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कभी दो मुट्ठी चावल से शुरुआत की, आज बन गया 40 करोड़ का समूह

“डर मुझे भी लगता था – ग़रीबी से, बेरोज़गारी से, कुपोषण से, नशे से लेकिन फिर मैंने अपनी बहनों को आवाज़ लगाया, एक संकल्प समाज की सीरत बदलने के लिए, संकल्प कुंठित मानसिकता और रूढ़िवादी परम्पराओं को उखाड़ फेकने का। आज सब कुछ सफल होता दिखता है।”

– पद्मश्री फूलबासन बाई यादव

फूलबासन बाई बचपन में अपने माँ-बाप के साथ चाय के ठेले में कप धोने का काम करती!

फूलबासन बाई यादव
ग़रीबी इतनी कि जब घर में भोजन करने का समय आता तो माता-पिता कहते कि आज एक ही समय का भोजन मिलेगा। कई बार तो हफ़्तों खाना नहीं मिलता था। ग़रीबी के चलते कभी-कभी तो महीनों नमक नसीब नहीं होता और एक ही कपड़े में ही महीने निकल जाते।
12 वर्ष की उम्र में फ़ूलबासन बाई की शादी एक चरवाहे से करवा दी गयी मानो कम उम्र में एक बड़ी ज़िम्मेदारी के कुए में इस मासूम बच्ची को धकेल दिया हो। कुछ साल में चार बच्चे हो गए लेकिन घर की आर्थिक स्थिति जस की तस थी। अपने बच्चों को दो वक़्त का भोजन देने के लिए फूलबासन  बाई दर-दर अनाज माँगती पर उनकी गुहार कोई नहीं सुनता। हर शाम अपने बच्चों को भूखे पेट देख फूलबासन ख़ून के आँसू रोती लेकिन इन चुनौतियों के सामने कभी समर्पण नहीं किया।
विपरीत परिस्थिति को अवसर मानकर फूलबासन बाई ने प्रण लिया कि अब वे ग़रीबी, कुपोषण, बाल-विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों से लड़ेंगी।

उन्होंने घर-घर जाकर दस बहनों का एक समूह बनाया जिसके तहत दो मुट्ठी चावल और हर हफ़्ते दो रुपए जमा करने की योजना बनाई।

लेकिन वक़्त अभी भी फूलबासन बाई से ख़फ़ा था। संगठन बनाने की यह मुहिम फूलबासन बाई के पति को पसंद नहीं आई और फिर समाजिक विरोध भी शुरू हो गया। समाज में सब कहने लगे फूलबासन पागल हो गयी है, महिलाओं का समूह बना परम्परा के ख़िलाफ़ काम कर रही है। लेकिन समाज को एक दिशा देने के उद्देश्य से निकली फूलबासन के संकल्प के आगे समाज के सारे ताने- बाने शून्य पड़ गए।
महिलाओं की मदद से जल्द ही समिति ने बम्लेश्वरी ब्रांड नाम से आम और नींबू के अचार तैयार किए और छत्तीसगढ़ के तीन सौ से अधिक स्कूलों में उन्हें बेचा जाने लगा जहां बच्चों को गर्मागर्म मध्यान्ह भोजन के साथ घर जैसा स्वादिष्ट अचार मिलने लगा। इसके अलावा उनकी संस्था अगरबत्ती, वाशिंग पावडर, मोमबत्ती, बड़ी-पापड़ आदि बना रही है जिससे दो लाख महिलाओं को स्वावलम्बन की राह मिली है।
फूलबासन बाई के मुताबिक अचार बनाने के इस घरेलू उद्योग में लगभग सौ महिला सदस्यों को अतिरिक्त आमदनी का एक बेहतर जरिया मिला और वें दो से तीन हजार रूपये प्रतिमाह तक कमा रही हैं। इन सबका नतीजा यह हुआ कि महिलाओं ने एक दूसरे की मदद का संकल्प लेने के साथ ही थोड़ी-थोड़ी बचत शुरू की। देखते ही देखते बचत की स्व-सहायता समूह की बचत राशि करोड़ों में पहुंच गई। इस बचत राशि से आपस में ही कर्जा लेने की वजह से सूदखोरों के चंगुल से छुटकारा मिला। बचत राशि से स्व-सहायता समूह ने सामाजिक सरोकार के भी कई अनुकरणीय कार्य शुरू कर दिए, जिसमें अनाथ बच्चों की शिक्षा-दीक्षा, बेसहारा बच्चियों की शादी, गरीब परिवार के बच्चों का इलाज आदि शामिल है।

श्रीमती यादव ने सूदखोरों के चंगुल में फंसी कई गरीब परिवारों की भूमि को भी समूह की मदद से वापस कराने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की।

फूलबासन बाई ने अपने 12 साल के सामाजिक जीवन में कई उल्लेखनीय कार्यों को महिला स्व-सहायता समूह के माध्यम से अंजाम दिया है। महिला स्व-सहायता समूह के माध्यम से गांव की नियमित रूप से साफ-सफाई, वृक्षारोपण, जलसंरक्षण के लिए सोख्ता गढ्ढा का निर्माण, सिलाई-कढ़ाई सेन्टर का संचालन, बाल भोज, रक्तदान, सूदखोरों के खिलाफ जन-जागरूकता का अभियान, शराबखोरी एवं शराब के अवैध विक्रय का विरोध, बाल विवाह एवं दहेज प्रथा के खिलाफ वातावरण का निर्माण, गरीब एवं अनाथ बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के साथ ही महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में भी

फूलबासन बाई ने प्रमुख भूमिका अदा की है। आज लाखों महिलाओं का यह समूह राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए नए कीर्तिमान रच रहा है। फूलबासन  बाई के इस सकारत्मक कार्यों की सराहना करते हुए नाबार्ड ने महिला सशक्तिकरण एवं महिला स्वयं सहायता समूह को मजबूती प्रदान करने हेतु 900 करोड़ रूपए का अनुदान दिया हैI इस धनराशि से राजनांदगांव ज़िले एवं दूरस्थ अंचलो में महिलाओ को स्वावलम्बी बनाने पर काम किया जाएगाI
श्रीमती फूलबासन यादव को 2004-05 में उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा मिनीमाता अलंकरण से विभूषित किया गया। 2004-05 में ही महिला स्व-सहायता समूह के माध्यम से बचत बैंक में खाते खोलने और बड़ी धनराशि बचत खाते में जमा कराने के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए उन्हें नाबार्ड की ओर से राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। वर्ष 2006-07 में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया। 2008 में जमनालाल बजाज अवार्ड के साथ ही जी-अस्तित्व अवार्ड तथा 2010 में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में राष्ट्रपति प्रतिभा सिंह पाटील के हाथों स्त्री शक्ति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
फूलबासन बाई की इच्छाशक्ति के आगे मानो हर समस्या ने घुटने टेक दिया होI महिलाओं को अबला से सबला बनाने की यह यात्रा अपने आप में अनूठी एवं प्रशंसनीय हैI कभी दो वक़्त के खाने की भी मोहताज थी और आज लाखों महिलाओं का समूह बनाकर सफलता की इबादत लिख रही फूलबासन बाई के जज़्बे एवं हिम्मत को सलाम।

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Written by जिनेन्द्र पारख

जिनेन्द्र पारख हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, रायपुर के छात्र हैं. छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से आते हैं. इनकी रुचियों में शुमार है – समकालीन विषयों पर पढ़ना, लिखना जीवन के हर हिस्से को सकारात्मक रूप से देखना , इतिहास पढ़ना एवं समझना.

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