छत को कराया वाटरप्रूफ और लगा दिए 100 से भी ज़्यादा फल-सब्जियों के पेड़-पौधे

पिछले दो सालों से बागवानी कर रहे डॉ. प्रदीप एक ऑर्थोपेडिक डॉक्टर हैं और अपना खुद का अस्पताल चलाते हैं। उनके घर में 150 से ज्यादा पेड़-पौधे हैं।

अक्सर लोग अपने घर की छत पर दो-चार गमले रखने में भी कतराते हैं। उन्हें डर होता है कि कहीं छत पर वजन ज्यादा न हो जाए या कहीं पानी के कारण सीलन न आने लगे। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे शख्स से मिलवाने जा रहे हैं, जो अपनी छत पर गमले में बागवानी तो कर ही रहे हैं, साथ ही छत पर एक छोटा सा खेत भी बना रखा है। घर के निर्माण के समय ही, उन्होंने तय कर लिया था कि वह छत को इस तरह तैयार कराएंगे कि बागवानी करने में समस्या न हो। 

यह कहानी है हल्द्वानी (उत्तराखंड) के डॉ. प्रदीप पांडे की। पिछले दो सालों से बागवानी कर रहे, डॉ. प्रदीप एक ऑर्थोपेडिक डॉक्टर हैं और अपना खुद का अस्पताल चलाते हैं। द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया कि हल्द्वानी में जब उन्होंने अपना घर बनाया, तो पहले से ही तय कर लिया था कि इसमें बागवानी की जगह होगी। हालांकि, सबसे नीचे उन्होंने अपने प्रैक्टिस के लिए अस्पताल बनाया और उसके ऊपर अपना घर। इसलिए उन्होंने छत पर ही बागवानी करने का फैसला किया। ज्यादातर लोग छत पर बागवानी के लिए क्यारियां बनवा लेते हैं। लेकिन प्रदीप और उनके परिवार ने लगभग 900 स्क्वायर फ़ीट में खेत भी बनाया है।

छत को वाटर-प्रूफ कर बनाया खेत

डॉ. प्रदीप बताते हैं कि उन्होंने अपने इंजीनियर से कहकर छत को वाटर प्रूफ कराया ताकि बागवानी में कोई समस्या न हो। इसके बाद, उन्होंने एक हिस्से में पत्थरों से मेढ़ जितनी दीवार बना दी। फिर इस जगह में मिट्टी भरकर बागवानी शुरू की। अब यह जगह उनकी छत पर छोटे से खेत की तरह है। जिसमें उन्होंने लताओं के लिए लोहे के पोल/खंबे भी लगाए हैं। इस खेत के अलावा, उन्होंने ड्रम और गमलों में भी अलग-अलग तरह के पेड़-पौधे लगाए हुए हैं। 

उनकी छत पर आपको सभी तरह की मौसमी सब्जियां भी देखने को मिलेंगी। वह टमाटर, प्याज, लहसुन, हल्दी, लौकी, करेला, बैंगन, शिमला मिर्च, बीन्स, मटर जैसी सब्जियां उगा रहे हैं। एक ही बार में वह कई तरह की सब्जियां अपने इसे छोटे से खेत में लगा लेते हैं। जैसे नीचे वह हल्दी, लहसुन, प्याज आदि लगाते हैं और इनके साथ कुछ लताओं वाली सब्जियां।

कुछ सब्जियां मिट्टी के अंदर लगती हैं तो कुछ ऊपर लताओं में। उन्होंने बताया कि उन्हें अपनी इस थोड़-सी जगह से ही काफी अच्छा उत्पादन मिल रहा है। जैसे बात अगर प्याज, लहसुन की करें तो उन्हें एक बार की फसल से लगभग तीन महीने की प्याज, लहसुन मिल जाती है। इसके अलावा, अपने बगीचे में उगी हल्दी का पाउडर भी उन्होंने लगभग एक-डेढ़ महीने तक इस्तेमाल किया है। 

वह कहते हैं, “हमें बगीचे से हफ्ते में लगभग तीन-चार दिन की सब्जियां मिल जाती हैं। इसलिए अगर किसी का परिवार छोटा है और उनके पास जगह है तो वे आसानी से बिना कोई रसायन इस्तेमाल किए अपने लिए खुद साग-सब्जियां उगा सकते हैं।”

लगाए हैं सेब, अनार, आड़ू जैसे फलों के पेड़ भी

सब्जियों के बाद, बात आती है फलों की। डॉ. प्रदीप कहते हैं, “उत्तराखंड के थोड़े गर्म इलाकों में हल्द्वानी आता है। क्योंकि यहां तापमान थोड़ा ज्यादा रहता है। लेकिन फिर भी हम अपने घर में सेब लगाने में कामयाब रहे। हमारे पास सेब के दो पेड़ हैं और इन पर अच्छे फल लग रहे हैं। इसके अलावा, बगीचे में अनार, नींबू, माल्टा, आड़ू, अंजीर, अमरुद, अंगूर, आंवला जैसे फलों के पेड़ भी हैं। ज्यादातर पेड़ों पर फल आने लगे हैं। इनसे हमें घर के अच्छे और ताजे फल खाने को मिल रहे हैं। कुछ समय पहले मैंने ट्रायल के तौर पर काफल का पौधा भी लगाया है।”

काफल उत्तराखंड का क्षेत्रीय फल है, जो ज्यादातर ठंडे इलाकों में मिलता है। लेकिन डॉ. प्रदीप का कहना है कि उनका लगाया काफल का पौधा काफी अच्छे से विकसित हो रहा है। उन्हें उम्मीद है कि इसमें फल भी आएंगे। फलों के पौधों के अलावा उन्होंने अपने बगीचे में कुछ फूलों के भी पेड़-पौधे लगाये हुए हैं। जैसे वाटर लिली, गेंदा, गुलाब आदि। उनका पूरा परिवार बागवानी में उनकी मदद करता है। उन्होंने कहा कि अपने काम में वह काफी व्यस्त रहते हैं। लेकिन फिर भी बागवानी के लिए समय निकाल लेते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि सुबह और शाम में वह कुछ समय प्रकृति के बीच ताज़ी हवा लेते हुए बिताएं। इससे उन्हें मानसिक शांति और सुकून मिलता है। 

“आजकल हम लोगों का पूरा ध्यान शारीरिक फिटनेस पर है। लेकिन अपने मानसिक स्वास्थ्य पर हम ध्यान नहीं दे रहे हैं। इस वजह से हमारे जीवन में नकारात्मकता और तनाव होने लगता है। इस सबसे निकलने का एक अच्छा तरीका बागवानी है। इसलिए ज्यादा न सही लेकिन थोड़े-बहुत पौधे अपने आसपस जरूर लगाएं। इससे आपका मन बहुत खुश रहेगा”, उन्होंने कहा।

डॉ. प्रदीप बताते हैं कि वह बागवानी के कोई एक्सपर्ट नहीं है। वह ज्यादातर चीजें यूट्यूब से देखकर ट्राई करते हैं और अपने अनुभव से सीख रहे हैं। इसलिए वह बगीचे की देखभाल के लिए बहुत ज्यादा चीजें नहीं करते हैं। उनके नियम बहुत ही आसान और साधारण हैं। उन्होंने बताया, “अक्सर लोगों को देखता हूं कि वे तरह-तरह की मिट्टी और खाद बनाते हैं। लेकिन मेरे पास इतना समय नहीं होता। इसलिए मैं बहुत ही बेसिक चीजों में काम करता हूं। जैसे सबसे पहले शुरुआत में हमने जो मिट्टी तैयार की थी, उसे ही अब तक इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके अलावा, एक ही चीज पोषण के लिए हम पौधों में डालते हैं और इससे अच्छे नतीजे मिल रहे हैं।”

मिट्टी तैयार करने के लिए उन्होंने 40% मिट्टी, 30% कोकोपीट और 30% गोबर की खाद का इस्तेमाल किया था। इसके अलावा, वह पौधों की जरूरत के हिसाब से नियम से पानी देते हैं। बीच-बीच में पौधों में से अनचाहे पौधे जैसे खरपतवार को हटाते रहते हैं। पोषण के लिए वह मुख्य रूप से सरसों खली का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने बताया कि वह बीच-बीच में सरसों खली, गुड़ और साग-सब्जियों के छिलकों आदि से तरल खाद बनाकर पौधों को देते हैं। इसके अलावा, उन्हें और कोई चीज डालने की जरूरत नहीं पड़ती है।  इसलिए वह लोगों को सलाह देते हैं कि छोटे स्तर से गार्डनिंग शुरू करें और कम से कम चीजों में अपने यहां पेड़-पौधे लगाएं। 

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संपादन- जी एन झा

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