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दूध के पैकेट से लेकर टूटे हुए फर्नीचर तक, स्कूल टीचर ने किया सबका इस्तेमाल

सी एम नागराज, बेंगलुरु के गवर्नमेंट हाई स्कूल डोड्डबनहल्ली में स्कूल टीचर हैं। हाल ही में पर्यावरण बचाने की उनकी पहल के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

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एक व्यक्ति जिसने टीचिंग के ‘टी’ के असली मतलब को समझा और उसका अनुसरण किया, वह हैं बेंगलुरु के सी एम नागराज। एक सरकारी स्कूल में टीचर नागराज आठवीं, नौवीं और दसवीं के छात्रों को विज्ञान पढ़ाते हैं। लेकिन उनके पढ़ाने का तरीका बिल्कुल अलग है। उन्होंने किताबों में दी गई जानकारी को बच्चों को रटाया नहीं, बल्कि उन्हें एक हेल्दी लाइफस्टाइल से जोड़कर प्रैक्टिकल नॉलेज दिया।

नागराज को उनके इस काम के लिए, शिक्षक दिवस (5 सितंबर) पर राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें यह पुरस्कार, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु संकट को लेकर उनकी पर्यावरण के प्रति जागरूक पहल के लिए दिया गया है। इस दौरान, शिक्षा मंत्रालय ने साइंस पढ़ाने के उनके इनोवेटिव तरीके की तारीफ की और गवर्नमेंट हाई स्कूल डोड्डबनहल्ली का खासतौर पर जिक्र भी किया।

नागराज ने द बेटर इंडिया को बताया, “टीचिंग करते हुए मुझे 15 साल हो गए हैं। इन सालों में मैंने हमेशा विषय को रोचक और मजेदार बनाने की कोशिश की है।”

किया कुछ ऐसा, जिससे सब हुए प्रभावित

C M Nagaraja, a school teacher from Bengaluru working for Global warming
C M Nagaraja

नागराज ने साल 2018 में इस स्कूल को ज्वॉइन किया था। स्कूल में उनके विचार सबको खूब पसंद आए और प्रोत्साहन भी मिला। लेकिन पैसों की कमी के कारण वह उन पर समय से काम नहीं कर पाए। फिर नागराज ने काफी सोच-विचार के बाद शहर के कुछ गैर सरकारी संगठनों से संपर्क किया।

लेकिन इसके लिए उन्होंने अपने काम को रोका नहीं। वह लगातार वेस्ट मैनेजमेंट प्रोग्राम पर काम कर रहे थे। मेटल की टूटी पुरानी कुर्सी और टेबल को फिर से काम के लायक बनाने में लग गए। उन्होंने ऐसे टूटे हुए 20 तरह के फर्नीचर को अख़बार पढ़ने के स्टैंड, एक प्रोजेक्टर स्क्रीन, डायस, पोडियम, नेम प्लेट और अलमारी में बदल दिया।

दूध के पाउच से कंप्युटर सिस्टम के लिए कवर 

Milk puches upcycled into computer covers
Desktop covers made of milk packets

नागराज कहते हैं, “मिड डे मील योजना में बच्चों को दूध बांटा जाता है। दूध के खाली पड़े पाउच को यूं परिसर में पड़ा देख, मेरे मन में इनसे कुछ करने का विचार आया। मैंने उनके बारे में सोचना शुरु किया। स्कूल के कई बच्चों के माता-पिता सिलाई का काम करते हैं। मैंने खाली पैकेट इकट्ठा किए और उनकी मदद से कुछ अलग प्रोडक्ट तैयार करने की योजना बनाई।”

कुछ हफ्ते बाद, फेंके गए दूध के खाली पाउच से कंप्यूटर सिस्टम के लिए 20 नए व स्टाइलिश कवर बनकर तैयार थे। नागराज के काम करने के तरीके और उनके विचारों से प्रभावित होकर पांच गैर-सरकारी संगठन उनके साथ जुड़ गए। सबसे पहले उन्होंने कागज और प्लास्टिक के कचरे के लिए दो बायो-वेस्ट कन्वर्टर्स और डिब्बे खरीदे।

वह बताते हैं, “एक कन्वर्टर, पत्तियों और खेती के कचरे के लिए है। यह कचरा हम आस-पास के खेतों से इकट्ठा करते हैं और दूसरा, स्कूल की रसोई से निकलने वाले कचरे के लिए। छह से आठ महीनों में हमने इकट्ठा किए गए कचरे से एक टन खाद बना ली थी। इस खाद का इस्तेमाल हमने अपने एक एकड़ के बगीचे में किया। हमने एक साल में, 58 किलो प्लास्टिक और कागज का कचरा इकट्ठा करके लोकल रीसाइकलर को दिया था।”

पानी को किया री-यूज

 C M Nagaraja being awarded
C M Nagaraja being awarded

नागराज ने सिर्फ कचरे का ही निबटारा नहीं किया, बल्कि बारिश के पानी और इस्तेमाल किए जा चुके पानी को इकट्ठा करने के लिए स्कूल में पांच अंडर ग्राउंड वॉटर रिचार्जिंग पिट भी बनवाई। यह पानी, पीने लायक तो रहता नहीं है, इसलिए इसे बाकी कामों में इस्तेमाल किया जाने लगा। 

उन्होंने बताया कि स्कूल में बर्तन धोने और पौधों को पानी देने के लिए रोजाना 1500 लीटर पानी की खपत होती है। इसे यूं ही बेकार नाली में बहा देने के बजाय हम इसे एक गड्ढे में स्टोर करते हैं।

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वह कहते हैं, “गड्ढा पूरी तरह भर जाने के बाद, पानी को 4,500 लीटर के एक टैंक में डाल दिया जाता है। इस टैंक की तलहटी में पत्थर भरे हैं ताकि पानी को साफ किया जा सके। पानी तीन चार दिनों तक टैंक में ही भरा रहता है। जब सारा कचरा नीचे तली में बैठ जाता है, तब पंप की मदद से पानी को बाहर निकालकर, एक बार फिर से इस्तेमाल करते हैं। यह प्रक्रिया यूं ही निरंतर चलती रहती है।”

स्कूल में ड्रिप इरीगेशन सिस्टम 

Nagaraja with composting pit
Nagaraja gives lessons on waste management

पौधों को पानी देते समय ज्यादा पानी खर्च न हो, इसके लिए नागराज ने बच्चों की मदद से ड्रिप इरीगेशन सिस्टम तैयार किया है।

नागराज को हमेशा से कचरे को प्राकृतिक तरीके से निपटाने या कहें कि किसी न किसी रूप में इसे फिर से इस्तेमाल करने की आदत रही है। अपनी इस आदत को उन्होंने स्कूल में भी बरकरार रखा है। वह पानी की फेंकी गई खाली बोतलों से छात्रों के लिए केमिस्ट्री किट बनाने में सक्षम थे। उन्होंने इन बोतलों से मिनी पोर्टेबल किट तैयार की। इस किट की मदद से अब छात्र घर पर भी केमिकल एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं।

सरकारी स्कूलों के प्रति बदला नजरिया

भारत में आमतौर पर सरकारी स्कूलों को बेहतर नहीं माना जाता। हालांकि पिछले कुछ सालों में इन स्कूलों में बदलाव देखने को मिले हैं और यह बदलाव, नागराज जैसे शिक्षकों के नए नजरिये और मेहनत का नतीजा हैं, जिन्होंने आम सोच से हटकर कुछ अलग करने का विचार अपनाया और उसके लिए कड़ी मेहनत की।

नागराज का कहना है, “किसी भी विषय को लेकर बच्चों में रुचि है या नहीं, यह उस विषय को कैसे पढ़ाया जाता है इस पर भी निर्भर करता है। ध्यान रखें कि एक शिक्षक छात्र पर स्थायी प्रभाव डाल सकता है, एक ऐसा प्रभाव जो हमेशा उनके साथ बना रहता है।”

मूल लेखः गोपी करेलिया

संपादनः अर्चना दुबे

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