाहर के लोगों तक पहुंचाते हैं। इससे न केवल उनकी आमदनी बढ़ी, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने का आत्मविश्वास भी आया है।

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शतावरी के अचार (Forest products) से मिला आइडिया

डॉ. मंजू ने रिवर राइट एक्टिविस्ट, डॉक्टर लता अनंत के साथ मिलकर आदिवासी समुदायों को उनके वन अधिकारों के साथ सशक्त बनाने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया। जंगलों में घूमते हुए एक बार उनकी नजर शतावरी पर पड़ी। उसकी पैदावार जंगलों में काफी ज्यादा है। आदिवासी, पारंपरिक तरीके से इसका अचार बनाते हैं। डॉ मंजु को इसमें आदिवासियों के लिए अतिरिक्त आय का एक जरिया दिखा। 

उन्होंने आम लोगों की राय और पसंद जानने के लिए, इलाके में आयोजित एक प्रोग्राम में शतावरी के अचार को बिक्री के लिए रखा। एक खरीदार को उसका स्वाद इतना पसंद आया कि उसने वहां मौजूद अचार के सभी डिब्बों को खरीद लिया और साथ ही शतावरी से बनने वाले अन्य प्रोडक्ट्स (Forest products) की डिमांड भी उन तक पहुंचाई।

यहीं से डॉ मंजु को शतावरी के स्वाद और पसंद का एहसास हुआ। उन्होंने इस स्वाद को भारत के बाकी हिस्सों तक पहुंचाने के लिए कदम बढ़ाने का फैसला किया और आज उनकी इस पहल के कारण इस क्षेत्र में रहनेवाले आदिवासी, शतावरी और अन्य दुर्लभ चीजों से शहद, तेल और कई तरह के प्रोडक्ट बना रहे हैं।

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कैसे हुई फॉरेस्ट पोस्ट की शुरुआत?

Forest post tribe sustainable
Tribals being trained by the NGO.

डॉ मंजू को यह तो समझ आ गया था कि उन्हें क्या करना है। लेकिन करना कैसे है, इसे लेकर उनके मन में काफी दुविधा थी। वह कहती हैं, “मैंने हमेशा से बिज़नेस के लिए सहकारी मॉडल पर काम किया था, जहां मैं नॉन टिंबर फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स (NTFP) का इस्तेमाल आमदनी बढ़ाने के लिए कैसे किया जाए, इसके लिए महिलाओं के समूह को ट्रेनिंग दिया करती थी। उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने का यह भी एक तरीका है, जिस पर हम काफी समय से काम करते आ रहे थे।”

अब डॉ मंजु को यह तय करना था कि वह अपने काम को ऐसे ही जारी रखें या फिर सामाजिक उद्यम में उतरें। उन्होंने बताया, “गैर-लाभकारी संगठन के रूप में काम करते हुए हम एक व्यवसाय नहीं चला सकते थे। लेकिन हमें पता था कि वन उपज बेचने के लिए एक प्लेटफार्म देने से आदिवासियों को अपनी आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी।”

उसी साल अपनी सहयोगी डॉक्टर श्रीजा के साथ मिलकर, उन्होंने फॉरेस्ट पोस्ट की शुरुआत की। आज यह फॉरेस्ट पोस्ट, पर्यावरण को ध्यान में रखकर आदिवासियों द्वारा तैयार किए जा रहे पारंपरिक और प्रामाणिक उत्पादों (Forest products) को बेचने के लिए एक मंच मुहैया करा रहा है।

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बनाते हैं साबुन और हेयर ऑयल (Forest products)

आज 60 आदिवासी उनके इस सामाजिक उद्यम के साथ जुड़कर प्रॉडक्ट बनाने और उन्हें बेचने का काम कर रहे हैं। डॉ. मंजू ने बताया, “पश्चिमी घाटों में रहनेवाले स्थानीय लोग जंगलों से कई तरह के जंगली संसाधन इकट्ठा करते हैं। दवा के लिए पत्ते, खाने के लिए पेड़ की जड़ें और छाल, तेल, कंद शहद, मोम, पेड़ से निकलने वाला काला डामर, कटहल, आंवला और सोपनट जैसे फल आसानी से जंगल में मिल जाते हैं। हमने इनसे अनोखे, स्वाद भरे उत्पाद तैयार करना शुरू कर दिया है।”

आदिवासी अपने हाथों से सभी चीजें तैयार करते हैं। उनके प्रोडक्ट्स (Forest products) में बीवैक्स से बने साबुन, हेयर ऑयल, दुर्लभ जंगली खाद्य पदार्थ और बांस से बनी कई तरह की चीजें शामिल हैं। डॉ. मंजू फिलहाल, करिक्कडव, अनापंथम, चिमोनी, कालीचित्र, आदिचिलथोट्टी और वज़ाचल जैसे गांवों के आदिवासियों के साथ काम कर रही हैं।

इन प्रोडक्ट्स को बेचने के लिए उनके पास एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी है। जिसकी वजह से सामाजिक उद्यम को पूरे भारत से ऑर्डर मिल रहे हैं। डॉ मंजू कहती हैं, “हालांकि बिज़नेस अभी अपनी शुरुआती दौर में है। लेकिन ऑर्डर की संख्या लगातार बढ़ रही है। पहले हमें एक महीने में एक ऑर्डर मिलता था, अब यह बढ़कर तीन गुना हो गया है। हमें हाल ही में 400 साबुन का ऑर्डर मिला है, जो पिछले वाले से दोगुना है। हम ट्राइब्स इंडिया जैसे ऑफलाइन स्टोर और हवाई अड्डों पर भी इन उत्पादों को पहुंचा रहे हैं।”

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होटल और ब्रांड्स का साथ

Forest post tribe sustainable
Shatavari

फॉरेस्ट पोस्ट से जुड़ी कनकम्मा कहती हैं, “मैंने गांव की अन्य महिलाओं से बांस की टोकरी (Forest products) बनाना सीख लिया है। हम जंगल से बांस खरीदते हैं और उससे कई तरह की चीजें बनाते हैं और फिर उन्हें फॉरेस्ट पोस्ट के जरिए बेचते हैं। अब हम ज्यादा कमाई कर पा रहे हैं।”

डॉ मंजू का कहना है कि कंपनी, अब होटल और दूसरे कई ब्रांड्स के साथ काम करने के प्रयास में लगी है। ये समान की अच्छी कीमत देते हैं और पर्यावरण को लेकर जागरूक भी हैं।

एक बिज़नेस के तौर पर यह उनका पहला प्रयास था इसलिए कई गलतियां भी हुईं। लॉजिस्टिक, कच्चे माल की खरीद, मजदूरी और पूंजी लगाने में कोई न कोई कमी रह जाती थी। उन्होंने बताया, “हमें ब्राण्ड की रणनीति, प्रॉडक्ट की मार्केटिंग और बिज़नेस के अन्य पहलुओं को लेकर यूएनडीपी से काफी मदद मिली है।”

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डॉक्टर मंजू के अनुसार, “हमारे ब्रांड की एक खास पहचान है और हम पर्यावरण को बचाने को लेकर मजबूती के साथ खड़े हैं। हम पाम ऑयल के खिलाफ़ हैं और पारंपरिक संसाधनों का उपयोग कर सामान तैयार करना, हमारे उस विरोध का ही एक चेहरा है। हम नहीं चाहते कि थोड़े से फायदे के लिए वर्षा वनों को पाम के पेड़ों से ढक दिया जाए।”

जंगल बचाना है मकसद

एक सवाल डॉ. मंजू को लगातार परेशान करता रहा है और वह सवाल है, “ऑर्डर की संख्या बढ़ने पर संसाधनों का भारी दोहन।” इसे लेकर वह काफी परेशान थीं। उन्होंने बताया, “हमने जंगल से लिए जाने वाले किसी भी तरह के संसाधन पर लगाम लगाने के लिए एक निश्चित संख्या तय की हुई है। मसलन आप क्वीन सागा को ही ले लें। यह एक दुर्लभ वन उत्पाद है और इससे बने प्रोडक्ट (Forest products) काफी फायदे का सौदा हैं। ऐसे में इसका बेतहाशा इस्तेमाल न हो, इसके लिए हमने तय किया है कि इसे सीजन और एक तय सीमा के भीतर ही जंगल से लिया जाए।”

वह कहती है, “इस बिज़नेस के जरिए हम एक उदाहरण लोगों के सामने लाना चाहते हैं कि आदिवासी, जंगलों के भविष्य को खतरे में डाले बिना भी अपने आमदनी के रास्ते तलाश सकते हैं और पर्यावरण संरक्षण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।”

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अधिक जानकारी के लिए 8281503356 पर कॉल करें या यहां क्लिक करें।

मूल लेखः हिमांशु नित्नावरे

संपादनः अर्चना दुबे

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