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बिना प्लास्टर वाले इस घर को पिछले आठ सालों में कभी नहीं भरना पड़ा बिजली या पानी का बिल

सूरत के इस इको फ्रेंडली घर को देखकर आप भी कहेंगे, वाह घर हो तो ऐसा, देखें तस्वीरें!

हर किसी को एक ऐसी जगह की तलाश रहती है जहाँ रोजमर्रा की जिंदगी की हलचल से दूर कुछ सूकून भरा समय बिताया जा सके। स्नेहल पटेल ने भी हमेशा प्रकृति के करीब एक ऐसे ही घर की कल्पना की थी। सूरत का रहने वाला यह मैकेनिकल इंजीनियर पिछले आठ सालों से एक ऐसे ही घर में रह रहा है।

 

उनका घर बिल्कुल अलग तरीके का है, जिसमें वॉटर सप्लाई नहीं होती है। इसके अलावा यहाँ पवन और सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है। पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए बारिश के पानी को जमा किया जाता है। सिर्फ यही नहीं, ग्रे वाटर (वाशिंग मशीन, वाश बेसिन से निकलने वाला पानी) का इस्तेमाल टॉयलेट में जबकि ब्लैक वाटर को फिल्टर करके सब्जियों की सिंचाई में इस्तेमाल किया जाता है।

 

सोच समझकर बनाया गया प्रकृति के करीब एक घर

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सूरत का सस्टेनेबल होम

बचपन से ही स्नेहल को प्रकृति से गहरा लगाव रहा है। वह बताते हैं, “बड़े होने के बाद मेरे पापा फैमिली ट्रिप पर हमें गुजरात के डांग फॉरेस्ट लेकर जाते थे। मैं वहाँ कई बार गया हूँ। 1983 में मणिपाल से अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी करने के बाद जब मैं वापस आया तो मुझे पता चला कि शहर की हरियाली खत्म हो रही है। मणिपाल एक हरा भरा शहर है और मैं सूरत को भी वैसा ही देखना चाहता था।”

 

छोटे से छोटे जीव जन्तुओं को बचाने के लिए उन्होंने सूरत में 1984 में दो अन्य लोगों के साथ मिलकर नेचर क्लब खोला। आज क्लब से लगभग  2,000 सदस्य जुड़े हैं, जो अब एक रजिस्टर्ड एनजीओ है।

 

स्नेहल कहते हैं, “मैंने 1996 में 4 एकड़ जमीन खरीदी। मैंने पेड़ लगाना शुरू कर दिया और यह भी तय किया कि मैं यहां एक दिन रहूंगा। इसलिए, जब इस प्लॉट को डिजाइन करने और घर बनाने की योजना बनी तो जो कुछ मैं सालों से सोच रहा था, उसे अमल में लाने का प्रयास किया।”

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छत पर लगा सोलर सेट अप और विंड सेट अप जिससे घर की बजली की ज़रूरतें पूरी होती हैं

 

स्नेहल ने घर में बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए छत पर सौर और पवन ऊर्जा का सेटअप लगाया। उन्होंने 30-प्वाइंट ड्राफ्ट में अपनी सभी जरूरतों की लिस्ट तैयार की। ग्रीन बिल्डिंग बनाने वाली आर्किटेक्ट फाल्गुनी ने उनके आइ़डिया पर काम किया।

 

एटर्रेन फर्म चलाने वाली सूरत की 55 वर्षीय आर्किटेक्ट फाल्गुनी कहती हैं, “मेरे पास एक ऐसा समझदार क्लाइंट था जिसे पता था कि उसे क्या और कैसा चाहिए। स्नेहल पटेल ने मुझे तकनीकी चीजों की जानकारी दी। उनकी बातों और विचारों से पर्यावरण के प्रति उनका लगाव जाहिर था।”

 

दो मंजिला घर (12,000 वर्ग फीट का क्षेत्र जिसमें ग्राउंड फ्लोर और फर्स्ट फ्लोर शामिल है) के निर्माण में तीन साल लगे। यह 5,000 वर्ग फुट क्षेत्र में बनाया गया था। अब परिसर में 70 किस्मों के लगभग 700 पेड़ लगे हैं, साथ ही एक तालाब भी है।

 

स्नेहल और उनका परिवार पिछले आठ साल से इस तीन बेडरूम वाले घर में रह रहे हैं। अपसाइकिल लकड़ी का इस्तेमाल करके घर को स्वदेशी तकनीक से बनाया गया है, इसलिए घर काफी ठंडा रहता है।

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इन बड़ी बड़ी खिड़कियों से हवा का वेंटिलेशन सही रहता है

 

पर्यावरण के अनुकूल और संसाधनों की बचत

कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिए स्नेहल पटेल ने अलग तरह से घर बनाने का फैसला किया। इस इको-होम में बिजली और ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए 7.5 किलोवाट की क्षमता वाला एक सोलर पैनल सिस्टम लगाया गया है।

 

यहां सोलर पैनल को इस तरह से लगाया गया है जिससे वो अधिक से अधिक सौर ऊर्जा को अवशोषित करते हैं। मानसून में सौर ऊर्जा का उत्पादन कम हो सकता है इसलिए एक विंड जनरेटर भी लगाया गया है।

 

घर में पानी की भी अनोखी सुविधा है। यह पानी की आपूर्ति पर निर्भर नहीं है। पानी की बचत करने के लिए अपशिष्ट जल का दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। घर की छत पर पानी की एक टंकी लगी है। इसमें कपड़े से फिल्टर करके बारिश के पानी को इकट्ठा किया जाता है और किचन और बाथरूम में नल से इनका इस्तेमाल किया जाता है।

 

एक बार जब छत पर रखी पानी की टंकी भर जाती है तो चैनल के माध्यम से पानी ग्राउंड फ्लोर पर लगे दूसरे टैंक में भरता है। इस टैंक की क्षमता दो लाख लीटर है। टैंक में भरने से पहले पानी को फिल्टर किया जाता है।

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पटेल फैमिली के सदस्य

 

टैंक भरने के बाद बचे पानी को ग्राउंड वाटर रिचार्ज करने के लिए छोड़ दिया जाता है। ग्राउंड को ईंट, बजरी और मिट्टी से बिल्कुल नैचुरल तरीके से बनाया गया है।

 

इसके अलावा कुछ पानी को तालाब में छोड़ दिया जाता है। वहीं ग्रे वाटर को वॉशिंग मशीन के नीचे रखे टैंक में जमा किया जाता है। फिर एक पाइप लाइन के जरिए इस पानी का इस्तेमाल टॉयलेट में किया जाता है।

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घर का तालाब जहाँ पानी शुद्ध होता है

 

रिसर्च के अनुसार भारत के शहरी घरों में सभी अपशिष्ट जल का लगभग 80 प्रतिशत ग्रे वाटर है। इसका मतलब यह है कि इस पानी को रिसाइकिल करने से हमारे घरों में पानी की कुल खपत में काफी कमी आ सकती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) का अनुमान है कि देश में हर दिन लगभग 38,000 मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है, लेकिन इसकी प्रबंधन क्षमता केवल 12,000 मिलियन लीटर प्रति दिन है।

 

द हिंदू में प्रकाशित एक आर्टिकल में विशेषज्ञों ने बताया कि शहरी क्षेत्र में रहने वाला एक औसत भारतीय हर दिन लगभग 180 लीटर का उपयोग करता है, जिसमें से 45-50 लीटर केवल टॉयलेट फ्लशिंग पर खर्च होता है। वो निर्माण के दौरान रीसाइक्लिंग सिस्टम को शामिल करने की सलाह देते हैं जिससे कीमती संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल किया जा सके और भूजल को प्रदूषित होने से बचाया जा सके।

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घर में कोई सीवेज कनेक्शन नहीं है और बाथरूम (वॉशबेसिन और नहाने की जगह) से पानी का दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। रेत और जलकुंभी, डकवीड और वॉटर लेट्यूस जैसे पौधे लगाकर एक प्रभावी फिल्टरेशन सिस्टम स्थापित किया गया है। ये पौधे पानी को साफ करने में मदद करते हैं।

टैंक से बहने वाले पानी से ग्राउंड वाटर रिचार्ज किया जाता है

इन पौधों को हर महीने काटा जाता है और घर के बगीचे में खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जबकि पानी (जिसमें जलकुंभी बढ़ती है) को एक टब में रखा जाता है और इसका इस्तेमाल वॉटर अम्ब्रेला और वाटर लिली पौधों में इसका इस्तेमाल करके ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ायी जाती है।

 

टब में छोटी-छोटी मछलियां भी छोड़ी जाती हैं जो मच्छरों के प्रजनन को रोकती हैं। जिससे पता चलता है कि पानी बागवानी के इस्तेमाल के लिए तैयार है।

 

शौचालयों से निकलने वाला काला पानी सेटलिंग टैंकों में चला जाता है। एक बार ठोस जम जाने के बाद पानी को फिल्टर कर लिया जाता है और बगीचे में सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जबकि ठोस सामग्री को खाद में बदल दिया जाता है।

 

पूरे घर में कई तरह के जुगाड़ : 

घर में लगी बड़ी खिड़कियों से दिन में पर्याप्त रोशनी आती है जबकि वेंटिलेशन घर को हवादार करती है। इससे बिजली की बचत होती है। इसके अलावा ईंट और पत्थर सहित सभी स्थानीय सामग्रियों का इस्तेमाल किया गया है।

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पेड़-पौधों से घर की छत को ठंडा रखा जाता है

फर्श कोटा के पत्थरों (विट्रीफाइड टाइल्स से अलग) से बने हैं। इन्हें काटने और पॉलिश करने में कम ऊर्जा की जरूरत पड़ती है।

 

इसके अलावा अपसाइकिल की गई लकड़ियों का इस्तेमाल किया गया है। कुछ लकड़ी गुजरात के अलंग शिप ब्रेकिंग यार्ड से मंगाई गई है। जहाजों को बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली लकड़ी की गुणवत्ता काफी अच्छी होती है।

 

फाल्गुनी देसाई कहती हैं कि दीवारों को प्लास्टर नहीं किया गया है और ना ही पेंट का इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने रैट-ट्रैप बॉन्ड वॉल कंस्ट्रक्शन विधि का इस्तेमाल किया है जिसमें कम ईंटें लगती हैं।

 

इस तकनीक में, ईंटों को लेटाकर रखने के बजाय खड़ा करके लगाया जाता है। जिससे दीवार के भीतर एक खोखला स्थान निकल जाता है।

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घर के अन्दर का एक और तालाब जो घर को ठंडा रखता है

 

स्नेहल कहते हैं, “घर के भीतर एक तालाब बनाया गया है जिसमें मछली और जलीय पौधे हैं। बेडरूम को ठंडा करने के लिए, हमने ग्राउंड फ्लोर पर रेन वाटर स्टोरेज टैंकों के माध्यम से पाइपों को निकाला है। ये पाइप कमरे में खुलते हैं और किनारे पर 30-वॉट के पंखों से जुड़े हैं। जब पंखे चलते हैं, तो पाइप में ठंडी हवा (इसके चारों ओर पानी की वजह से) नैचुरल एयर कंडीशनिंग का अनुभव देती है।”

 

इसके अलावा, ढलान वाली छत और हर कमरे में लगे एक्सहॉस्ट फैन गर्म हवा को बाहर निकालने में मदद करते हैं। छतों को खास तरह के सिरेमिक पेंट से रंगा गया है जो अंदरूनी हिस्सों को लगभग 3-4 डिग्री ठंडा रखते हैं और छत से सूरज की रोशनी को रिफ्लेक्ट करते हैं। छत के कुछ हिस्सों में पूरब और पश्चिम दिशा में पेड़ों की लताएं फैली हैं जो सूरज की तेज रोशनी को रोकती हैं और घर को ठंडा रखती हैं।

 

पक्षियों को घोंसले बनाने के लिए बाहरी दीवारों (2.5-4 इंच व्यास वाली पीवीसी पाइप का इस्तेमाल करके) में खाली स्थान छोड़ा गया है। छिद्रों में लकड़ी के टुकड़े डाले गए हैं, जिससे ततैया बाहर लटक सकती है और छोटे कीट घोंसले बना सकते हैं।

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घोंसले की जगह

 

घर के अंदर बेंत और बांस से बने फर्नीचर हैं। ये लकड़ी की अपेक्षा अधिक टिकाऊ होते हैं। कोई आरओ फिल्टर नहीं लगा है और पांच कॉपर पॉट्स से एक नैचुरल फिल्टर बनाया गया है। पानी नारियल चारकोल, मार्बल चिप्स, ह्वाइट सैंड और चांदी के सिक्कों की परतों से होकर सबसे नीचे के बर्तन में फिल्टर होता है।

 

“चांदी और तांबे पानी से बैक्टीरिया को दूर करने में मदद करते हैं। इस फिल्टर को न तो बिजली की जरूरत है और न ही आरओ फिल्टर से अलग इसमें पानी की बर्बादी होती है। साल में एक बार फिल्टरेशन के कंपोनेंट्स को निकालना पड़ता है।

 

इस घर को बनाने की चुनौतियों के बारे में पूछने पर फाल्गुनी कहती हैं, “मुझे कोई भी परेशानी नहीं हुई। क्योंकि क्लाइंट जो चाहता था वह बहुत क्लियर था और उसके पास पहले से ही एक टीम थी जो स्थायी निर्माण तकनीकों से अच्छी तरह से परिचित थी। पर्यावरण के अनुकूल घर बनाने के लिए यह छात्रों और ग्राहकों के लिए एक परफेक्ट मॉडल है।”

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लिविंग रूम के अन्दर का नज़ारा

स्नेहल कहते हैं कि घर को बनाने में तीन साल लग गए क्योंकि वह लगातार इसे टिकाऊ बनाने के लिए काम कर रहे थे। उन्होंने कहा, “मैं चाहता था कि यह घर लोगों को प्रेरित करे। आपको प्रकृति से कटने के लिए घरों का निर्माण नहीं करना चाहिए। घर ऐसा होना चाहिए जिसमें ऊर्जा और संसाधनों की बचत हो सके।”

 

मूल लेख- ANGARIKA GOGOI

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Written by अनूप कुमार सिंह

अनूप कुमार सिंह पिछले 6 वर्षों से लेखन और अनुवाद के क्षेत्र से जुड़े हैं. स्वास्थ्य एवं लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर ये नियमित रूप से लिखते रहें हैं. अनूप ने कानपुर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य विषय में स्नातक किया है. लेखन के अलावा घूमने फिरने एवं टेक्नोलॉजी से जुड़ी नई जानकारियां हासिल करने में इन्हें दिलचस्पी है. आप इनसे anoopdreams@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

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