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Bihar Man Saves Garuda

इस शख्स के प्रयासों से बिहार बना गरूड़ों का आशियाना, जानिए कैसे

बिहार के भागलपुर स्थित मंदार नेचर क्लब के संस्थापक अरविंद मिश्रा 2006 से क्षेत्र में बड़े गरूड़ों के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए संघर्षरत हैं। उनके प्रयासों से यहाँ इस संकटग्रस्त प्रजाति की संख्या 78 से 600 तक पहुँच गई है।

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यह अक्टूबर 2006 की बात है। बिहार के भागलपुर जिले के रहने वाले अरविंद मिश्रा को अपने दोस्त, और एक वन्यजीव विशेषज्ञ जय नंदन मंडल से एक नई प्रजाति के पक्षी के बारे में पता चला। इसे देखने वह तुरंत अपने घर से निकल पड़े।

गंगा दियारा पहुँचने के बाद, उन्होंने इस नये पक्षी के दो जोड़े देखे। 1.5 मीटर लंबे और खूबसूरत पक्षी को देखते ही, उन्हें पहचानने में समय नहीं लगा कि, यह बड़ा गरूड़ (Greater Adjutant) है।

61 वर्षीय अरविन्द कहते हैं, “26 अक्टूबर 2006 की तारीख थी। मैंने देखा, सेमल के एक पेड़ पर पक्षी अपने अंडे को सेंक रहे थे। वहाँ सात अन्य घोंसले भी थे, जिसमें छोटे गरूड़ थे।”

बड़ा गरूड़, जिसे अंग्रेजी में ‘ग्रेटर एज्यूटेंट स्टॉर्क’ के नाम से भी जाना जाता है। यह एक संकटग्रस्त पक्षी है, और इसे अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (International Union for Conservation of Nature-IUCN) की रेड लिस्ट में शामिल किया गया है। यह पक्षी भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची IV के तहत वर्गीकृत है। 

पहले, एशियाई देशों में यह पक्षी बड़े पैमाने पर पाया जाता था। लेकिन, शिकार और मानवीय हस्तक्षेप के कारण इसकी संख्या तेजी से कम होती गई। 

आज पूरी दुनिया में सिर्फ तीन ही स्थानों पर बड़े गरूड़ पाए जाते हैं – कंबोडिया, असम और भागलपुर। आज इसकी संख्या 800 से 1200 के बीच है।

अरविन्द बताते हैं कि भारत में पहले सिर्फ असम में इसका प्रजनन क्षेत्र था। भागलपुर में इस पक्षी को पहली बार देखा गया था। इससे उन्हें अन्य क्षेत्रों में इसकी मौजूदगी का पता लगाने की प्रेरणा मिली। 

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अरविन्द मिश्रा

इस तरह, 2007 तक, बिहार के 9 जिलों में, 16 घोसले में 78 बड़े गरूड़ देखे गए। इनका मुख्य प्रजनन स्थल भागलपुर का कोसी दियारा क्षेत्र था। जहाँ के ऊँचे-ऊँचे बरगद, पीपल, सेमल, आदि के पेड़ों पर गरुड़ों ने अपना घोंसला बना लिया था।

इसे देख, अरविन्द ने इस संकटग्रस्त प्रजाति को बढ़ावा देने के विषय में विचार किया। उन्हीं के प्रयासों का नतीजा है कि आज भागलपुर में गरूड़ की संख्या 78 से 600 तक पहुँच गई है।

वह कहते हैं, “पहले मैं देश के कई हिस्से में बाघ और अन्य वन्यजीवों के संरक्षण की दिशा में काम कर रहा था। 1990 के दशक में, कई विशेषज्ञों ने मुझसे बिहार और आस-पास के क्षेत्रों में पक्षियों के अध्ययन के विषय में कहा, क्योंकि उस दौर में यहाँ इसे लेकर ज्यादा कुछ हो नहीं रहा था।”

वह आगे कहते हैं, “इसके बाद, मैं पक्षियों और जैव विविधता का अध्ययन करने के लिए बिहार आ गया। साल 2004 में, मैंने यहाँ छोटा गरूड़ देखा और तभी से मुझे यहाँ बड़े गरूड़ की मौजूदगी का एहसास हो गया।”

फिर, 2006 में बड़ा गरूड़ देखने के बाद, अरविन्द ने एक रिसर्च पेपर सबमिट किया, जो एक भारतीय वन्यजीव अनुसंधान संगठन, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) के जर्नल में प्रकाशित हुआ। धीरे-धीरे, उन्होंने इस प्रजाति के सामने आने वाले खतरों को पहचाना शुरू कर दिया।

वह कहते हैं, “इस पक्षी को सबसे बड़ा खतरा स्थानीय बानपर आदिवासियों (बंजारा) से था, जो अंडे, छोटे बच्चे और यहाँ तक कि, वयस्क पक्षियों तक का शिकार करते थे। वहीं, स्थानीय किसानों को भी लगता था कि, ये पक्षी उनके खेतों को नुकसान पहुँचाते हैं।”

किसानों की शिकायत थी कि, ये पक्षी अपने मलमूत्र से हर जगह गंदगी फैलाते हैं, और शोर मचा कर व्यवधान पैदा करते हैं।

आलम यह था कि किसान, पक्षियों के घोंसले को खत्म करने के लिए पेड़ों की कटाई करने लगे। साथ ही, आँधी-तूफान, पक्षियों के लिए जहर रखने, जैसी मानसिकता ने पक्षियों के जीवन को और कमजोर कर दिया था।

लेकिन, अरविन्द ने इन पक्षियों की सुरक्षा का जिम्मा अपने कंधों पर लिया, और अपनी एनजीओ, ‘मंदार नेचर क्लब’ के तहत ग्रामीणों को इसकी अहमियत के बारे में बताना शुरू किया।

वह कहते हैं, “अपने अनुभव के आधार पर, मुझे एहसास था कि, इस पक्षी को बचाने के लिए, किसी एनजीओ या अनुसंधान संगठन से फंड के लिए मदद माँगना, लंबे समय के लिए कारगर नहीं होगा। इसके लिए सामुदायिक भागीदारी एकमात्र विकल्प था।”

लोगों का बदला नजरिया

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बड़े गरूड़

अपने प्रयास के तहत, अरविन्द ने घायल पक्षियों का इलाज शुरू किया और ठीक होने के बाद, उन्हें वापस दियारा छोड़ दिया जाता था। लोगों को जागरूक करने के लिए वह गाँव में चौपाल लगाने, और उन्हें इसका महत्व बताने लगे। 

पक्षियों को बचाने के लिए, उन्होंने कानूनी मदद भी लेना शुरू कर दिया। साथ ही, संरक्षण प्रयासों में मदद करने वाले लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए कई कार्यक्रम भी आयोजित किए जाने लगे।

वह कहते हैं, “शुरुआती दिनों में, मेरे लिए राह आसान नहीं थी। लोग मेरे इरादों पर शक करते थे। उस वक्त जिले के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में अपराध और गैरकानूनी धंधों का बोलवाला था। एक बाहरी होने के कारण, लोगों को लगता था कि, मैं पुलिस का मुखबिर हूँ, या इन पक्षियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने के लिए इन्हें बचाने का ढोंग कर रहा हूँ। लोगों का विश्वास जीतने में मुझे कई वर्ष लग गए।”

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वह आगे कहते हैं, “मैंने घायल पक्षियों की मदद के लिए स्थानीय किसानों से मदद माँगी। हम मिल कर उनका इलाज करते थे, और ठीक होने के बाद छोड़ देते थे। लोगों के भरोसे को कायम करने के लिए, हम पक्षियों के देखभाल की जिम्मेदारी ग्रामीणों को ही दे देते थे। आखिरकार, 2010 में, उन्होंने मुझे घायल पक्षियों की देखभाल करने के लिए कहा। इस तरह, पक्षियों और किसानों के बीच एक भावनात्मक जुड़ाव बन गया।”

इस सामुदायिक प्रयास को देखते हुए, राज्य सरकार ने भागलपुर में दुनिया का पहला गरूड़ पुनर्वास केंद्र खोला। इससे ग्रामीणों के उत्साह को एक नया आयाम मिला।

कितने हैं फायदे

गरूड़ संरक्षण को बढ़ावा मिलने से क्षेत्र में पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को भी संतुलित करने में काफी मदद मिलती है। क्योंकि, ये खेतों में चूहों को खा जाते हैं, जिससे फसलों को कम नुकसान होता है। साथ ही, ये गंगा और कोसी नदी में बहने वाली गंदगी को भी खा जाते हैं, जिससे नदियों में प्रदूषण रोकने में मदद मिलती है।

समुदाय को देते हैं श्रेय

अरविन्द का मानना है कि, यह एक आदमी का काम नहीं है। इस सफलता का श्रेय पूरे समुदाय को जाता है।

वह बताते हैं, “यह काफी संवेदनशील पक्षी है। यदि इनकी संख्या एक बार गिरने लगी, तो इसे बचाना असंभव है। यह स्थानीय समुदायों के प्रयासों का ही नतीजा है कि, ये अभी तक विलुप्त होने से बचे हुए हैं।”

वह बताते हैं कि, आज बिहार में इसके लिए सिर्फ एक ही बसेरा है। जिसके कई नुकसान भी हैं। क्योंकि, एक बड़ा खतरा पूरे राज्य में, इस प्रजाति का सफाया कर सकता है।

युवाओं को जोड़ने की पहल

गरूड़ की आबादी बढ़ाने, और लोगों को जागरूक करने के लिए, ‘मंदार नेचर क्लब’ द्वारा 2019 में, एक नई पहल की शुरुआत की गई।

अरविन्द बताते हैं, “हमने ‘गरूड़ सेवियर्स’ और ‘गरूड़ गार्जियन’ नाम से दो समूह बनाए। गार्जियन, युवाओं को पक्षी के देख-भाल के तौर-तरीके बताते हैं, और सेवियर्स ज़मीनी स्तर पर अमलीजामा पहनाते हैं।”

24 वर्षीय गरूड़ सेवियर, राजकुमार कहते हैं कि, उन्होंने सात ऐसे गरूड़ों को बचाया, जो पेड़ से गिर कर घायल हो गए थे।

वह कहते हैं, “मैं दूरदराज के गाँवों में जा कर लोगों को, पक्षियों के महत्व को भी समझाता हूँ। साथ ही, नियमित रूप से घोंसले, अंडे, और पक्षियों की संख्या की जाँच करता हूँ। जरूरत पड़ने पर, प्रजनन स्थलों पर लोगों से, मानवीय हस्तक्षेप को कम करने की अपील भी करता हूँ।”

अरविन्द, अपने दोनों समूहों को भारत-यात्रा कराने की योजना बना रहे हैं, ताकि पक्षी संरक्षण के प्रयासों से संबंधित चुनौतियों और समाधानों को लेकर सूचनाओं के आदान-प्रदान को बढ़ावा मिल सके, और बेहतर सुरक्षा उपाय अपनाये जा सके।

वह कहते हैं, “मुझे यह देख कर काफी गर्व और खुशी होती है कि आज ये पक्षी कूड़े के ढेर के बजाय, अपनी नियत प्राकृतिक स्त्रोतों, जैसे – नदियों और खेतों से अपना नियमित आहार ले रहे हैं, तथा पर्यावरण के साथ-साथ किसानों को भी लाभ पहुँचा रहे हैं।”

मूल लेख – HIMANSHU NITNAWARE
संपादन- जी एन झा

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