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मुंबई: 95% कम आता है इस सोसाइटी का बिजली बिल, जानिए कैसे

“निवेशित लागत की वसूली सामान्यतः 4-5 वर्षों में हो जाती है। ये सोलर पैनल 25 वर्षों तक चलते हैं, इस तरह 20 वर्षों तक मुफ्त बिजली का लाभ उठाया जा सकता है।” – नीतू गोयल

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समीर जागीरदार मुंबई के कुर्ला के रहने वाले हैं और इन्होंने अपने घर में पारंपरिक ऊर्जा स्त्रोतों के बजाय सौर ऊर्जा को प्राथमिकता दी है। यही कारण है कि पिछले कई महीनों से उन्हें कोई बिजली बिल नहीं चुकाना पड़ रहा है।

समीर बताते हैं, “हमारे पास एक मंजिला घर है और हमें लगा कि सौर ऊर्जा महंगी होगी, क्योंकि इसमें बैटरी की जरूरत होती है और इसके रखरखाव में भी लागत आती है। लेकिन, एक स्टार्टअप से सलाह लेने के बाद और उसे समझने के बाद, हम इस दिशा में आगे बढ़े।”

समीर, कुर्ला की जिस सोसाइटी में रहते हैं वहाँ फरवरी, 2019 के आस-पास 11 किलो वाट का सोलर प्रोजेक्ट स्थापित किया गया। इसके फलस्वरूप, मई और जून महीने में सोसाइटी का बिजली बिल शून्य हो गया।

समीर, जो इस सोसायटी के सचिव भी हैं, कहते हैं, “जब से हमने इस सौर ऊर्जा इकाई को स्थापित किया है, तब से हमारी बिजली के बिल में कमी आने के साथ-साथ ग्रिड बिजली पर हमारी निर्भरता भी कम हुई है।”

छत पर लगा सोलर पैनल

समीर आगे कहते हैं कि स्टार्टअप कंपनी ट्रूसन (Truesun) से सलाह लेने से भी उन्हें बिजली के अनावश्यक उपयोग को समझने और कम करने में मदद मिली। ट्रूसन ने सिर्फ समीर ही नहीं, बल्कि कई अन्य लोगों को भी अक्षय ऊर्जा को अपनाने में मदद की है।

मुंबई स्थित यह कंपनी शहर के कई आवासीय और वाणिज्यिक संस्थाओं को लगभग सौ फीसदी बिजली बिल कम करने में मदद कर रही है।

ट्रूसन की स्थापना साल 2018 में हुई, लेकिन इसकी संस्थापक नीतू गोयल 2006 से अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में काम रही हैं। इस विषय में वह बताती हैं, “मैं दुनिया में एक बदलाव और सकारात्मक प्रभाव देखने को लेकर दृढ़-संकल्पित हूँ। समुदायों के लिए सौर चूल्हा, रोशनी आदि उपलब्ध कराने की दिशा में कई स्तरों पर काम करने से मुझे पर्यावरण और आर्थिक संतुलन को समझने में मदद मिली।”

वह आगे कहती हैं, “सौर ऊर्जा को अपनाने के संबंध में सबसे मुख्य पहलू जागरूकता है और यह सबसे चुनौतीपूर्ण भी है। बीते वर्षों के दौरान स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है, लेकिन बड़े पैमाने पर लोगों के बीच समझ विकसित नहीं हुई है।”

नीतू कहती हैं कि लोगों को अभी भी पता नहीं है कि टेक्नोलॉजी रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर और अन्य बिजली के उपकरणों जैसे लिफ्ट, पानी पंप, वगैरह को सतत बना सकती है। उन्हें इसके बारे में समझाने ने काफी समय लग जाता है और लोगों के विश्वास को जीतने के लिए पुरानी परियोजनाओं को दिखाना पड़ता है।

दो मुख्य कारक हैं जो तय करते हैं कि आप अक्षय ऊर्जा का कितना इस्तेमाल कर सकते हैं। पहला – इसके लिए सामान्यतः बड़ी छत होनी चाहिए और दूसरा – उपयोग या बिल!

सोलर पैनल से जीरो बिजली बिल के लक्ष्यों की हो सकती है पूर्ति

इसके गणित को समझाते हुए वह कहती हैं, “उदाहरण के तौर पर, यदि बिजली बिल 20 हजार रुपए है तो इसका अर्थ है 2,000 यूनिट बिजली। ऐसी स्थिति में, ग्रिड आधारित बिजली पर निर्भरता को शून्य करने के लिए 2 हजार वर्ग फीट में 20 किलो वाट की सौर ऊर्जा की जरूरत होगी।”

नीतू कहती हैं, “यदि 1,000 वर्ग फीट जगह उपलब्ध है, तो सौर ऊर्जा पर निर्भरता में 50 फीसदी की कमी आती है। लेकिन, दूसरी ओर, यदि बिजली बिल 1 लाख रुपए आता है, तो बिल में 20 हजार रुपए की कमी आती है। तो, यह निर्भर करता है कि कितनी जगह छोड़ी जाती है और कितना बिल आता है।”

वह आगे कहती हैं, “एक किलो वाट के सोलर सेल से हर महीने 120 यूनिट बिजली बनती है और इसके लिए 100 वर्ग फीट जगह की जरूरत होती है।”

सेटअप बनाने को लेकर नीतू कहती हैं, “छत पर सिर्फ सोलर पैनल को स्थापित करने की जरूरत होती है। सोलर पैनल को एक इन्वर्टर से जोड़ा जाता है, जो बिजली को डायरेक्ट करंट (डीसी) से अल्टरनेट करंट (एसी) में बदलता है।”

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इसके बाद, इन्वर्टर को नेट मीटर से सिंक्रोनाइज़ किया जाता है, जिसे सोलर पैनल से बिजली की आपूर्ति करने के लिए प्रोग्राम किया जाता है और जरूरत पड़ने पर यह ग्रिड से भी बिजली की आपूर्ति करती है।

10 किलोवाट की इकाई के लिए औसतन 12-15 लाख रुपए खर्च होते हैं। वित्तीय पहलू ग्राहकों को पसंद आने वाले पैनलों और उपकरणों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। ये उपकरण अंतरराष्ट्रीय और घरेलू, दोनों बाजारों में खरीदे जाते हैं। 

नीतू ने अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए शुरू की अपनी कंपनी ‘ट्रूसन’

इतने बड़े निवेश और लागत को लेकर नीतू कहती हैं,  “चार से पाँच साल में सोलर प्रोजेक्ट की लागत आप वसूल कर सकत हैं। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि सेट अप व्यावसायिक है या आवासीय। व्यावसायिक में पैसे 3 वर्षों में ही वसूल हो सकते हैं। ये सोलर पैनल 25 वर्षों तक चलते हैं, इस तरह 20 वर्षों तक मुफ्त बिजली का लाभ उठाया जा सकता है।”

नीतू कहती हैं, “ऐसे निवेश से पर्यावरण को भी लाभ होता है, छत पर 10 किलोवाट का सोलर पैनल से पर्यावरण पर बहुत सकारात्मक असर पड़ता है, क्योंकि इससे 310 टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम किया जा सकता है, जो पूरे जीवन में 490 सागवान के पेड़ लगाने के बराबर है।”

कई सोसायटी अक्सर छत पर खुली जगह को लेकर समझौता नहीं करना चाहते हैं। लेकिन, नीतू आश्वस्त करती हैं कि सोलर पैनलों को इतनी ऊंचाई पर स्थापित की जाती है, कि छत पर पर्याप्त जगह बचती है।

नीतू का कहना है कि मौसम कैसा भी हो, सोलर पैनल से बिजली हर दिन उत्पादित होती है।

पिछले दो वर्षों में, कंपनी ने कई आवासीय, वाणिज्यिक, औद्योगिक और शैक्षणिक संस्थानों में काम किया है।

इसे लेकर मुंबई में रहने वाले मनोहर मीरकर कहते हैं कि उन्होंने 100 किलोवाट की सौर ऊर्जा प्रणाली को स्थापित करने की योजना बनाई है, जिससे कि बिजली के बिल को 80-90 प्रतिशत तक कम करने में मदद मिलेगी।

इसके साथ ही, नीतू मुंबई के नाला सोपारा इलाके में अपनी एक योजना के बारे में बताती हैं कि यहाँ सौर ऊर्जा के इस्तेमाल से बिजली बिल को 45,000 रुपये प्रति माह से घटाकर 1,500 रुपये करने में मदद मिली।

टीएस विंडपावर डेवलपर्स में बतौर सहायक प्रबंधक काम करने वाली मनीषा शर्मा इस बात से सहमत हैं कि इससे क्या हासिल किया जा सकता है। वह कहती हैं, “सौर ऊर्जा के क्षेत्र में असीम संभावनाएं हैं और निरंतर तकनीकी विकास हमें पूर्णतः अक्षय ऊर्जा पर निर्भर बना सकती है।

मनीषा कहती हैं, “ऐसी संरचनाएं लोगों को जीवाश्म ईंधन ऊर्जा पर निर्भरता दूर कर सकती है। लेकिन, लोगों को शुरुआती और समय के साथ रखरखाव में आने वाले खर्च को वहन करने में समर्थ होना चाहिए, क्योंकि इसमें काफी खर्च आता है।”

मूल लेख – ( )

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