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इंजीनियर बनाने लगीं केंचुआ खाद, साल भर की कमाई हुई 15 लाख रुपये

उनके यहाँ से केंचुएँ खरीदने वाले किसानों को पायल वर्मीकंपोस्ट बनाने की ट्रेनिंग मुफ्त में देती हैं!

यह कहानी उत्तर प्रदेश की एक ऐसी लड़की की है, जिसका सपना तो सरकारी नौकरी करने का था लेकिन लगातार प्रयास के बावजूद उसे सफलता नहीं मिली, ऐसे में वह निराश नहीं हुई बल्कि उसने व्यवसाय की ओर कदम बढ़ा दिया और आज वह वर्मीकंपोस्ट के क्षेत्र में शानदार काम कर रही है।

मेरठ की रहने वाली पायल अग्रवाल ने कंप्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग की और इसके बाद, वह सरकारी नौकरियों की तैयारी करने लगी। लेकिन जब सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में उन्हें सफलता नहीं मिली तो उन्होंने निराश होने की बजाय अपनी राह बदली।

पायल ने द बेटर इंडिया को बताया कि उन्हें अपना कोई व्यवसाय करना था। लेकिन कुछ ऐसा जिसमें लागत कम हो क्योंकि उनके पास इतने साधन नहीं थे कि वह एकदम कोई बड़ा स्टार्टअप शुरू कर लें।

Engineer Started Vermicomposting Unit
Payal Agrawal

उनके पिता एक दुकान पर काम करते हैं और माँ ब्यूटीशियन हैं। उनके माता-पिता ने दिन-रात मेहनत करके उनकी पढ़ाई-लिखाई की ज़िम्मेदारी पूरी की।

कम लागत का व्यवसाय

“मैं इंटरनेट पर ऐसे ही आइडियाज ढूंढती जिनमें कम लागत में कोई व्यवसाय शुरू किया जा सकता हो। धीरे-धीरे मैं यूट्यूब आदि पर जैविक खेती के बारे में देखने-सुनने लगी। पता नहीं क्यों पर मुझे लगा कि मैं इस सेक्टर में काम कर सकती हूँ। रिसर्च करते-करते मेरी तलाश वर्मीकंपोस्टिंग पर आकर खत्म हुई,” उन्होंने बताया।

इसके बाद, पायल ने जगह-जगह से वर्मीकंपोस्टिंग के बारे में पढ़ना शुरू किया। साथ ही, उन्हें आस-पास जो भी वर्कशॉप पता चला, वहां जाकर उन्होंने ट्रेनिंग भी ली। एक जगह से थोड़े केंचुएँ खरीदकर उन्होंने एक्सपेरिमेंट करना शुरू किया। पायल को जब यह भरोसा हो गया कि वह यह काम कर सकती है तो उन्होंने 2017 में अपनी वर्मीकंपोस्ट यूनिट शुरू की और इसे नाम दिया, ‘ग्रीन अर्थ ऑर्गनिक्स।’

She has set-up 200 beds in her unit

पायल की राह आसान नहीं थी। उन्होंने शुरुआत में लगभग 2 लाख रुपये का निवेश किया। इससे पहले वह पढ़ाई के साथ बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाया करती थी। उससे जो भी आमदनी हुई थी, उसे अपने नए काम में लगा दिया। इसके अलावा कुछ पैसे उन्होंने अपने एक रिश्तेदार से उधार लिए।

सबसे पहले पायल ने सवा एकड़ ज़मीन किराए पर ली और वहां पर बैड सेट-अप करने की शुरुआत की।

कैसे करतीं हैं काम:

वह बतातीं हैं कि वर्मीकंपोस्ट बनने में लगभग ढाई महीने का समय लगता है और उनकी यूनिट में एक बार में लगभग 200 बैड लग जाते हैं। पायल केंचुएँ अलग-अलग जगह से खरीदती हैं और गोबर वह 15 दिन पुराना लेती हैं।

“गोबर की हमारे यहाँ कोई कमी नहीं है और सबसे अच्छा काम है कि हम गोबर को कृषि के लिए उपयोग में लें। इससे स्वच्छता भी बढ़ेगी और हम जैविक खेती की तरफ भी बढ़ेंगे,” उन्होंने आगे कहा।

पायल गौशाला से गोबर खरीदती हैं। 1 किलो गोबर की लागत 35-40 पैसे के आसपास आता है। महीने भर में वह 25 टन और कभी-कभी इससे ज्यादा खाद बनाती हैं। खाद को बेचने के लिए वह किसी एजेंट पर निर्भर नहीं है। वह सीधा अपने ग्राहकों से जुडी हुई हैं। उनके यहाँ से किसानों के साथ-साथ ऐसे लोग भी खाद लेकर जाते हैं, जो आगे अपने ब्रांड नाम के साथ इसे बेचते हैं। लेकिन पायल बल्क में ही खाद बेचती हैं। इसके अलावा, बहुत से लोग उनके यहाँ से केंचुएँ भी खरीदते हैं ताकि अपनी वर्मीकम्पोस्टिंग यूनिट लगा सकें।

Engineer Started Vermicomposting Unit
Vermicompost

“हमारे यहाँ से जो केंचुआ खरीदता है, हम उसे ट्रेनिंग मुफ्त में देते हैं और उनका सेट-अप करने में मदद करते हैं। महीने भर में इस सबसे लागत और मज़दूरों की तनख्वाह आदि को काटकर एक से डेढ़ लाख रुपये तक की बचत हो जाती है,” उन्होंने कहा।

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पायल के यहाँ 2 लोग नियमित तौर पर काम करते हैं और बाकी को वह दिहाड़ी पर रखती हैं। इससे आसपास के मज़दूरों को अच्छा रोज़गार भी मिल जाता है।

सबसे अच्छी बात यह है कि उनकी खाद की मांग है और इसका कारण है उनकी खाद की उत्तम गुणवत्ता। वह कहती हैं, “बहुत से लोग इस काम में भी मिलावट कर देते हैं। मैं ऐसा नहीं करती हूँ। मुझे पता है कि लोगों को आप एक बार गलत सामान दे सकते हैं, बार-बार नहीं।”

वर्मीकंपोस्ट की सही पहचान

वर्मीकंपोस्ट खाद बनने के बाद भुरभुरी हो जाती है और यह काले रंग की हो जाती है। यह गोबर की खाद से बेहतर इसलिए होती है क्योंकि इसमें पानी को सोखे रखने की क्षमता आधिक होती है। केंचुएँ इसमें ऐसे तत्व छोड़ते हैं जो पानी को सोख सकते हैं और फसल में नमी बनाए रखते हैं। जबकि गोबर अगर बहुत ज्यादा पुराना हो जाए तो यह काम का नहीं रहता और इसमें दीमक भी लग जाती है।

“बहुत से लोग खाद को ज्यादा करने के लिए पुराने गोबर को इसमें मिला देते हैं और सस्ता बेचते हैं। हम अपनी खाद 5-6 रुपये किलो के हिसाब से बेचते हैं क्योंकि हमें हमारी खाद की क्वालिटी पर विश्वास है। ग्राहक भी इसलिए ही हमारे पास लौटकर आते हैं क्योंकि उन्हें यहाँ कोई बेईमानी नहीं मिलती,” उन्होंने आगे कहा।

पायल कहतीं हैं कि वह हर दिन कुछ न कुछ सीखती हैं और उनका उद्देश्य अपने यहाँ आने वाले किसानों और दूसरे लोगों को अच्छा प्रोडक्ट देने का है। जिस क्षेत्र को पुरुष-प्रधान माना जाता है, वहां हर चुनौती को पार कर एक लड़की के लिए अपनी पहचान बनाना आसान नहीं था। पर पायल के जूनून और आत्म-विश्वास ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और आज वर्मीकंपोस्टिंग के क्षेत्र में वह अच्छा नाम कमा रही हैं।

साथ ही, पायल आज की युवा लड़कियों के लिए एक उदहारण हैं कि अगर एक रास्ता बंद हो जाए तो आपको दूसरे रास्ते की तलाश करनी चाहिए। अगर आपको खुद पर भरोसा हो तो आप सब कुछ हासिल कर सकते हैं!

द बेटर इंडिया पायल अग्रवाल के जज्बे को सलाम करता है और उम्मीद है उनकी कहानी से बहुत से युवाओं को प्रेरणा मिलेगी। पायल से संपर्क करने के लिए आप उन्हें 7248119336 पर कॉल या earthg283@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं!

उनकी वर्मीकंपोस्ट यूनिट का पता है: Green Earth Organics, Village Datanwali, Garh Road, Meerut, Uttar Pradesh

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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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