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नारियल के साथ आम, जायफल, हल्दी, काली मिर्च की Intercropping से हुआ 13 लाख का मुनाफा

राजस्थान के एटॉमिक पावर स्टेशन में एक ठेकेदार के तौर पर काम करनेवाले, एस शिवगणेश ने 2010 में नौकरी छोड़कर किसानी करने की ठानी। अब वह एक सफल किसान हैं। खेती में Intercropping से उन्हें सालाना 16 लाख रुपये की कमाई हो रही है।

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एस शिवगणेश, 2006 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके राजस्थान के एटॉमिक पावर स्टेशन में एक ठेकेदार के तौर पर काम कर रहे थे। लेकिन 2010 में, वह अपनी नौकरी छोड़कर केरल और तमिलनाडु की सीमा पर स्थित अपने घर मीनाक्षीपुरम लौट गए। उनके परिवार के पास खेती के लिए लगभग 27 एकड़ जमीन थी, जहां उन्होंने नारियल की खेती करने और उसी का निर्यात करने का फैसला किया। अगले कुछ सालों तक, उन्होंने बिजनेस में काफी उतार-चढ़ाव देखें। क्योंकि, UK के व्यापारी या खरीदार समय पर उन्हें निर्यात किये गए माल के पैसे नहीं देते थे। इसके बाद, शिवगणेश ने जैविक खेती करने का फैसला किया, जिसके लिए उन्होंने अपने पिता से छह एकड़ जमीन मांगी। कुछ समय बाद, उन्हें सालाना 16 लाख रुपये की कमाई होने लगी, जिसमें सीधा 13 लाख रुपये का मुनाफा ही था। उनके प्रयासों की सराहना करते हुए, राज्य सरकार ने उन्हें 2020 में ‘केरा केसरी पुरस्कार’ से भी नवाज़ा। द बेटर इंडिया के साथ बात करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी सफलता का राज, कुछ कृषि तकनीकें हैं। इनमें, इंटरक्रॉपिंग (Intercropping) विधि यानी एक साथ कई फसलें उगाने का तरीका, ड्रिप इरीगेशन तकनीक यानी टपक सिंचाई और खेती से जुड़े दूसरे तरीके शामिल हैं।

जैविक खेती और नयी तकनीक बनी सफलता की वजह

36 वर्षीय शिवगणेश कहते हैं, “मैंने 1600 नारियल के पेड़ों के साथ, इंटरक्रॉप के रूप में जायफल लगाया और अपने छह एकड़ के खेत में आम, हल्दी, काली मिर्च और सुपारी के पौधे भी लगाए हैं। मैंने सभी फसलों को उगाने के लिए, जैविक तरीकों का ही इस्तेमाल किया है।” शिवगणेश ने आगे कहा कि पानी को सही तरीके से इस्तेमाल करने और मजदूरी की लागत को कम करने के लिए, वह अपने खेतों में ड्रिप इरिगेशन के साथ फर्टिगेशन करते हैं। फर्टिगेशन तकनीक में, पानी में खाद को मिलाकर सिचाई से पौधों तक पहुँचाया जाता है। 

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शिवगणेश के खेत के नारियल

आगे चलकर शिवगणेश ने बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए दो तालाब बनाए और रोहू, तिलापिया, कतला, नट्टर, मृगल (व्हाईट कार्प) और दूसरी सामान्य प्रजातियों की मछलियां पालने लगे।

उन्होंने बताया, “विज्ञान पर आधारित तकनीकें इस्तेमाल करने से मुझे अच्छे नतीजे मिलने लगे। मैंने मुर्गीपालन शुरू किया और पशुओं को पोषण देनेवाली चीजों को बनाना और बेचना शुरू किया। जैसे- नीमखली की यूनिट और गायों के लिए हरा चारा। इसके अलावा, मैंने तीन हजार जायफल और आम के पौधों की नर्सरी भी तैयार की। मैं इन सभी से प्रति एकड़ दो लाख रुपये कमा लेता हूँ।”



क्या नौकरी छोड़ना सही फैसला था?

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शिवगणेश अपने तालाब के पास

शिवगणेश का कहना है कि आज भले ही उन्हें अपने कामों के लिए, गाँव के लोगों से बहुत प्रशंसा और सराहना मिलती है, लेकिन जब उन्होंने खेती करने का फैसला किया था, तब ऐसा नहीं था। वह कहते हैं, “जब मैंने अपनी नौकरी छोड़ी थी, तब गाँव के सभी युवाओं में आईटी सेक्टर में नौकरी करने की होड़ लगी हुई थी। कॉर्पोरेट नौकरी करने के लिए शहर चले जाना, एक समझदार और जरूरी कदम माना जाने लगा था। मुझे गाँववालों ने कहा कि मैंने गाँव वापस लौटकर गलती कर दी। खुद को आलोचना से बचाने के लिए, मैंने सामाजिक कार्यक्रमों या गाँव के किसी भी समारोह में जाना छोड़ दिया था।”

वह कहते हैं, “हालांकि, मेरी सफलता के पीछे सबसे बड़ा हाथ मेरे माता-पिता का है, क्योंकि उन्होंने मुझे हर तरह से सपोर्ट किया है।”

शिवगणेश ने बताया कि उन्हें अपने फैसले पर कभी पछतावा नहीं हुआ। वह बताते हैं, “मैं अपने विचारों के साथ एक्सपेरिमेंट कर सकता था और उन्हें लागू भी कर सकता था। मैंने अपनी उपज की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए अलग-अलग तरीकों से एक्सपेरिमेंट और इनमें सुधार करके, नये तरीके ढूंढे। मैंने समय का अच्छे से प्रबंधन करके तनावमुक्त जीवन जिया है। आज मुझे अपने काम से काफी संतुष्टि मिलती है।”

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वह गाँव के दूसरे किसानों को भी टिप्स देते रहते हैं। वह कहते हैं, “मैं अपनी सफलता को अपने तक ही सीमित नहीं रखना चाहता। मुझसे कई किसान सलाह लेते हैं और मुझे उन्हें ये सब बताने में ख़ुशी मिलती है।”

अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में शिवगणेश कहते हैं कि वह आगे, नारियल से यार्न मैन्युफैक्चरिंग और कई नये आईडियाज़ के साथ एक्सपेरिमेंट करेंगे। अंत में वह कहते हैं, “मुझे खेती में एक्सपेरिमेंट और इसकी सफलता से बहुत ज्यादा खुशी मिलती है।”

मूल लेख: हिमांशु नित्नावरे

संपादन- जी एन झा

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