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14 लाख की नौकरी छोड़, फूलों के कचरे से ईको फ्रेंडली धूप-अगरबत्ती बना रहा यह IIT ग्रेजुएट

“मैं अपने विदेशी दोस्त को गंगा किनारे घुमाने ले गया। वहाँ नदी फूलों के कचरे की वजह से दूषित थी। दोस्त ने सवाल किया, आप कुछ करते क्यों नहीं? इसके बाद से ही मैं इस विषय पर सोचने लगा और इस फूलों के कचरे के इस्तेमाल का एक स्टार्ट अप शुरू किया।” – अंकित अग्रवाल

IIT Kanpur's Ankit

“आईआईटी कानपुर से पढ़ाई करने के बाद शानदार पैकेज भी मिला लेकिन एक दिन उस युवक ने नौकरी को अलविदा कह दिया और लौटकर अपने शहर और गंगा नदी की सफाई की योजना बनाने लगा, जिसमें देर से ही सही लेकिन उसे सफलता मिलने लगी।”

अभी आपने ऊपर की पंक्तियों में जिस युवक के बारे में पढ़ा, वह हैं आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग में स्नातक करने वाले अंकित अग्रवाल, जिन्होंने करीब 14 लाख रुपए सालाना की नौकरी छोड़ अपने दोस्त प्रतीक के साथ मिलकर कुछ अलग करने की ठानी।

अंकित ने अपने दोस्त के साथ मिलकर फूलों के कचरे को रिसाइकिल करने की योजना बनाई, जिससे न केवल शहर और गंगा नदी की सफाई की राह खुल गई, बल्कि बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार भी मिला।

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अंकित अग्रवाल

दोस्त की बात ने मोड़ दी जीवन की दिशा

अंकित ने द बेटर इंडिया को बताया कि एक विदेशी मित्र की बात ने उन्हें फूलों के कचरे की रीसाइकिलिंग के बारे में सोचने पर विवश कर दिया और वहीं से उनके जीवन की नई यात्रा शुरू हुई। वह बताते हैं, “मैं अपने दोस्त को गंगा किनारे घुमाने ले गया। वहाँ नदी फूलों के कचरे की वजह से दूषित थी। कचरा जमा हो जाने से उस पर सेल्यूलोज की एक फिल्म सी बन गई थी। दोस्त ने सवाल किया, आप कुछ करते क्यों नहीं? इसके बाद से ही मैं इस विषय पर सोचने लगा और समस्या का समाधान निकालने की कोशिश करने लगा। मैंने पाया कि फूलों का कचरा सर्वाधिक मंदिरों से निकलता है। इस कचरे को रीसाइकिल किया जा सकता है। साथ ही, इससे कई  इको फ्रेंडली उत्पाद भी तैयार किए जा सकते हैं।”

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काम करतीं महिलाएँ

इसके बाद अंकित ने कानपुर के विभिन्न मंदिरों के प्रबंधन से संपर्क साधा और 2017 में फूलों के कचरे को रीसाइकिल कर उससे इको फ्रेंडली धूप और अगरबत्ती उत्पाद बनाने के लिए हेल्प अस ग्रीन स्टार्टअप की शुरूआत की। इसे आईआईटी कानपुर से भी इन्क्यूबेशन के रूप में मदद मिली। आगे चलकर स्टार्टअप का नाम बदलकर phool.co कर दिया गया।

शुरू में कई बातें सुनीं, लेकिन फैसला नहीं बदला

अंकित कहते हैं, “जब मैंने 14 लाख की नौकरी छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू करने का फैसला किया तो लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। शुरू में परिवार के लोग भी इसे एक अच्छा निर्णय नहीं मान रहे थे। लेकिन मैंने किसी की नहीं सुनी। केवल अपने दिल की मानी। इसके बाद अपने दोस्तों के साथ मिलकर काम शुरू कर दिया। फैसला सही साबित हुआ। आज के वक्त सभी इस फैसले की मिसाल देते हैं। कई जगह स्टार्टअप की कामयाबी की कहानी सुनाने के लिए आमंत्रित भी किया जाता है। मैं सभी से यही कहता हूँ कि दूसरों से पहले आप खुद पर भरोसा करना सीखें।”

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स्टार्ट अप के बारे में जानकारी देते अंकित

महिलाओं को दिया पैरों पर खड़े होने का मौका

अंकित ने अपने स्टार्टअप में महिलाओं को प्राथमिकता दी है। इस वक्त उन्होंने सवा सौ महिलाओं को रोजगार दिया हुआ है। इसके अतिरिक्त आवश्यकता के आधार पर  भी वह लोगों को रोजगार मुहैया कराते हैं। महिलाओं को प्राथमिकता देने की वजह पर अंकित कहते हैं, “महिलाएँ अपेक्षाकृत अपने कार्य में अधिक ईमानदार होती हैं। वह अधिक लगन से कार्य करती हैं। इसके अलावा वह घर-परिवार की धुरी होती हैं। उनके हाथ में पैसा आने से पूरे परिवार को फायदा होता है। वह अपनी इस कवायद को पुख्ता तरीके से आगे बढ़ाने का इरादा रखते हैं।”

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अंकित ने अपने स्टार्ट अप में महिलाओं को प्राथमिकता दी है

 अंकित के स्टार्टअप को आईएएन फंड से भी मिली मदद

अंकित कहते हैं कि आईएएन फंड ने उनके स्टार्टअप में 1.4 मिलियन यूएस डॉलर का निवेश किया है। फंडिंग राउंड का नेतृत्व आईएएन फंड और सैन फ्रांसिस्को आधारित ड्रेपर रिचर्ड्स कपलान फाउंडेशन ने किया था। इसके बाद इस निवेश को हरी झंडी मिली। वह बताते हैं कि शिक्षा, पर्यावरण जैसे विभिन्न स्टार्टअप को इस फंड के माध्यम से मदद दी जाती है। अब अंकित मंदिरों से निकलने वाले फूलों के कचरे को रिसाइकिल कर बड़े पैमाने पर समाज की बेहतरी और लोगों के रोजगार के लिए काम करना चाहते हैं। इसके लिए वह सोशल अल्फा जैसी संस्थाओं से भी सहयोग हासिल कर रहे हैं। उनके कुछ प्रोजेक्ट पाइप लाइन में हैं। एंजेल इन्वेस्टर्स से भी बात चल रही है।

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पशुओं के चमड़े का विकल्प पेश किया

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अंकित के स्टार्ट अप का एक उत्पाद(पशुओं के चमड़े का विकल्प)

अंकित बताते हैं कि उनके स्टार्टअप phool.co ने फूलों को रिसाइकिल कर पशुओं के चमड़े यानी एनिमल लेदर का  कॉमर्शियल विकल्प पेश किया है। यह पूरी तरह से रासायनिक से हटकर एक प्राकृतिक विकल्प है। इसके अलावा यह चमड़े से सस्ता और टिकाऊ विकल्प होगा। आईआईटी कानपुर के साथ ही इस प्रोजेक्ट से सिडबी सेंटर भी जुड़ा है। इसका नाम उन्होंने “फ्लेदर” रखा है। उनके इस प्रोजेक्ट को  हाल ही में पेटा के सर्वश्रेष्ठ नवाचार वेगन वर्ल्ड से सम्मानित भी किया गया।

उन्होंने अपने स्टार्टअप का विस्तार तिरुपति आंध्र प्रदेश तक कर लिया है। वह इसे और आगे ले जाने की इच्छा रखते हैं।

मिला सम्मान

बेहतर कार्य के लिए अंकित को कई  सम्मान भी  मिले हैं।  इनमें  संयुक्त राष्ट्र यंग लीडर्स अवार्ड, COP 2018, द नेशंस मोमेंटम ऑफ़ चेंज अवार्ड, एशिया सस्टेनेबिलिटी अवार्ड 2020, हांगकांग, एलक्विटी ट्रांसफ़ॉर्मिंग लाइव्स अवार्ड्स, लंदन और ब्रेकिंग द वॉल ऑफ़ साइंस, बर्लिन अवार्ड मिले हैं।

अंकित कहते हैं कि यदि हमें आगे बढ़ना है तो बड़ा सपना देखना होगा। “यह कहना गलत साबित होगा कि यदि आप छोटे शहर में हैं तो आपको सफलता नहीं मिलेगी। आप कहीं भी रहें, यदि सपने बड़े हैं और आप लगातार मेहनत कर रहे हैं तो कोई आपको रोक नहीं सकता। सपने देखें और उन्हें पूरा करने की तैयारी में जुट जाएं,” उन्होंने कहा।

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Written by प्रवेश कुमारी

प्रवेश कुमारी मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुकीं हैं। लिखने के साथ ही उन्हें ट्रेवलिंग का भी शौक है। सकारात्मक ख़बरों को सामने लाना उन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरी लगता है।

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