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लॉकडाउन में नहीं बिक रहे थे कद्दू, तो किसानों ने कर्नाटक में बना लिया आगरा का पेठा!

सालों से, तीर्थहल्ली के किसान आगरा के पेठे के लिए अपनी फसल भेजते रहे हैं। लेकिन लॉकडाउन ने इस सिलसिले को रोक दिया। पहली बार यह शहर खुद अपना पेठा बना रहा है!

गरा दो चीजों के लिए दुनिया भर में मशहूर है, एक तो ताजमहल और दूसरा वहां का नरम, खुशबूदार और रसदार पेठा। आगरा की यह खास मिठाई एक सब्ज़ी से बनाई जाती है जिसे उत्तर भारत में पेठा और बहुत-सी जगह सफेद कद्दू के नाम से भी जाना जाता है। हम सबने यह मिठाई तो खाई है लेकिन शायद ही किसी को पता हो कि इस मिठाई को बनाने के लिए सफेद कद्दू दक्षिण भारत से भी आगरा पहुंचता है।

कर्नाटक के शिमोगा जिले का तीर्थहल्ली शहर इस फसल के उत्पादन के लिए खास तौर पर मशहूर है। यहां के किसान यह फसल काफी मात्रा में उगाते हैं और फिर ट्रेडर्स के ज़रिए इसे दिल्ली और आगरा में बेचते हैं। इन किसानों के लिए दिल्ली और आगरा का मिठाई बाज़ार ही सहारा है, जहां उन्हें अपनी फसल का अच्छा दाम मिलता है। लेकिन इस बार COVID-19 के चलते हुए लॉकडाउन के कारण तीर्थहल्ली के किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

ख़बरों के मुताबिक, तीर्थहल्ली के किसानों ने लगभग 2000 टन सफेद कद्दू का उत्पादन किया था, लेकिन लॉकडाउन की वजह से वह अपनी फसल को दिल्ली और आगरा के बाजारों तक नहीं पहुंचा पाए। किसानों की सभी उम्मीदें टूटने लगीं थी क्योंकि उन्हें कहीं से कोई मदद नहीं मिल रही थी।

तनाव के इस माहौल में तीर्थहल्ली के ही एक उद्यमी, किसानों के लिए मसीहा बनकर उभरे। 39 वर्षीय विश्वनाथ कुंटावल्ली ने लगभग डेढ़-दो साल पहले ही अपना खाद्य उद्यम, इब्बनी फ़ूड इंडस्ट्रीज शुरू किया था। उनका यह स्टार्टअप शुद्ध और बिना किसी केमिकल के इस्तेमाल से बनी मिठाइयों के लिए मशहूर है।

विश्वनाथ ने द बेटर इंडिया को बताया, “मेरी माँ का निधन कैंसर की वजह से हुआ था और तभी मैंने तय किया था कि मैं ज़रूर ऐसा कुछ शुरू करूंगा जिसके ज़रिए लोगों को शुद्ध खान-पान के उत्पाद उपलब्ध करा पाऊं। मैंने इब्बनी शुरू किया और हम यहां पर प्रोसेसिंग के दौरान किसी तरह के रसायन या फिर हानिकारक प्रेजरवेटिव का इस्तेमाल नहीं करते।”

वैसे तो, लॉकडाउन के दौरान उनका काम भी बंद था, लेकिन जब किसानों की हालत के बारे में उन्हें पता चला तो उन्होंने कुछ करने की ठानी। प्रशासन ने उनसे कहा कि यदि वह अपनी प्रोसेसिंग यूनिट में आगरा पेठा बनाने की कोशिश करें तो किसानों को बाज़ार मिल जाएगा। बिना एक पल भी सोचे, विश्वनाथ ने हाँ कर दी और उन्होंने आगरा पेठा बनाने की विधि पर रिसर्च करना शुरू किया। वह बताते हैं कि उन्होंने यूट्यूब से काफी कुछ सीखा लेकिन वहां भी आपको पूरी रेसिपी नहीं मिलेगी तो उन्होंने थोड़ा-बहुत अपना स्टाइल भी इसमें जोड़ा।

Vishwanath Kuntavalli with his Petha

मई, 2020 की शुरूआत में उन्होंने इस पर काम करना शुरू किया था और लगभग एक हफ्ते में अपनी टीम की मदद से उन्होंने रेसिपी तैयार कर ली। पहली बार में, उन्होंने कम मात्रा में पेठा बनाने की कोशिश की और सफल रहे।

“लगभग एक-डेढ़ हफ्ते में हमारा पहला पेठा का बैच तैयार हो गया और यह सबको खाने में पसंद भी आया। इसके बाद, हमने किसानों से संपर्क करना शुरू किया,” उन्होंने आगे कहा।

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शुरू में उन्होंने 500 किलोग्राम सफेद कद्दू किसानों से खरीदा क्योंकि तब सभी काम उनके यहां हाथ से ही हो रहे थे। लेकिन अब वह प्रतिदिन 7 से 10 टन कद्दू किसानों से खरीद सकते हैं क्योंकि उन्होंने प्रोसेसिंग के लिए मशीन लगा ली है। विश्वनाथ बताते हैं कि पेठे के लिए प्रोसेसिंग मशीन भी उन्होंने खुद ही तैयार की है। दरअसल, इब्बनी फ़ूड इंडस्ट्रीज के अलावा, उनकी वीके इंजीनियर्स नाम से भी कंपनी है, जहां वह खेती के लिए मशीनरी बनाते हैं। विश्वनाथ खुद एक किसान परिवार से हैं और उनके पिता सुपारी की खेती करते हैं।

Processing of ash Gourds is helping farmers

मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने वाले विश्वनाथ को हमेशा से ही अपना कुछ व्यवसाय करना था। वह कहते हैं, “आज भी बहुत से किसानों को उनकी ज़रूरत के हिसाब से मशीन नहीं मिलती हैं। हम किसानों के लिए उनके हिसाब से स्पेशलाइज्ड मशीन बनाते हैं। पेठा बनाने के लिए भी जैसी मशीन हमें चाहिए थी, वैसे बाज़ार में मिलना मुश्किल था और फिर अभी कहीं कुछ खुला भी नहीं था। इसलिए हमें अपनी ही कंपनी में रिसर्च एंड डेवलपमेंट करके मशीनरी तैयार की। अब इस मशीन की वजह से हमारी उत्पादन क्षमता बढ़ गई है और हम ज्यादा से ज्यादा किसानों से उनकी फसल खरीद सकते हैं।”

विश्वनाथ ने अब तक लगभग 30 छोटे किसानों से उनकी फसल खरीदी है और 1500 किलोग्राम पेठा तैयार किया है। उनके पेठे को बाज़ार में भी काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली है।

उन्होंने बताया, “पहले किसान अपनी फसल को लेकर काफी चिंतित थे क्योंकि एक तो उन्हें बाज़ार नहीं मिल रहा था और फिर बहुत मुश्किल से जो ट्रेडर्स उनको मिले, वे बहुत ही कम दाम, एक या दो रुपये प्रति किलो में उनकी फसल खरीद रहे थे। बहुत से किसान उसके लिए भी तैयार थे क्योंकि उन्हें कोई और उम्मीद नज़र नहीं आ रही थी। लेकिन अब हम किसानों को उनकी फसल के लिए 4-5 रुपये प्रतिकिलो का मूल्य दे रहे हैं। यह पिछले साल के मुकाबले बहुत कम है लेकिन अब उनके पास अगली फसल के लिए कुछ तो धनराशि है। बाकी जैसे-जैसे हमारी मार्केटिंग बढ़ेगी, उसी हिसाब से हम भी किसानों की फसल का दाम बढ़ाएंगे। ”

Petha

विश्वनाथ के पेठे को बाज़ार में अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। अब तक वह 100 किलोग्राम पेठा बेच चुके हैं। जैसे ही उन्हें लॉकडाउन में थोड़ी राहत मिलेगी, वह इसकी सही पैकेजिंग पर काम शुरू कर देंगे। वह इस साल में लगभग 1000 टन सफेद कद्दू से पेठा बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। जिससे इलाके के लगभग 200 किसानों को मदद मिलेगी। सबसे अच्छी बात यह है कि अब यहां के किसानों को आगरा या दिल्ली के पेठा बाज़ार पर निर्भर होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि अब उनका खुद का ‘तीर्थहल्ली’ पेठा बन रहा है!

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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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