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3 वर्ष, 16 गाँव और करोड़ों लीटर जल संरक्षण, पढ़िए एक IRS की प्रेरक कहानी!

IRS डॉ. उज्ज्वल चव्हाण ने अपने गाँव में एक किसान की आत्महत्या से आहत हो, इसे जलसंकट से उबारने का फैसला किया। उनकी कोशिश की वजह से आज 16 गाँव के 30 हजार से अधिक किसानों को लाभ मिल रहा है।

यह घटना 2016 की है। जब महाराष्ट्र के धामनगाँव में, कर्ज में डूबे एक किसान ने आत्महत्या कर ली थी। उनके पास 40 एकड़ जमीन थी, लेकिन कोई आय न होने के कारण, उन्होंने यह कठोर कदम उठा लिया। यह इस गाँव में, आत्महत्या का पहला मामला था।

पिछले दो दशकों से पर्याप्त बारिश न होने के कारण, यहाँ की स्थानीय नदी सूख चुकी थी, और भूजल स्तर काफी नीचे गिर गया था। गाँव की अधिकांश आबादी खेती पर ही निर्भर है। इस कारण यहाँ के किसानों के लिए खेती करना असंभव हो गया था। 

इस घटना की जानकारी मुंबई में संयुक्त आयकर आयुक्त डॉ. उज्ज्वल चव्हाण को मिली, जो मूल रूप से धामनगाँव के ही रहने वाले हैं। किसान आत्महत्या की खबर से वह स्तब्ध थे।

उन्होंने अपने गाँव को, इस संकट से उबारने का फैसला किया। लगभग एक साल बाद, उन्होंने अपने गाँव में एक महत्वाकांक्षी ‘जल संरक्षण परियोजना’ की शुरुआत की। उनका उद्देश्य गाँव की नदी को नया जीवन देने और भूजल स्तर में सुधार करना था।

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आईआरएस डॉ. उज्ज्वल चव्हाण

इस तरह, वह हर सप्ताह के अंत में अपने गाँव आने लगे, और जलाशयों तथा छोटे बाँधों के निर्माण के लिए उन्होंने, ग्रामीणों को एकजुट करना शुरू किया।

नतीजतन, आज उनका गाँव सूखा-मुक्त है। यहाँ 22 हजार करोड़ लीटर पानी संरक्षित किया जा सकता है, जिससे किसानों को 10 महीने तक निर्बाध पानी की सुविधा मिलती है। 

डॉ. उज्ज्वल ने जलगाँव के 16 अन्य गाँवों में भी इस मॉडल को विकसित किया है, जिससे 3 वर्षों के अंदर ही, किसानों को सूखे से उबरने में मदद मिली।

उन्होंने द बेटर इंडिया को बताया, “यह एक सामुहिक प्रयास था। इसमें ग्रामीणों, अधिकारियों, गैर-सरकारी संगठनों से लेकर स्कूल के शिक्षकों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ये सभी जल संकट के खतरों से वाकिफ थे, जिसने लोगों के जीवन को काफी प्रभावित किया था।”

बचपन से ही लाना चाहते थे बदलाव

डॉ. उज्जवल के पिता एक किसान, और माँ एक स्कूल शिक्षिका थीं। ऐसे में, उन्हें शुरू से ही किसानों की स्थिति, और शिक्षा का महत्व पता था। इसलिए वह, एक प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहते थे, ताकि जमीनी स्तर पर बदलाव ला सकें। यही कारण है कि एमबीबीएस करने के बाद भी, उन्होंने 2010 में ‘यूपीएससी’ परीक्षा में शामिल होने का फैसला किया।

हजारों जिंदगियों को दिया नया आयाम

1990 के दशक के अंत तक, डॉ. उज्जवल के गाँव की स्थिति, काफी खराब हो गई थी। यहाँ किसान साल में, एक फसल की ही खेती कर सकते थे। जिसकी मूल वजह, नदी से पर्याप्त जलआपूर्ति के अभाव में, कुओं की अंधाधुंध खुदाई थी। 

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धामनगाँव के रहने वाले तुषार निकम कहते हैं, “30 साल पहले पोकलेन मशीनों का चलन नहीं था। इसलिए ग्रामीण, जल संकट के खतरों को समझे बिना, कुआं खोदते रहे। इन कुओं की गहराई 70 फीट तक होती थी, जिससे यहाँ गंभीर जल संकट पैदा हो गया था। किसान केवल मानसून में ही खेती कर पाते थे। इस कारण, किसानों की स्थिति दिनों-दिन नाजुक होती चली गई। मजबूरी में, लोग शहरों की ओर पलायन करने लगे, और यहाँ सिर्फ बुजुर्ग रह गए।” बता दें कि, तुषार निकम, डॉ. उज्जवल के जल संरक्षण परियोजना के मुख्य सदस्यों में से एक हैं।

इस भीषण जल संकट के पीछे एक और कारण यह था कि, उस वक्त यहाँ कपास की खेती काफी बढ़ गई थी। जिसके लिए अधिक पानी की जरूरत होती है। इस तरह, पानी की बढ़ती माँग के कारण, गाँव में असंतुलन पैदा हो गया था।

डॉ. उज्जवल ने दिखाई नई राह

डॉ. उज्जवल को शुरू से ही पता था कि, अपने प्रयासों को सफल बनाने के लिए उन्हें, लोगों को पहले जागरूक करना जरूरी है। इसलिए, उन्होंने सबसे पहले कुछ किसानों, और स्कूल के शिक्षकों को एकजुट किया।

लेकिन, जब उन्होंने अपना दायरा बढ़ाने का प्रयास किया, तो लोग उन्हें शक की नज़रों से देखने लगे। यह स्वाभाविक था, क्योंकि इससे पहले यहाँ, इतने बड़े पैमाने पर कोई सरकारी हस्तक्षेप नहीं हुआ था। इस कारण, यहाँ के मूल निवासी होने के बावजूद, उन्हें ग्रामीणो को एक साथ लाने में, महीनों लग गए।

इसके बाद, उन्होंने ‘जलयुक्त शिवार योजना’ के तहत सभी वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था की। इस योजना में नदियों की खुदाई, और सीमेंट तथा मिट्टी के बाँध बनाना शामिल है।

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डॉ. उज्जवल बताते हैं कि, सभी के सहयोग से उन्होंने, इस परियोजना को 2017 में शुरू किया। इस प्रयास में, पानी के जमाव के लिए छोटे-छोटे नहर-नाले बनाए गए। वहीं, नदियों में छोटे डैम बनाकर, जलाशय बनाए गए। मेढ़ों को बनाने में ‘मोरम मिट्टी’ का इस्तेमाल किया गया, जिससे वर्षा-जल को धरती के अंदर भेजने में आसानी होती है।

एक साल बाद, इसके नतीजे देखने को मिलने लगे। जल संरक्षण ईकाइयों को भरने के लिए, तीन से चार बार हुई बारिश पर्याप्त थी। इसके फलस्वरूप, 500 मीटर के दायरे तक भूजल स्तर में वृद्धि दिखने लगी। आज यहाँ सिर्फ 5 फीट की गहराई में भी जल मौजूद है।

3 वर्षों के दौरान, इस मॉडल को 10 सूखाग्रस्त गाँवों में दोहराया गया। हालांकि, दूसरे वर्ष से डॉ. उज्जवल ने आधे खर्च का भार, ग्रामीणों के कंधों पर सौंप दिया ताकि उनमें स्वामित्व की भावना विकसित हो। जिससे सभी लोगो ने, हजार-हजार रुपए जमा किए, और हर गाँव में 30 जलाशय बनाए गए। जिससे करीब 30,000 किसानों को लाभ मिल रहा है।

क्या है भविष्य की योजना

डॉ. उज्जवल का उद्देश्य, अगले दो वर्षों में 500 करोड़ लीटर जल संरक्षण क्षमता को विकसित कर, 65 गाँवों को लाभ पहुँचाना है। इसके लिए उन्होंने 11 ग्रामीणों को प्रशिक्षित करना शुरू भी कर दिया है। 

पूरी तरह प्रशिक्षण हासिल कर लेने के बाद, वह हर गाँव के ‘पाँच ग्रामीणों’ को इसकी शिक्षा दे सकेंगे। वह कहते हैं कि, इससे उन्हें जनशक्ति बढ़ाने में भी मदद मिलेगी, और लोगों को तेजी से एकजुट किया जा सकेगा। वह इस मुहिम में मदद लेने के लिए, प्रायोजक तथा गैर सरकारी संगठनों से भी संपर्क कर रहे हैं।

व्यस्त होने के बावजूद, डॉ. उज्जवल गाँवों का दौरा करना, कभी नहीं भूलते हैं। वह अपना हर वीकेंड, ग्रामीणों के साथ ही बीताते हैं। जो इन प्रयासों के लिए बहुत समर्पित हैं।

वह अंत में कहते हैं कि, यह वास्तव में लोगों का आपसी सद्भाव और उत्साह है, जिससे उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

मूल लेख  – GOPI KARELIA

संपादन – प्रीति महावर

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