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गीले से लेकर सूखे कचरे के सही प्रबंधन तक, इस व्यक्ति का रहन-सहन है ‘कचरा-फ्री’!

साल 1998 में कौस्तुभ ताम्हनकर ने ‘गार्बेज फ्री लाइफस्टाइल’ पर काम करना शुरू किया था। आज उनके यहाँ से किसी भी तरह का कोई कचरा डंपयार्ड या फिर लैंडफिल में नहीं जाता!

क्या यह मुमकिन है कि आपके घर से कूड़ा-कचरा डंपयार्ड या फिर लैंडफिल में न जाए? आप सोच में पड़ गए होंगे कि जैविक और गीले कचरे की तो फिर भी खाद बनाई जा सकती है लेकिन बाकी कचरा जैसे पॉलिथीन, प्लास्टिक, मेटल, कागज़ आदि का क्या होगा? क्या यह मुमकिन है कि हम कोई कचरा ही उत्पन्न न करें?

अगर यह सवाल आपसे या हमसे किया जाए तो हम सोच में पड़ जाएंगे। लेकिन मुंबई के ठाणे में रहने वाले कौस्तुभ ताम्हनकर बिना किसी हिचक के कहते हैं, “हां, यह मुमकिन है।”

पिछले 19 सालों से उन्होंने और उनके परिवार ने कोई कचरा उत्पन्न नहीं किया। ताम्हनकर कहते हैं कि जो भी व्यक्ति कचरा उत्पन्न कर रहा है, उसके प्रबंधन की ज़िम्मेदारी भी वह खुद ले। यदि हमें अपने कचरे को सही से प्रबंधित करना आ जाए तो ‘जीरो गार्बेज’ यानी कि ‘शून्य कचरा’ लाइफस्टाइल जी सकते हैं।

कौस्तुभ ताम्हनकर ने द बेटर इंडिया को बताया कि कचरा-प्रबंधन की दिशा में उनका सफ़र साल 1998 से शुरू हुआ।

Zero Garbage Lifestyle Tips
Kaustubh Tamhankar

उन्होंने कहा, “हर जगह हम यही चर्चा कर रहे थे कि इतना कचरा उत्पन्न हो रहा है। यहां कुड़े के ढेर लग गए हैं, लैंडफिल भर रहे हैं। लेकिन हर कोई समस्या की बात कर रहा था, किसी का इसके हल से कोई सरोकार नहीं था। मुझे लगा कि सिर्फ बातें करने से तो कहानी बदलेगी नहीं तो क्यों न कुछ किया जाए। पर अगर हम बस अपने मन में सोच लें कि हम कुछ करेंगे तो हम उसे हर दिन कल पर टालते रहते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि हमने जो फैसला लिया है उसके प्रति एक ज़िम्मेदारी हमें महसूस हो।”

खुद को प्रेरित करने के लिए और बार-बार अपना लक्ष्य याद दिलाने के लिए उन्होंने अपने घर के बाहर एक कागज चिपकाया। इस पर लिखा था- ‘हम कचरा उत्पन्न नहीं करते’! अब यह बात उनके साथ-साथ उनके आस-पड़ोस वालों को भी पता थी। वह कहते हैं कि वह जितनी बार बाहर जाते और अंदर आते, उन्हें हमेशा अपना लक्ष्य दिखता और वहीं से शुरूआत हुई उनके ‘कचरा-मुक्त’ जीवन की।

We do not produce garbage

उन्होंने छोटे-छोटे कदम उठाए। सबसे पहले उन्होंने ठाना कि वह कोई भी कचरा फेंकेंगे नहीं। चाहे बिस्किट का रैपर हो, कागज़ हो या फिर पॉलिथीन। ऐसे में इन सब चीजों का ढ़ेर घर में ही बनना शुरू हो गया। अब क्या किया जाए? ताम्हनकर ने अपने रहन-सहन को गौर से जांचा।

उन्होंने समझा, “जब हमारे इस्तेमाल करने के बाद किसी भी चीज़ की कीमत जीरो हो जाती है तो वह हमारे लिए कचरा बन जाता है। जिसे फेंका जा सकता है। अब आप अखबार को ले लीजिये, कोई भी परिवार अखबार नहीं फेंकता कूड़े में क्योंकि उसकी उन्हें रद्दी में कीमत मिल सकती है। वहीं अगर कागज़ के बने कप की बात करें तो हम चाय पीने के बाद बहुत आसानी से फेंक देते हैं क्योंकि अब उससे हमें कोई फायदा नहीं। सवाल अब यह है कि हम जो कुछ भी इस्तेमाल कर रहे हैं, हमें उसकी कीमत जीरो नहीं होने देनी है।”

लेकिन यह कैसे हो?

इस सवाल के जवाब में ताम्हनकर कहते हैं कि इसके लिए बस आपको थोड़ा-सा अपने व्यवहार में परिवर्तन करना होगा। कागज़ के कचरे को आप अख़बारों के साथ इकट्ठा रख सकते हैं और बाद में इसे रद्दी वाले को दे सकते हैं। ज़्यादातर प्लास्टिक, मेटल और इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट को रीसायकल करने के लिए भेजा जा सकता है। लेकिन सबसे ज्यादा हानिकारक है पतली प्लास्टिक, जिनमें हम अपनी सब्ज़ी आदि लेकर आते हैं। इस परेशानी का हल भी ताम्हनकर ने निकाला है। उन्होंने बताया कि इसका हल उन्होंने पैकिंग पाउच के तौर पर तैयार किया है।

पैकिंग पाउच क्या है?

Packing Pouch

ताम्हनकर बताते हैं कि उनकी एक फैक्ट्री भी है जहां पर केमिकल इंडस्ट्री के लिए वह इंस्ट्रूमेंट्स बनाते हैं। यहां पर भी उनकी कोशिश है कि कम से कम कचरा वह उत्पन्न करें और जितना ज्यादा यूज और रियूज हो सकता है करें। उन्हें अपने प्रोडक्ट्स को डिलीवर करने के लिए पैकेजिंग के समय पहले बबल रैप या फिर थर्मोकोल इस्तेमाल करना पड़ता था। लेकिन फिर उन्होंने सोचा कि ऐसा क्या इस्तेमाल किया जाए जो उनकी ‘जीरो गार्बेज’ लाइफस्टाइल का भी हिस्सा बने।

उन्होंने कहा, “मैंने पैकिंग पाउच तैयार किया। इस पैकिंग पाउच में एक लिफाफे के अंदर हम यह पतला प्लास्टिक डालते हैं जो हमारे रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा है और रीसायकल नहीं हो सकता। यह सबसे ज्यादा हानिकारक है। इसलिए हम इन्हें रोल करके इस लिफाफे में भरते हैं और फिर इसे सील कर देते हैं। इन लिफाफों को हम पैकेजिंग में उपयोग करते हैं। इस तरह से हमने थर्माकोल के इस्तेमाल को बंद कर दिया और साथ ही, इन हानिकारक पॉलिथीन को लैंडफिल, और पानी के स्त्रोतों में जाने से रोक दिया।”

ताम्हनकर के पास अब उनके आस-पड़ोस के लोगों के अलावा, पास के शहरों में रहने वाले उनके दोस्त भी अपने यहां से पॉलिथीन इकट्ठा करके भेजते हैं। उन्होंने अब तक 4 लाख से भी ज्यादा पैकिंग पाउच बनाए हैं। पैकिंग पाउच के अलावा भी, आप और भी कई तरीकों से इन पॉलिथीन का फिर से उपयोग कर सकते हैं। आप उनका एक वीडियो यहां देख सकते हैं:

अब सवाल आता है कि उन्होंने तो रोक दिया लेकिन जिनके पास यह पहुंच रहा है पैकेजिंग के साथ, वह उनका क्या करेंगे? यह कैसे सुनिश्चित होगा? इस सवाल के जवाब में ताम्हनकर कहते हैं, “जब हमें किसी और कंपनी से डिलीवरी मिलती है और उसमें बबल रैप या फिर थर्माकोल होता है तब हम उस कंपनी से सवाल नहीं करते कि इस पैकेजिंग का क्या करें? लेकिन अगर कोई कुछ अच्छा करने की कोशिश करता है तो हम हमेशा ऐसे सवाल करते हैं। मैं लोगों से बस यही कहता हूं कि इन पैकिंग पाउच के ज़रिए हम बहुत हद तक हनिकारक पॉलिथीन को रोक पा रहे हैं। जहां भी यह पैकिंग पाउच पहुंचे, जब तक यह बंद है तब तक तो पर्यावरण सुरक्षित है। फिर मान लीजिये 10 में से एक पाउच अगर फट भी गया और उसमें से 2-3 पॉलिथीन जो डाली हैं वह बाहर आ गई। लेकिन बाकी तो बंद हैं। हमने सकारात्मकता की तरफ देखना चाहिए। सिर्फ इसलिए कि आगे इनका क्या होगा यह सोचकर मैं भी कुछ न करूं तो यह गलत होगा।”

गीले और जैविक कचरे से खाद बनाने के लिए उन्होंने ‘अविरतपात्र’ बनाए हैं। घरेलू स्तर से लेकर यह अविरतपात्र सोसाइटी और अपार्टमेंट्स में भी लगाए गए हैं। उन्होंने 300 से ज्यादा घरेलू और 82 जगह बड़े अविरतपात्र लगाए हैं। क्या है यह अविरतपात्र, आप इस वीडियो में देख सकते हैं:


ताम्हनकर कहते हैं कि हम भारतीयों के साथ समस्या यह है कि विदेशों में रहते हुए जो काम हम खुद कर लेते हैं, अपने देश में उसी काम के लिए हमें कोई और चाहिए। “मेरा अपना अनुभव है जहां मैंने पाया कि कूड़ा-कचरा उठाने वालों को लगता है कि उन्हें इसके सिवाय और कोई काम नहीं मिलेगा। साथ ही, बड़े समृद्ध लोगों को लगता है कि अगर उनके घर से कचरा ही नहीं निकलेगा तो इन लोगों के लिए आय का साधन खत्म हो जाएगा। पर यह बहुत ही गलत मानसिकता है क्योंकि जिस दिन कूड़ा-कचरा निकलना बंद हो जाएगा उस दिन ये लोग कोई और हुनर सीखेंगे। पढ़ाई-लिखाई और साफ़-सुथरी जगहों पर काम करने की होड़ लगेगी,” उन्होंने कहा।

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किस तरह आप भी शुरू कर सकते हैं ‘जीरो गार्बेज लाइफस्टाइल’:

ताम्हनकर कहते हैं:

1. सबसे पहले अपने घर के बाहर यह बोर्ड लगाओ कि ‘अब से तुम्हारे घर से कोई कचरा उत्पन्न नहीं होगा’! इसके बाद यह तुम्हारी नैतिक ज़िम्मेदारी हो जाएगी।

2. कोई भी चीज़ इस्तेमाल करने के बाद जो भी बच जाता है, जिसे हम कचरा कहते हैं, उसे फेंकने से पहले अच्छे से सोचो कि इसका दोबारा से कैसे आप इस्तेमाल कर सकते हैं। जैसे पॉलिथीन और प्लास्टिक की चीजों को फेंकों नहीं बल्कि घर के एक कोने में एक थैला टांग दो और उसमें इन्हें डालते रहो।

3. जब यह भर जाए तो इसमें से केटेगरी के हिसाब से अलग-अलग करो कि क्या रीसायकल हो सकता है। जो भी रीसायकल के लिए चीज़ जा सकती है उसे अलग रख लो और अक्सर हम गली में देखते हैं सड़कों पर औरतों और बच्चों को कूड़ा बीनते हुए। जब भी कोई दिखे, उन्हें आदर से बुलाइए और उन्हें यह रीसायकलेबल कचरा दे दीजिए। इससे उन्हें भी गंदगी में नहीं भटकना पड़ेगा।

Bioculture from Wet Waste

4. इसके बाद, जो रीसायकल नहीं हो सकता, उसे अपसाइकिल यानी कि उससे क्या अन्य उपयोगी चीज़ बन सकती है, इस पर विचार कीजिये।

5. जब आप पूरी ईमानदारी से अपने हर एक कदम के बारे में सोचेंगे तो आपको खुद-ब-खुद हल मिल जाएंगे कि आप क्या-क्या कर सकते हैं।

6. हमेशा अपने बैग में एक एक्स्ट्रा थैला रखें ताकि जब भी आप बाहर कुछ खाएं-पिएं तो प्लास्टिक के रैपर को इसमें रख लें।

7. आपको कोई कूरियर आता है तो इसके कवर को या फिर डिब्बे को बचाकर रखें, आप इन्हें अपने घर में उपयोग में ले सकते हैं या फिर रीसाइक्लिंग के लिए दे सकते हैं।

8. आपको ‘यूज एंड थ्रो’ के कॉन्सेप्ट से निकलकर ‘यूज एंड रियूज’ के कांसेप्ट पर बढ़ना है और यह एक दिन में नहीं होगा। लेकिन अगर हम इसकी शुरुआत ही नहीं करेंगे तो कभी भी नहीं होगा।

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He has installed mani Aviratpatra in apartments

ताम्हनकर ने अपने इस अनुभवों पर एक किताब ‘जीरो गार्बेज’ भी लिखी है, जो अंग्रेजी, हिंदी और मराठी में उपलब्ध है। दिलचस्प बात है कि उन्होंने इस किताब का कोई मूल्य नहीं रखा है। जो भी उनसे यह किताब लेता है, उसे वह यही कहते हैं कि वह जो भी देना चाहे उतना काफी है। ग्राहक अपने मन -मुताबिक मूल्य दे सकते हैं और इससे जो भी राशि उन्हें मिलती है, उसे वह अगली प्रतियां छपवाते हैं। इस किताब में उन्होंने अपने रहन-सहन के बारे में विस्तार से लिखा है।

ताम्हनकर कहते हैं, “लॉकडाउन ने हमें एक मौका दिया है, अपने रहन-सहन पर विचार करने का। अपनी आदतों को सुधारने का और हमें इसका सही लाभ उठाना चाहिए। उम्मीद है कि स्थिति जल्द से जल्द बेहतर हो और हम सामान्य ज़िंदगी की तरफ लौटें लेकिन तब हमें यह याद रखना होगा कि अब हम पर्यावरण के बारे में सोचते हुए अपना हर कदम उठाएंगे।”

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यदि आप ताम्हनकर से संपर्क करना चाहते हैं तो उन्हें 9819745393 पर व्हाट्सअप मैसेज कर सकते हैं या फिर kdtamhankar@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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