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सिक्किम: 20 ट्रक कचरा निकालकर, पीने योग्य बना दिया झील का पानी, एक युवक की प्रेरक कहानी

यह प्रेरक कहानी सिक्किम के एक युवक, संगे लामा की है, जिन्होंने लोगों की मदद से त्सोमगो झील (tsomgo lake sikkim) को कचरा मुक्त कर दिया है।

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दुनिया में सबसे ज़्यादा कचरा उत्पन्न करने वाले देशों में भारत का नाम भी शामिल है। भारत में हर साल करीब 277.1 मिलियन टन कचरा उत्पन्न होता है। सरकार ने प्रभावी रूप से कचरा प्रबंधन के लिए कई जागरूकता अभियान चलाए हैं, लेकिन कमोबेश सभी विफल ही रहे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि इस संबंध में शहरों में रहनेवाले लोग अभी भी जागरूक नहीं हुए है, जिसका खामियाजा पर्यावरण को उठाना पड़ता है। लेकिन, इन सबके बावजूद देश में कुछ ऐसे इलाके हैं, जिनसे हम सब बहुत कुछ सीख सकते हैं। ऐसी ही एक कहानी आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं। यह प्रेरक कहानी सिक्किम के एक युवक, संगे लामा की है, जिन्होंने लोगों की मदद से त्सोमगो झील (tsomgo lake sikkim) को कचरा मुक्त कर दिया है।

गंगटोक से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित त्सोमगो झील (tsomgo lake sikkim) के इलाके से कचरा प्रबंधन के मामले में बहुत कुछ सीखा जा सकता है। यहाँ के लोग 12,406 फीट ऊंचाई पर रहते हैं और कचरा प्रबंधन या फिर रिसायकिलिंग इकाइयों तक इनकी पहुँच भी नहीं है, लेकिन इन सबके बावजूद tsomgo lake sikkim में जाने वाले कचरे का प्रबंधन करने में स्थानीय युवा संगे लामा सफल रहे हैं और ऐसा करके वह जैव विविधता की रक्षा भी कर रहे हैं।

त्सोमगो झील (tsomgo lake sikkim) को चंगु झील के नाम से भी जाना जाता है। यह जल निकाय भारत और चीन को जोड़ने वाले गंगटोक-नाथुला राजमार्ग के साथ प्राचीन सिल्क रूट पर राज्य के पूर्वी भाग में स्थित है। यह झील करीब 1.5 किमी लंबी और 500 मीटर चौड़ी है।

यह रणनीतिक रूप से, राज्य की राजधानी, गंगटोक से लगभग 40 किमी और प्रसिद्ध पर्यटक स्थल नाथू ला से 16 किमी दूर स्थित है। झील (tsomgo lake sikkim) का लोकेशन कई लोगों को आकर्षित करता है। हर साल लाखों पर्यटक वहाँ घूमने जाते हैं, जो इसे और संवेदनशील बनाता है। एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल के अलावा यह तीन गांवों, थेगु, चांगु और चिप्सू के बसने वाले लगभग 270 घरों की पानी की जरूरतों को पूरा करने का भी एकमात्र साधन है।

2000 के दशक की शुरुआत में भारी संख्या में पर्यटकों के आने और बढ़ती लोकप्रियता के साथ, झील (tsomgo lake sikkim) की स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी। आने वाले पर्यटक यहाँ की खूबसूरती का मजा लेते औऱ बड़ी ही लापरवाही से खाने-पीने का सामान छोड़ जाते। झील और उसके आस-पास खाली दूध के डिब्बे, नाश्ते के पैकेट, बिस्कुट के रैपर, प्लास्टिक की बोतलें, टेट्रा पैक, मल और अन्य अपशिष्ट भरने लगे। झील के किसी भी हिस्से में आप नजर घुमाते, इसे आप कचरे से घिरा हुआ ही पाते। इसके अलावा, पर्यटकों की भारी संख्या को देखते हुए यहां रहने वाले स्थानीय लोगों ने पास ही 180 दुकानें भी खोल ली थी, जिस कारण प्रदूषण भी बढ़ रहा था।

हालांकि, 2006 के बाद से, स्थानीय लोगों ने लगातार प्रयास किए और झील (tsomgo lake sikkim) को पुनर्जीवित करने के लिए कड़े नियम लागू किये। इलाके के एक स्थानीय, संगे लामा ने आने वाले पर्यटकों को कचरा प्रबंधन प्रथाओं का पालन करने के लिए कहा और कचरा फैलाने से रोका।

सफाई में लगे हाथ

tsomgo lake sikkim

संगे लामा ने द बेटर इंडिया को बताया, “अंडाकार आकार की ये झील पहाड़ों से घिरी हुई है और सर्दियों के महीनों में बर्फ से लदी रहती है। इसे देखकर किसी का भी दिल खुश हो जाता है।”

वह कहते हैं कि 2006 के आसपास चीजें हाथ से निकल गईं। उसी साल अगस्त में, राज्य सरकार ने कदम बढ़ाया और सभी हितधारकों को एक साथ लाने के निर्देश जारी किए और झील के संरक्षण कार्य के लिए दिशा-निर्देश तैयार किए। आदेश में गैर-सरकारी निकाय का गठन करने की बात की गयी, जो एजेंसियों के साथ मिलकर झील संरक्षण का काम करेगी।

दूसरी तरफ, संगे ने हाल ही में कॉमर्स में ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी की थी और गंगटोक में एक बैंक में पार्ट-टाइम नौकरी कर रहे थे। ग्राम पंचायत ने उन्हें निकाय बनाने और कार्यालय सचिव के रूप में कार्यभार संभालने की पेशकश की। 37 वर्षीय इस युवक ने वन विभाग, वर्ल्ड वाइड फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ), पर्यावरण और वन्यजीव प्रबंधन के अधिकारियों, ड्राइवरों एसोसिएशन, दुकान मालिकों के एसोसिएशन और ग्राम पंचायत के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर एक झील संरक्षण समिति, त्सोगो पोखरी संरक्षण समिति (TPSS), का गठन किया।

सागे बताते हैं कि गाँव के बड़े-बुजुर्गों ने हमेशा झील की रक्षा करने और उसे साफ रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है। वह कहते हैं, “इस क्षेत्र में यह झील ही आजीविका का एकमात्र साधन है। अगर हम इसे बचाने में नाकाम रहे, तो इसका सीधा असर हमारे जीवन पर पड़ेगा। झील को कब्जे में लेते हुए, TPSS ने इसे साफ करने और इसे सालों तक संजोये रखने के लिए कई उपाय किए हैं।”

वह कहते हैं, “TPSS का गठन 2008 में किया गया था। पहले बदलाव के रुप में झील की सीमाओं से सटे दुकानों को दूर हटाया गया। सभी दुकानों और पर्यटकों के लिए एक समर्पित स्थान आवंटित किया गया।”

इसके बाद झील से कीचड़ निकालने का काम किया गया, जिससे जल वहन क्षमता को बढ़ाने में मदद मिली। उन दिनों को याद करते हुए संगे कहते हैं, “हमने एक सप्ताह में करीब 20 ट्रक कचरा हटाया। सफाई के लिए जागरूकता कार्यक्रम शुरु किया गया और बताया गया कि कैसे झील में कचरा जाने से रोका जा सकता है।”

उदाहरण बनाना

tsomgo lake sikkim

संगे कहते हैं कि एक ‘अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली’ लागू की गई थी, जिसका अभ्यास आज भी वहाँ किया जाता है। वह कहते हैं, “क्षेत्र में उत्पन्न सभी कचरे को डिब्बों में एकत्र किया जाता है। दिन में दो बार, सुबह आठ और शाम के चार बजे, कचरा उठाने के लिए ट्रक आते हैं। वहाँ 52 दुकानें हैं, जो खाने-पीने की चीज़ें, हस्तशिल्प और अन्य व्यावसायिक रूप से आकर्षक वस्तुएं बेचती हैं, और प्रत्येक दुकान लगभग 4 किलो सूखा और 2 किलो गीला कचरा उत्पन्न करती है। ट्रक यहाँ से कचरा इकट्ठा करती है और फिर इसे 32, मार्टम डंपिंग और रिकवरी सेंटर में पहुँचा देती है।”

पर्यटकों से ‘पोखरी संरक्षण शुल्क’ या झील संरक्षण शुल्क के रूप में 10 रुपये लिए जाते हैं। यह कचरे के परिवहन और प्रबंधन के खर्चों को पूरा करने में मदद करता है।

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संगे बताते हैं, “कचरे का प्रबंधन करने के लिए राजस्व का आधा हिस्सा सरकार को जाता है। बाकि की राशि TPSS द्वारा अन्य गतिविधियों पर खर्च की जाती है, जिसमें संकट में पर्यटकों की मदद करने और रखरखाव की लागत को कवर करने सहित, जागरूकता कार्यक्रम और सामुदायिक कार्य शामिल है।”

संगे आगे बताते हैं कि पर्यटकों को प्लास्टिक की बोतलें लाने से रोका जाता है और दुकानें भी इस तरह के सामान बेचने से बचती हैं। कप नूडल्स भी प्रतिबंधित हैं। वह कहते हैं, “पीने के पानी के लिए स्टील के ग्लास के साथ प्रत्येक दुकान पर एक आरओ वॉटर फिल्टर सिस्टम रखा गया है। ड्राइवर भी उतने ही संवेदनशील हैं। जब पर्यटक वाहनों में चढ़ते हैं तो ड्राइवर उन्हें कचरे के लिए बैग देते हैं। इसके बाद कचरा जमीन पर नहीं बल्कि थैलियों में फेंका जाता है। यात्रा के अंत में इन बैगों को डिब्बे में डाल दिया जाता है। दिन में कुछ गार्ड झील क्षेत्र में गश्त लगाते हैं और पर्यटकों को कचरा फेंकने से रोकते हैं।”

संगे लामा का कहना है कि झील और इसके आसपास के इलाके को कचरा मुक्त बनाने के लिए एक प्रणाली विकसित की जरूरत है, क्योंकि पर्यटकों की संख्या काफी ज़्यादा होती है। 2008-09 में यहाँ तीन लाख पर्यटक आए थे, जबकि 2018-19 में यह संख्या पाँच लाख से अधिक हो गई। हालाँकि, COVID-19 संकट के कारण यह संख्या 2020 में करीब दो लाख ही दर्ज की गई है।

वह कहते हैं, “जरा सोचिए कि कितनी भारी मात्रा में हम कचरा उत्पन्न करते हैं। लेकिन इसे प्रत्येक स्तर पर अलग और प्रबंधित किया जाता है और एक बिंदु पर निपटाया जाता है। ग्रामीण भी इसमें पूरा सहयोग करते हैं।”

हालांकि, संगे का कहना है कि इलाके को कचरा मुक्त बनाना आसान नहीं था। वह कहते हैं, “लोगों की मानसिकता को बदलना हमेशा मुश्किल होता है। जब हमने जागरूकता अभियान शुरू किया, तो बहुतों ने उनके महत्व को नहीं समझा। धीरे-धीरे कुछ स्थानीय लोगों ने सहयोग करना शुरू किया। जैसा कि ग्रामीणों ने सीखा कि झील के संरक्षण से उनके जीवन और पर्यटन पर क्या प्रभाव पड़ेगा, उन्होंने इसदिशा में काम करना शुरू कर दिया। शुरू में, वे पर्यटकों के साथ सख्त होने के बारे में संकोच कर रहे थे। लेकिन अब वे जोर देते हैं और अनुशासन को लेकर काफी सख्त हैं।”

ग्रामीणों को एक और परेशानी का सामना करना पड़ा। झील के पास एक आर्मी स्टेशन है, जहाँ से काफी सारा कचरा झील में जाया करता था। संगे ने कहा कि अधिकारियों के साथ बैठक से संकट को हल करने में मदद मिली।

अब पर्यटक भी हुए जागरूक

tsomgo lake sikkim revived by sangay

संगे का कहना है कि धीरे-धीरे पर्यटक भी काफी ज़िम्मेदार बन गए हैं और पर्यावरण की रक्षा के महत्व को समझते हैं। वह कहते हैं, “उन्हें कभी दंडित नहीं किया गया, क्योंकि किसी व्यक्ति को जवाबदेह ठहराने के लिए कोई ट्रैकिंग तंत्र नहीं है। इसलिए, उन्हें संवेदनशील बनाना ही एकमात्र समाधान है। हालांकि, वे भी हिस्सेदार हैं और उन्हें अपनी भूमिका निभानी होगी। वर्तमान में, झील में पानी साफ है और इसका पीने के लिए भी उपयोग किया जा सकता है।”

सामुदायिक प्रयासों ने TPSS को क्रमशः 2013 और 2019 में राज्य पर्यटन विभाग द्वारा प्रदान किए जाने वाले बेस्ट क्लीन टूरिस्ट स्पॉट अवार्ड फॉर चांगु और बेस्ट क्लीन इंडिया कैंपेन अवार्ड से सम्मानित किया गया है।

क्योनगोस्ला अल्पाइन अभयारण्य में रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर और टीपीएसएस के सदस्य सचिव, कृष्ण दहल कहते हैं, “हम वार्षिक बैठक में और उपाय करने की योजना बना रहे हैं। याक से निकलने वाला जैविक कचरा अभी भी झील तक जाता है। जानवरों के कचरे को पूरे दिन साफ ​​किया जाता है। लेकिन स्थायी समाधान के लिए उन्हें जगह से दूर ले जाने की योजना है।” उन्होंने कहा कि क्षेत्र में पेड़ लगाने के लिए योजनाएं भी हैं।

एक पर्यावरणविद् और पुणे स्थित इकोलोजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के ट्रस्टी, गुरुदास नुलकर कहते हैं कि स्थानीय लोगों की सुरक्षा और हिमालय की पारिस्थितिकी का ध्यान रखना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। वह कहते हैं, “हिमालय क्षेत्र पौधों की कई स्थानिक और दुर्लभ प्रजातियों, मुख्य रूप से जड़ी बूटियों और झाड़ियों का घर है। वे उस क्षेत्र के लिए विशिष्ट हैं और अपने अजीबोगरीब सूक्ष्मजीव और सूक्ष्म पोषक तत्वों के कारण और कहीं नहीं पाए जाते हैं। इनकी रक्षा जरूरी है।”

गुरुदास कहते हैं कि झील में प्रवेश करने वाली कोई भी नई सामग्री प्रदूषण का कारण होगी, और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बिगाड़ सकती है। इसके अतिरिक्त, विषाक्त पदार्थ मिट्टी को प्रभावित करते हैं। वह आगे कहते हैं, “त्सेमगो की तरह ग्लेशियल झीलें नीचे के क्षेत्रों में पानी या झरनों का एक स्रोत भी हैं। इसलिए, उनमें प्रवेश करने वाला कोई भी प्रदूषण बड़े भौगोलिक क्षेत्र को दूषित करेगा। इसलिए, सुरक्षा और संरक्षण की ज़रुरत है।”

मूल लेख- हिमांशु नित्नावरे

संपादन- जी एन झा

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