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छत्तीसगढ़ : जिमीकंद की खेती कर महिलाओं ने किया 2 करोड़ का व्यवसाय!

र्तमान समय में महिलाओं के लिए स्वावलंबन की राह अपनाना बहुत जरुरी हो गया है। महिलाएं हर क्षेत्र में आगे जरुर बढ़ रही हैं, लेकिन देश की तरक्की के लिए आत्मनिर्भर महिलाएँ होना ज़रूरी है। महिलाएँ स्वरोजगार के लिए उद्यमी बनना स्वीकार करेंगी तभी प्रगतिशील समाज की कल्पना की जा सकती है। छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव जिले में स्वयंसहायता समूह से जुड़ी हज़ारों महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनकर अपने परिवार का सहारा बन रहीं हैं। घर के राशन के लिए पैसे नहीं होने पर जो महिलाएं दूसरे के सामने हाथ फैलाती थीं, वे आज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनकर स्वावलंबी बनने के गुर सिखा रहीं हैं। यह सब हो पाया है जिमीकंद रोपण महाअभियान से।

क्या है जिमीकंद ?

देखने में आम और मिट्टी के रंग की यह सब्‍जी जमीन के नीचे उगती है। इसे सूरन के नाम से भी जाना जाता है। जिमिकंद एक गुणकारी सब्जी है, जो सभी को स्‍वस्‍थ एवं निरोगी रखने में मदद करती है। इसके गुण इतने कि कई रोगों से मुक्ति दिला दे।

क्या है जिमीकंद रोपण महाअभियान ?

 

 

जिमीकंद रोपण महाअभियान के तहत माँ बमलेश्वरी स्वयं सहायता समूह से जुड़कर महिलाएं अपने स्तर पर जिमीकंद की खेती कर हजारों नहीं लाखों रुपए कमा रहीं हैं। इस वर्ष (2018) जिले भर के 300 गांवों में महिलाओं ने 23 लाख जिमीकंद का रोपण किया है, जिसके माध्यम से अनुमानित 10 करोड़ का व्यवसाय करेंगी। इन महिलाओं की मेहनत के बल पर आने वाले कुछ सालों में राजनांदगाँव जिला जिमीकंद के उत्पादन में नंबर वन पर होगा ।

छोटी शुरुआत ने दी बड़ी सफलता

 

1000 समूहों से की शुरुआत:

वर्ष 2014-15 में बतौर प्रयोग 1000 महिलासमूह को अपने-अपने स्तर पर जिमीकंद का उत्पादन करने के लिए प्रेरित किया गया। शुरुआत में महिलाओं ने 10, 02011 जिमीकंद का रोपण किया और इससे दो करोड़ रुपए की आमदनी हुई। अब स्वयं सहायता समूह ने दूसरों को भी आत्मनिर्भर बनाने का अभियान शुरू कर दिया। यह छोटी शुरुआत आज एक जन आंदोलन का रूप ले चुकी है और लाखों लोगों को आर्थिक एवं सामाजिक रूप से मज़बूत कर रही है ।

आत्मनिर्भर बनकर स्वावलंबी बनने के गुर सिखा रहीं

 

खैरागढ़ विकासखंड के केसला गांव की महिलाओं ने समूह से प्रेरणा लेकर जिमीकंद की खेती की और आज हजारों रुपए का आर्थिक लाभ लेते हुए दूसरों को भी इस खेती के लिए प्रेरित कर रही हैं। हुलिया बाई वर्मा ने बताया कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने से उन्हें मजदूरी करनी पड़ती थी। पर फिर समूह से प्रेरणा लेकर बीते साल घर की बाड़ी में 1 क्विंटल जिमीकंद की खेती की और आज एक अच्छी आमदनी के माध्यम से अपने बच्चों के बेहतर शिक्षा के लिए ख़र्च कर रही है ।

जिमीकंद रोपण के लिए कराई गई प्रतियोगिता

माँ बमलेश्वरी स्वयं सहायता समूह द्वारा जिमीकंद रोपण महाभियान के तहत ग्राम, क्लस्टर एवं कार्यकर्ता स्तर पर प्रतियोगिता भी कराई गयी है I इस प्रतियोगिता का मुख्य उद्देश्य जिमीकंद लगाओ और हज़ारो पाओ है; अर्थात सबसे ज़्यादा जिमीकंद लगाने वाली महिला या समूह को आर्थिक सहायता के साथ- साथ प्रमाण पत्र एवं मोमेंटो से सम्मानित किया गया इस महाअभियान को सफल बनाने हेतु स्वयं फूलबासन दीदी ने पदयात्रा कर गांव- गांव महिलाओं को इस खेती के बारे में जानकरी दी I

फुल्बासन बाई – कभी दो मुट्ठी चावल से शुरुआत की, आज …

पदमश्री फूलबासन बाई से मिली प्रेरणा

फुलबासन बाई
फोटो – ट्विटर

मां बम्लेश्वरी महिला स्वयंसहायता समूह की ओर से ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लंबे समय से मुहिम छेड़ी गई है। पद्मश्री फुलबासन यादव ने देखा कि ग्रामीण महिलाओं के घर की आर्थिक स्थिति के सुधार के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। विचार आया कि घर की बाड़ी या फिर खाली पड़ी जमीन पर जिमीकंद की खेती शुरु की जाए। फूलबासन बाई के अनुसार जिमीकंद खेती के माध्यम से महिलाओं की अतिरिक्त आय हो जाती है।

आठ माह में करें उत्पादन

घर की बाड़ी में आधा फीट का गड्ढा खोदकर जिमीकंद के बीज को डाला जाता है। जहां पर पानी की उपलब्धता होती है, वहां इसका उत्पादन जल्द होता है यानी कि आठ माह के भीतर ही उत्पादन कर आर्थिक लाभ लिया जा सकता है।महिलाओं को इस खेती के लिए प्रेरित करने वाली पद्मश्री फुलबासन बाई यादव ने बताया कि बारिश के पहले ही इसका रोपण किया जाना चाहिए ताकि इसका ज़्यादा से ज़्यादा लाभ मिल सके ।

व्याधि रोगी के लिए उत्तम आहार

वैज्ञानिकों ने बताया कि जिमीकंद में पोटेशियम, फास्फोरस और मैग्नीशियम की भरपूर मात्रा होती है। साथ ही यह लाल रक्त कणिकाओं के निर्माण में भी काफी सहयोग करता है। इसके अलावा ओमेगा-3, विटामिन बी-6 भी जिमीकंद में काफी मात्रा में पाये जाते हैं। आयुर्वेद में गठिया, कब्ज और पेट से जुडी व्याधियों के लिए इसे उत्तम आहार बताया गया है। इसके अलावा एंटी आक्सीडेंट भी जिमीकंद में पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं जिससे स्वास्थ्य का स्तर अच्छा बनाये रखने में शरीर को मदद मिलती है

लाखों महिलाएँ, करोड़ों का व्यवसाय और अनगिनत जीवन में रंग भर देना ही किसी व्यापार का उद्देश्य होता है। इस जिमीकंद की खेती ने लाखों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है, अपने बेहतर कल के लिए निरंतर कार्य कर रही राजनांदगाँव जिले की इन महिलाओं के जज़्बे को सलाम।


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Written by जिनेन्द्र पारख

जिनेन्द्र पारख हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, रायपुर के छात्र हैं. छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से आते हैं. इनकी रुचियों में शुमार है – समकालीन विषयों पर पढ़ना, लिखना जीवन के हर हिस्से को सकारात्मक रूप से देखना , इतिहास पढ़ना एवं समझना.

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